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Saturday, May 11, 2013

चंद ख्वाहिशों में लिपटे फूल…

303035_425333964229037_1430586196_nतुम्हारे प्यार से भेजे हुए पहले फूल जो अब सूख गये हैं, उनकी भीनी भीनी खुश्बू में डूबकर ये सोचती हूँ की क्या करूँ इनका..?
हमारे नये घर की बैठक में सज़ा दूँ..
या अपनी प्याज़ी रंग वाली उस साड़ी की किसी तह में दबा दूँ जो तुम्हे पसंद आई थी

या फिर इनको घोल कर इत्र बना लूँ, अपने दुपट्टे में लगा लूँ!
या पीसकर उबटन बना लूँ और गालों पे लगा लूँ!
या फिर तुम जब अबकी बार आओगे तो तुम्हारे लिए सुबह की पहली, फ्लोरल चाय बना दूँ, थोड़ी कम चीनी और ज़्यादा पत्ती वाली..!!
या इनको ढाल दूँ चन्द महकती मोमबत्तियों में, और करूँ इंतज़ार तुम्हारे ऑफिस से वापस आने का, अपने प्यारे से घर में साथ-साथ कंडिल लाइट डिनर खाने का,
या कि बगीचे की गीली मिट्टी वाले उस किनारे पर जहाँ धूप हल्की-हल्की आती है, इनको दबा दूँ और करूँ इंतज़ार नयी कोपलें फूटने का और उस पौधे में खिलने वाले पहले फूल का भी..जिसे चढ़ाएँगे उस पूजा में, जो हम सुबह उठकर साथ-साथ करेंगे, अपने नये घर में बनाए इक छोटे से मंदिर में..


और फिर सोचती हूँ की रखूं ऐसे ही इसे ज़िंदगी भर अपने पास, तुम्हारे प्यार की सौगात की तरह और महकने दूँ अपने कमरे और इस ज़िंदगी को इसी भीनी-भीनी खुश्बू से…..............................…ताउम्र !

--दीप्ति

 

 

“ये पोस्ट कुछ आइस-पाइस खेलती खुशियों के वास्ते, उस खुदा के वास्ते जो हमेशा ज़िंदगी में ’नहीं होकर भी रहा’ और इस ब्लॉग के वास्ते जिसे इसका को-राइटर मिल गया...”                       

--पंकज

Tuesday, September 7, 2010

बुदबुदाती हुयी सी कुछ तस्वीरें…

 

P280810_15.08DSCN0749 DSCN0750DSCN0771 DSCN0794DSCN0807  A room with a windowDSCN0958 DSCN0983DSCN0991 

 

इनमें से कुछ तस्वीरें मैने पवन के कैमरे और अपने मोबाईल से ली हैं और कुछ पवन ने ली हैं। कुछ और तस्वीरें हैं, जो इधर हैं और कुछ पवन के फ़्लिकर पर…

Monday, August 16, 2010

ताकि सनद रहे!

फ़्लैशबैक…… कैमरा रोलिंग… ज़िंदगी रिवाईन्ड… एक्शन!!

 

टेक – १

घर से ४ घंटे दूर लखनऊ के डालीगंज के एक कमरे की वो रात। ’कुछ’ बन कर दिखाने की कोशिशें जारी हैं… ’पापा कहते हैं बडा नाम करेगा’  जैसे रक्त कोशिकाऒ तक जाकर, उनसे पूछ्ता है कि ’भैया तुम बताओ? तुम क्या बनोगे?’  डिनर में खिचडी बनी है जो मुझे उस वक्त बनानी नहीं आती है इसलिये मेरा शोषण होता है… बर्तन धोने के काम, बिना किसी वोटिंग के मेरे क्रूर तानाशाही  रूममेट्स के द्वारा मेरे जिम्मे कर दिये जाते हैं। खैर मुझे तब भी आज के ही जैसे आवाज उठानी नहीं आती है और माताश्री के हर बार फोन पर ये कहे जाने पर भी, कि ’हाय, मेरा लड़का बर्तन धोता है!’ मैं खुशी खुशी बर्तन घिसता रहता हूँ  और सोचता रहता हँ कि कभी उनमें से भी कोई जिन्न निकलेगा और मेरे सारे ख्वाबों को पूरा  कर देगा.. लेकिन शायद उसे भी मेरी आऊटडेटेड ख्वाहिशों में कोई इन्ट्रेस्ट नहीं… या आजकल जिन्न साहब भी आऊट ऑफ़ स्टॉक हैं।

खैर उस रात पर वापस आते हैँ… वो रात का समय होता है और बिजली के जाने का समय भी… बिजली वालों को पता है कि भाई रात में बिजली का क्या काम… रात का मतलब ही अंधेरा होना है… तो क्यों प्रकृति के साथ छेड़-छाड़ करी जाय। तो उस घुप्प अँधेरी रात में, हम लोग  डिनर को थोडा हैप्पनिंग बनाने की कोशिश करते हैं। छत पर खुली ऑक्सीजन के साथ कैन्ड्ल लिट डिनर करने की तैयारी की जाती है… एक जली हुयी मोमबत्ती के साथ  तीन लोग, तीन थालियाँ और एक कुकर में थोड़ी अधजली खिचड़ी।

तभी बगल वाले घर की खिड़की से एक चेहरा झाँकता है… और उस घुप्प अँधेरे में भी चटाई पर बैठकर असभ्य तरीके से जली खिचड़ी खाने वालों में भी एक लुप्तप्राय सभ्यता उगती प्रतीत होती है… एक की आवाज आती है “अबे! मशरूम थोडे और दो?”…… दूसरा - “पुलाव आज अच्छे बने हैं। काजू सही से डाले तूने।”… कमबख्त मैं अज्ञानी, जिज्ञासु बालक पूछ बैठता हूँ - “मशरूम? पुलाव? काजू?”… ये दो-तीन शब्द मुँह से अभी निकले भी नहीं होते हैं कि उस अँधेरे में न जाने मुझे कितनी चिकुटियाँ काटी जाती है और मैं उस सांकेतिक भाषा में अपने द्वारा पूछे गये शब्दों का अर्थ ढूढने की पूरी कोशिश करता हूँ… एकदम ईमानदारी से… लेकिन इतना समझदार होता तो मेरी शादी नहीं हो गयी होती (ये हमारे शहर के लोगों का समझदारी को लेकर एक तकियाकलाम है… आप इसे अन्यथा न लें…) तभी कानों में सरसराते हुये से कुछ शब्द गुजरते हैं “ अबे! ‘#$%^$%’ खिड़की पर लड़की है|”

ओह्ह… मै भी अपनी नयी नयी समझदारी का परिचय देते हुये उस काजू वाले पुलाव और मशरूम के भोज में अपना ’सक्रिय’ योगदान देता हूँ।

…और उस दिन हम तीनों जली हुयी खिचड़ी को मशरूम के जैसे ही चाट चाट्कर खाते हैं।

कट…

अरे कुछ रह गया… अरे हाँ इस टेक में एक गाना भी है। चलिये फ़िर से ’एक्शन’…

लेकिन ये गाना फ़िल्माया कैसे जाय? छत पर कोई पेड़ भी नहीं है जहाँ इन लड़कों को घुमाया जाय… अँधेरे में छत पर गोल-गोल यहाँ से वहाँ दौड़ाया भी नहीं जा सकता… बेचारों के हाथ-पैर टूट जायेगे.. शरीफ़ लडके हैं भई.. पढने – लिखने लखनऊ आये हैं। फ़िर?

फ़िर क्या… तीनो मस्त खा-पीकर लेटे हुये हैँ। अँधेरे में खिडकी पर कोई चेहरा है कि नहीं, पता नहीं लेकिन उन्होने भी गणित के किसी भी प्रूफ़ की आखिरी लाईन याद रखी है ’इति सिद्धम’। यूपी बोर्ड के इतने सारे एग्जाम्स पास करने के बाद वो ये तो जानते हैं कि प्रूफ़ में कुछ भी लिखा हो या न लिखा हो, ये लाईन सबसे महत्वपूर्ण है। इसी ’इति सिद्धम’ के सिद्धांत पर बिना दिमाग का यूज किये वो मानते हैं कि खिड़की पर अभी भी वो चेहरा है।

सेट कुछ ऎसे सजा है कि दो चटाईयां बिछी हैं और तीन लडके जगजीत सिंह की गज़ल गुनगुना रहे हैं -

ना उम्र की सीमा हो, न जन्म का हो बंधन…

जब प्यार करे कोई, तो देखे केवल ……

कि अनायास ही… बिना किसी लिखी हुयी स्क्रिप्ट के… अपनी अपनी मूल सोचो के साथ तीनो एक साथ अलग अलग कहते  हैं -

तन… मन… धन… (दायें से बायें की तरफ़ ऊपर वाले खाने में फ़िट करें)

कट……

 

नोट:

फ़िल्म अभी बाकी है मेरे दोस्त! मैं राईटर कम डायरेक्टर कम साईड-ऎक्टर दोनो के बीच में लेटा हुआ हूँ और ’मन’ ही कहता हूँ… :-) सोचा बता दूँ नहीं तो आपकी सोच तो मुझे पता ही है…  हे हे हे

Sunday, August 8, 2010

'सच' क्या होता है?

'सच' क्या होता है? कैसा दीखता है 'सच'? 

कश्मीर के बदलते हालातों पर सन्डे टाइम्स की स्पेशल रिपोर्ट है 'डेस्परेट हाउसवाइफ़्स'.. वो पढ़ता हूँ.. रोते बिलखते चेहरे हैं.. सलवार कमीज में पत्थर फेंकती औरते हैं... मेरा नजरिया बनने वाला  ही होता है कि गौतम भाई की पोस्ट पढ़ता हूँ.. 'भारतीय कुत्तों वापस जाओ' के नारे हैं...   पत्थर खाते पुलिसवाले हैं... फूटे सर पर हैंडीप्लास्ट लगाये भीड़ के सामने खड़ा एसपी है... सच बैलेंस्ड होता लगता है कि फिर शायदा जी की पोस्ट पढ़ता हूँ और कहीं गहरे, इक अनजान अँधेरे में डूबता जाता हूँ.... एक जबरदस्त तलब होती है छोडी हुयी सिगरेट को अंगीकार करने की..

इस दुनिया में सच की भी पोलिशिंग होती है.. 

क्या कोई दुनिया है इन सब सहमति- असहमति, वादों -विवादों के परे, जहाँ सच सिर्फ 'सच' होते हों?

 

P.S. कुछ दिनों में पहलगाम- पटनीटोप- कटरा जाना है... जम्मू – कश्मीर की वादियों के सच को अपनी आँखों से महसूस करना चाहता हूँ... लेकिन तब तक वादियों में सच बचेगा... ...वादियाँ खुद बचेंगी? मेरा जाना बचेगा?

कमबख्त ये सब लिखते लिखते सिगरेट की तलब भी भीतर से ऊपर और ऊपर चढती जाती है वैसे ही जैसे आज के दिन ये सारे सच मेरे ऊपर बहुत ऊपर चढकर बैठे हैं… ॥

Tuesday, July 20, 2010

मेरी नज़र से एक शख्सियत – अभय तिवारी

Picture0102उस गली में ’साईं’ नाम की कई बिल्डिंग्स हैं। एक बिल्डिंग के सामने से अभय भाई को फ़ोन लगाता हूँ “फ्लैट नंबर…? भूल गया?” वो बताते हैं और मैं उनके फ़्लैट के सामने खड़ा हूँ।

दाढ़ी-मूछों  वाले ये भाईसाहब, दरवाजा खोलते हैं… मैं ’नमस्कार’ करता हूँ, वो बड़े प्यार से हाथ मिलाते हैं। मैं सोफ़े पर बैठ जाता हूँ… आस पास नज़र दौड़ाता हूँ तो बस किताबें ही किताबें हैं। मेरा मन होता है उठकर सबकुछ अपने हाथों से छूकर देखूँ फ़िर चुप ही बैठा रहता हूँ।

बातें शुरु होती हैं और फ़िर चल पड़ती हैं… किसी बात पर वो कहते हैं कि “हाँ, लोग ’उदय प्रकाश’ को भी तो नहीं छोड़ते”। मैं  साहित्यिक विकलांग, पूछ्ता हूँ  कि “कौन उदय प्रकाश?” “अरे! उदय प्रकाश की कहानियां नहीं पढीं?” और वो सोफ़े से उठ जाते हैं। अपनी उस संजोयी हुई धरोहर से एक किताब निकालकर मुझे देते हैं “इसे पढ़ना।” मैं उस किताब को बड़ी नरमी से छूता हूँ… देखकर लगता है कि बहुत पुरानी किताब है। नाम देखता हूँ – “…और अंत में प्रार्थना”

 

करीब एक हफ़्ते बाद मैं फ़िर उसी बिल्डिंग के सामने हूँ। फ़ोन लगाता हूँ “फ्लैट नंबर…? फ़िर भूल गया?”

उन्होने सर पर एक गमछा बाँधा हुआ है। मैं कहता हूँ “स्मार्ट लग रहे हैं?” मुस्कराते हुये जवाब आता है “पढ़ते वक्त मैं गमछा बांध लेता हूँ  ताकि सारे विचार मस्तिष्क के साथ जुड़े रहें, इधर उधर छिटके नहीं”। “अच्छी तकनीक है, मैं भी ट्राई करूंगा” मैं कहता हूँ। उनके साथ बैठा हूँ… वो रामचरितमानस पढ़ रहे हैं… पूछते हैं “रामचरितमानस पढ़ी है?” “अपने पास-पड़ोस, रिश्तेदारों में रामायण बैठने पर मुझे ही बुलाया जाता था” मै लम्बी वाली फेंकता हूँ। वो दो चौपाईयाँ पढ़ते हैं और अपने साथ साथ मुझे भी उसमें स्वीमिंग करवा देते हैं। उनके साथ बातें करने में आनन्द आता है। कुछ जाना – अनजाना सीखता रहता हूँ… कुछ ’नहीं’ पूछने वाले सवाल भी पूछता हूँ,  जिनका अहसास मुझे घर आकर ही होता है… इस बार उनकी किताब ’कलामे रूमी’ ही ले आया हूँ। ’सरपत’ भी किसी दिन मांगकर देख ही डालूँगा।

 

अभय तिवारी किसी परिचय के मोहताज नहीं हैं।  थैंक्स टु पीडी, Picture0135c मैंने उनकी एक खूबसूरत सी पोस्ट  पढ़ी थी जो मैं गाहे बगाहे लोगों के सामने ऐज अ डायलाग मार देता हूँ… ’कबूतर जैसा मशहूर नहीं ’। उनको जितना पढ़ा, हमेशा एक नया प्वाइंट, एक नयी ऎनालिसिस समझने को मिली और जिसे मेरे जैसे लोग भी अच्छी तरीके से समझ पाये… अब चाहे वो फ़ुटबाल से भारत के प्राचीन रिश्ते की बात हो , या सर के पिछले हिस्से के महत्व की बात, या टाई लगाकर हिन्दी कहने की बात, या जुझारु जेसिका और एडवर्ड सईद के किस्से,  या ……आप खुद ही पढ़ लीजिये

 

कलामे रूमी’ की एक प्रति, अब मेरी हो चुकी है और मेरी डेस्क पर चमक रही है। आदतन सबसे पीछे वाला पन्ना पढता हूँ तो उनके ब्लॉग का लिंक भी है… मैं मन ही मन मुस्कराता हूँ और एक्नोलेजमेन्ट का एक पैरा पढ़ता हूँ:

सबसे पहले तो मैं धन्यवाद देता हूँ अपने पिता स्व. नरेश चन्द्र तिवारी और माँ श्रीमती विमला तिवारी को, जो मेरे शरीर, चरित्र और व्यक्तित्व के निर्माता हैं। उसके बाद मैं  अपनी पत्नी तनु का आभारी हूँ जिसने मुझे हमेशा एक नैतिक बल दिया और मेरे ऊपर सांसारिकता की सीढियां चढ़ने का कोई दबाव नहीं बनाया। फ़िर धन्यवाद देता हूँ मेरे मित्र फ़रीद खान को जिन्होने उमर में छोटे होने के बावजूद उर्दू-फ़ारसी का अक्षर ज्ञान कराने में मेरी उंगली पकड़ी ; और मेरे मित्र बोधिसत्व जिन्होने मेरी जरूरत की किताबें मुझे मिलती रहे, इसके लिये नि:स्वार्थ चिन्ता की; और मित्र प्रमोद सिंह को जिन्होने मेरे काम के प्रति उत्साह और अपने प्रति निर्ममता को बनाए रखने में निरंतर सहयोग दिया। अंत में बिबोध पार्थसारथी और विश्वजीत दास समेत अपने तमाम साथियों और मित्रों के साथ, अपनी उन पेशेवर असफलताओं का भी आभारी हूँ  जिन्होने मुझे यह काम करने का आयाम उपलब्ध कराया।

 

तभी याद आता है कि किताब पर उनके ऑटोग्राफ़ लेना तो भूल गया हूँ… चलिये बिल्डिंग तक का रास्ता तो पता है ही और आगे बस एक फ़ोन करना है और पूछना है -  “फ्लैट नंबर…? फ़िर भूल गया?” 

 


P.S. कलामे रूमी फ़्लिपकार्ट पर उपलब्ध है। पहली वाली फ़ोटो का लिंक  भी उसी पेज पर रिडायरेक्ट करता है।


पुनश्च:

टिप्पणी में सतीश पंचम जी ने अभय भाई की एक पोस्ट का जिक्र किया जिसमें मुम्बई में हिंदी किताबें रखने वाली दुकानों का जिक्र था और ये हिंदी साहित्य पढ़ने वाले मुम्बई वासियों के लिये एक सहेजकर रखी जाने वाली पोस्ट ही है।

 

पिछले पन्नो से: मेरी नज़र से एक शख्सियत - संकल्प शर्मा

Saturday, July 10, 2010

काश सोचने के पैसे मिलते!!

think_cartoonसुबह ७ बजे माताश्री ने रोज की ही तरह फ़ोन करके पूछा कि “उठ गये” और हम भी रोज की तरह ’हाँ  ’ कहके, २ मिनट नींद में  ही बातें करके सो गये। ८ बजे मोबाईल में लगा अलार्म भी बजा… फ़िर हर १० मिनट पर बजता रहा… फिर शायद मेरे रूममेट ने उसे बंद किया… खैर…

बाहर झमाझम बारिश हो रही थी और मेरे बेड ने जैसे मुझे एक चुम्बक की मानिंद पकड़ा हुआ था। उठने की हर कोशिश नाकाम थी और आँखें  बंद करके अपने सपने में ही ऑफिस निकलने की तैयारी कर रहे थे।

करीब साढ़े दस बजे इस स्वप्न संसार से बाहर आते हुए हमने बेड छोड़ा और किचेन में घुसते ही चाय चढ़ा दी और लैपटाप ऑन करके बैठ गये। खिड़की के बाहर घमासान बरसती बारिश और हाथों में अदरक की चाय… और ऎसे वक्त ऑफिस… कयामत हो…

बस आव देखा न ताव और फ़ेसबुक पर एक अपडेट मार दी कि ’हम काम क्यूं करते है – वाई डू वी वर्क?’

…… और फ़िर चुपचाप सर झुकाये ऑफिस चले गये…

अनुराग भाई ने उसी पर पूछा कि ’दूसरा आप्शन बताओ’ तो दिमाग के घोड़े दौड़ गये और बस एक फ़ितूर सोच लाये…

कुछ खास नही बस बैठे बिठाये हम सोच रहे थे कि काश सोचना भी एक योग्यता होती और हमें सोचने  के पैसे मिलते……

…… और अगर मिलते तो ये दुनिया कैसी होती?

 

शादी की बातें कैसे होती?:

- लड़का क्या करता है?
बम्बई मे किसी बड़ी कंपनी में है… …’सोचता’ है…

- लड़की बहुत पढी लिखी है… गृहकार्य के साथ साथ उसे सोचना अच्छा लगता है… सोचने का होबी कोर्स भी किया है…

- हमारी सुशील कन्या के लिये एक सुन्दर वर चाहिये… सोचने वालों को वरीयता दी जायेगी…

 

इंटरव्यू कैसे होते?

- पहले कभी ’सोचा’ है?? हमारी कंपनी में वीकेंड पर भी ’सोचते’ हैं… क्या तुम इतना ’सोच’ पाओगे?

- तो आप पहले किस कंपनी में ’सोचते’ थे?

- अच्छा… तो आप पिछले दस सालों से ’सोचते’ हैं? क्वाईट इंट्रेस्टिंग …

- अच्छा प्रोफ़ाईल है आपका… तो अभी तक आप किन किन चीज़ो पर सोच चुके है??

- कुछ सोच के दिखाओ? (दो इंटरव्यूवर सोचते हुये सामने वाले से सवाल पूछते है

 

दोस्तों में बातें कैसे होतीं?

- साला कॉलेज में सोचने को कह दो तो गधे के हाँथ पाँव फ़ूल जाते थे… आज देखो फ़लाना कंपनी में है… पता नही कैसे सोचता होगा? वहाँ भी किसी सोचने वाले की कॉपी करता होगा …

- यार मैंने उनसे ६ लाख मांगे लेकिन वो बोले कि साढ़े पांच ही देंगे … लेकिन सीखने के लिये सोचने का इतना अच्छा प्लेटफ़ार्म भी तो दे रहे हैं…

- अबे कुछ सोचना सिखा न? सोच रहा हू इस बार सोचने का सर्टिफ़िकेशन क्लीयर कर ही लूं… तू तो सोचने में एक्सपर्ट है…

- (बार में टल्ली होकर सोच को गाली देते हुये) कहा था साले से दारू पीने आ जाना… लेकिन साले को सोचने से फ़ुर्सत मिले तब ना… अबे अब जितनी जरूरत है उतना सोचो…

 

पैरेन्टस से बातें कैसी होतीं?

- दिन भर अपने दोस्तों के साथ आवारागर्दी करते रहते हो… कभी बैठकर कुछ सोचते क्यूं नहीं??

- बेटा थोड़ा बहुत तू भी सोच लिया कर… देखता नहीं तेरे पिताजी अब सोचते सोचते कितना थक जाते है…

- शर्मा जी के लड़के को देखो… तुमसे छोटा है लेकिन अभी से  सोचता है और तुम!

 

………… और ज़िंदगी यूं ही सोचते सोचते कट जाती ॥

 


पुनश्च:

शम्स जी के जुगाड़ में थोड़ा परिवर्तन करके टिप्पणियों का जवाब देने के लिये ब्लॉग से जोड़ लिया है… कुछ समय पहले ज्ञानजी ने इसको इम्प्लीमेन्ट किया था। आप सामान्य तरह से टिप्पणी कर सकते हैं!!


Monday, June 14, 2010

आसमान के पेशेवर होने से बस थोड़ा सा पहले…

DSCN1655 लोकेशन – कोयमबटूर… साल २००७ के जुलाई महीने का पहला हफ़्ता… दो महीने चली एक रिगरस ट्रेनिंग के बाद आने वाले ४-५ दिनों में हमें अपनी अपनी ब्रांच लोकेशन्स में रिपोर्ट करना था… फ़ोटो खिंचाई अभियान जोरों शोरों पर था और स्लैम बुक भरवाई कार्यक्रम भी… दो महीने  में बने रिश्ते नाते छलक रहे थे… रोज़ थोड़ा थोड़ा सेन्टियाना बनता था… सुंदरियों को विदा करने वालों की लाईने लगीं थीं  और कई आधी अधूरी कहानियां बिखरने को तैयार थीं… प्रोफ़ेशनल ज़िंदगी में पहला कदम था और पेशेवर हवाओं में सिगरेट के छल्ले उड़ाने के अरमान…

उस दिन ओफ़िशियल ग्रुप फ़ोटो खींची जानी थी… मै हमेशा की तरह लेट था… पहुँचते ही किसी की आवाज़ आकाशवाणी की तरह आयी थी कि आईये ’पंक्चुअल पंकज’, क्या बात है हमेशा की तरह टाईम पर और हम अपनी बत्तीसी नपोरते हुये फ़ोटो के लिये खड़े लोगों में जगह बनाते हुये कहीं खड़े हो गये थे… जैसे दिमाग में  लेट में  दाखिल हुआ कोई विचार, दिमाग की पहले से बजा रहे विचारों के साथ जगह बनाकर खडा हो जाता है…

अगर कुछ दिन और पीछे चलें, तो कहानी यूं थी कि कोई मैडम (कुंवारी थी या R001-027मैरिड, उससे आपको क्या  लेना देना…) क्लास मे अलग अलग जगहों से आये हुये लोगों को एक दूसरे के और करीब लाना चाहतीं थीं… यू नो ’टीम स्किल्स’… तो चूतियापे भरा काम यह था कि आपको अपने नाम के पहले अक्षर से शुरु होने वाला कोई विशेषण, अपने नाम के साथ बोलना था और आपके बाद पड़ने वाले लोगों को आपका नाम उसी विशेषण के साथ बोलना था… हमेशा की तरह सबसे पहली दुनाली हमारे सीने पर रख दी गयी… दिमाग के भीतर के सारे वायर्स बडी मुश्किल से एक विशेषण ला पाये और एक स्लो मोशन में जैसे हमारे अन्दर से फ़ूटा - ’पंक्चुअल पंकज’। निकलते ही आत्मा को समझ आ गया कि बॉस! तुमने अपनी ही गोल पोस्ट मे गोल दाग दिया है… और ठहाकों की आवाज जैसे दर्शक दीर्घा मे उस गोल के होने की खुशी को बयान कर रही थी… किसी अत्यंत खुश दर्शक की खुशी से भरी एक लाईन भी मार्केट में उसी वक्त आयी थी – “साले तो रोज बस क्या ड्राईवर लेट करवाता है…”  :(

अब उन्हे मैं कैसे बताता कि साला मेरा रूममेट है जो मुझसे आधे घंटे पहले का अलार्म लगाता है और उसके बाद एक घंटे वो रूम से अटैच्ड उस इकलौते पाखाना+गुसलखाना टाईप कमरे में। मेरे अलार्म में मुझे उठाने की हिम्मत कभी नहीं रही… वो ’कोशिश करने वालो की हार नही होती’ की तर्ज पर हर पांच मिनट के बाद मुझे उठाने की कोशिश करता और फ़िर थक हारकर किसी तकिये के नीचे, नही तो मेरे पेट के नीचे… नही तो बेड के नीचे पड़ा मिलता। सुबह सुबह उसे देख यही लगता कि उसने आत्महत्या के कई असफ़ल प्रयास किये हों… नहीं तो मुझे जगाने के…

मेरा रूममेट, मेरा भाई, मेरा दोस्त, मेरा सच्चा दोस्त… अपने सारे क्रियाकलाप खत्म करने के बाद टाई पहनते हुये मुझपर अहसान करते हुये मुझे जगाते हुये कहता कि “जल्दी कर, बस आ गयी है” और फ़िर अपनी टाई बाँधने में मशगूल हो जाता… उठते ही मैं उसकी स्वार्थी कम दयावान टाईप पर्सनालिटी पर गर्व करता कि आज ये न होता तो क्या होता :( :)… और उसके टाई बांधकर, लिफ़्ट से नीचे जाते हुये बस मे बैठकर सबसे ये कहने से पहले कि चलो उसे लेट हो जायेगा, मुझे सारे क्रियाकलाप खत्म करते हुये बस तक पहुँचना होता था… अब इतना तो आपको अंडरस्टुड होगा ही कि ’सारे क्रियाकलाप’ मतबल ’सारे’ से ’कुछ कम’… ;) डियो वियो का जमाना है बॉस…

हाँ तो ग्रुप फ़ोटो के लिये जगह मिल गयी थी… ’पंक्चुअल पंकज’ जुमले ने जो आड़े तिरछे दांत नपोरवा दिये थे वो फ़ोटू लेने वाले भाईसाहेब को हजम नही हो रहे थे… कह रहे थे कि ’इस्माईल दो, दांत मत नपोरो’… अच्छा हुआ मन में हंसने के लिये नहीं कहा नहीं तो हमको तो उसकी प्रैक्टिस भी नहीं थी… खैर… कोडैक क्लिक हुआ… इस्माईल किये हुये और सबने उस लम्हे की एक एक कोपी की गुज़ारिश भी कर दी और अपनी अपनी चकाचक, रंगारंग स्लैमबुक निकालकर बैठ गये… हाय हमें लगा कि हम फ़िर से लेट… दौड़ कर बगल वाली स्टेशनरी की दुकान से एक ५ रूपये की डायरी उठा लाये और बिछा दिये सबके सामने…

आज घर की सफ़ाई करते हुये वही डायरी मिली… खोयी हुयी अच्छी चीज़ें, सरप्राईज के साथ मिलने पर मूड बना जाती हैं… इस डायरी ने भी बखूबी अपना काम अंजाम दिया… ये पोस्ट हिमान्शु जी और अन्य लोगों को डेडीकेटेड है जिनके मूड को मेरी लास्ट पोस्ट की वजह से डाउन होना पड़ा… उम्मीद है एक मुस्कराहट दे पाउँगा जैसे इस डायरी ने मुझे दी है…

इसी डायरी से हमारे लिये कही गयी कुछ अनसेन्सर्ड तारीफ़े ;) 


- अबे कंजूस, एक अच्छी स्लैम बुक खरीद… I have only two words for you (Hope you had seen WWF some point in your life!!)  MISS U :(

- भाभी को सिद्धार्थ का प्यार देना ;)

- ’बक भो……’  वेल स्पोकेन!!

- What a jolly person you are! रियली तुम्हारे बिना तो बस मे माहौल भी नही बनता था… तुम्हारे कमेन्ट्स on GPL ceremonies were ‘wunderwar’… And timely asking ‘BHAI KUCH HO TO BATA DENA……’

- Punctual Pankaj!! साला लोगो को पागल समझ रखा है क्याR001-019? लेकिन फ़िर भी मैं पागल  हूँ। तेरे लिये मैं ये भी करने को तैयार  हूँ। साले एक तेरे कारण हम लोगो को स्मोक करने के लिये इतनी दूर जाना पड़ता है… साला जरूरी था कैम्पस के अन्दर स्मोक करना… कुछ नही इस कारण लोगो से मुलाकात हो जाती है। और पता है in the beginning of ILP लोग कहते थे कि पंकज लोगों  की मारता रहता है तो मै लोगों से कहता था कि कौन है साला…तुम लोगों को मारना नही आता क्या… जब मिला तो पता चला कि कौन है साला। साले डीजी की इतनी मत मारा कर और पीयूष की भी… साले तू वो दिन याद करना जब तेरे कारण कोलिन सर ने हम लोगों  को डांटा था… साले कम पी लिया कर… चल कोई नही, ज्यादा नहीं लिखूंगा, नहीं तो कहेगा कि साला interactive हो गया है…

- Hi Tau! you are very nice, ugly, technically bullshit… ताई से कब मिला रहा है…… अभी जो लिखा सब बकवास। you rock man!!

- Hello Pankaj! Nice to have you as a friend. Its so nice that you are so caring, good at heart, try to calm others, solve their problems. You have such a great knowledge about everything. Be the way you are. Don’t change and do take care of yourself. You’ll surely achieve all the success… Have a great life ahead. Don’t forget us. You’ve got a good smile :)

- Hi Pankaj! I met you in ILP and our whole batch feels that you are very intelligent person. (बहुत हो गया क्या?) You are very nice person. got a great sense of humor and one good thing about you is you care for others. Keep it up. Keep smiling. Wish a great future… Dont forget us. keep in touch..

- Hello Pankaj! You are a very good, helpful and smiling friend and I would also like to mention that you are technically very strong. So मुम्बई मे doubts clear kar dena.. Keep in contact in “Mumbai”.

- Enjoy Life… उठा ले!!:)


Thursday, June 10, 2010

वो लोग जो पहाड़ हैं…

वो हमारी कम्पनी का फ़ेस है… कम्पनी का मेन गेट खोलिये और दीवार पर लगे कम्पनी के एक बड़े लोगो(Logo) के साथ साथ, कानों में हेडसेट लगाये हुये उसकी मुस्कुराहट आपका स्वागत करती है। हमारी कम्पनी की सारी इनकमिंग और आउटगोइंग कॉल्स भी बिना उसकी इजाजत के कहीं कनेक्ट नहीं होतीं…

अभी एक हफ़्ते पहले ही एक ईमेल ब्राडकास्ट आया कि उसके शौहर इस दुनिया में नही रहे… पढते ही जैसे सब कुछ एक पल के लिये  रुका था और फ़िर से उसी स्पीड से चलने लगा था। जो भी हुआ था उसकी गवाही देने के लिये फ़्रीज हुआ सिर्फ़ वो एक पल था जो इन दो-तीन दिन में आये असंख्य पलों में खो गया था। बस इतना ही हुआ था…

परसों से वो फ़िर से हमारा फ़ेस बन गयी है। मुस्कराहट शायद थोड़ी  फ़ीकी है पर सारी कॉल्स वैसे ही कनेक्ट होती हैं।

दो दिन से मैं न उससे कुछ कह पाया था और न कुछ पूछ पाया था। सिर्फ़ ’सो सैड’ कहना मुझे आया नहीं और उन दो दिनों में जब भी अपनी निगाहें मिलीं मेरा सर एक आटोमैटिक मशीन की मानिंद नीचे झुक गया… बोलने को कुछ ढूंढा तो साले शब्द भी सर झुकाये कहीं कोने में घुसे मिले…

आज सुबह जल्दी ही ऑफिस चला गया था। अपनी फिंगर,  ’स्वाईप मशीन’ में स्वाईप करने के बाद जैसे ही दरवाजा खोला वो सामने थी… निगाहें मिलीं…  उसने ’हैलो’ बोला… मैने उसका हाल चाल पूछा…

उससे पता चला कि उसके पति को काफ़ी पहले से कैंसर था और उसके सास-ससुर मेडिकल ट्रीटमेन्ट को छोड़कर ब्लैक मैजिक में ज्यादा विश्वास रखते थे।  इसके जबरदस्ती करने पर ऑपरेशन  तो करवाया गया लेकिन बाद में कीमोथेरेपी में लापरवाही दिखायी जाने लगी और ओझाओं -तांत्रिकों पर ज्यादा विश्वास किया जाने लगा। उसकी हालत दिन पर दिन बिगड़ने लगी थी और वो ये सब देख पाने में असमर्थ थी। अपनी आँखों के सामने अपने ही शौहर को तिल तिल मरते देखना बहुत ही मुश्किल था। इनफ़ेक्शन दिमाग तक फ़ैल रहा था। वो सबसे लड़ -झगड़ कर फ़िर से उसे लेकर किसी बड़े  न्यूरोसर्जन के पास गयी। न्यूरोसर्जन ने देखते ही हालात का अंदाज़ा कर लिया था:

- …… Go back to your Cancer Doctor

- OK…… any idea how much time he has now?

- To be honest, 4-5 months.

ये कहते कहते उसकी पलकें गीली हो चुकी थीं और आँखें एकदम लाल।

- पता है पंकज, मैं उसे घुट घुट कर मरता नहीं देख सकती थी। वो घर मुझे काटने लगा था इसलिये मैं अपने मम्मी-पापा के पास चली आयी और बेबी को भी ले आयी। हर वीकेंड उससे मिलने जाती थी  तो सास-ससुर मुझे खूब सुनाते थे लेकिन तब भी जाती थी… बेबी को भी ले जाती थी…कि तीनो इन लास्ट मूमेन्ट्स में  थोड़ा साथ रह लेंगे … शायद उसे अच्छा लगेगा… पर  एक दिन मेरी सास ने बोला कि ’तू निकाहनामे के लिये आती है न? जा नहीं देंगे  तेरा निकाहनामा… हराम की औलाद कहलायेगा न? हराम की औलाद है तो कहलाना ही चाहिये!!…’

उसकी गीली और लाल आँखों पर लगा स्पेक्स भी लाल होता जा रहा था… वो अपने दुपट्टे के किनारे से आंसू पोंछती  जा रही थी और उसी बीच कॉल्स भी आ रहे थे और इंटरव्यू  देने के लिये लोग भी… कम्बख्त कुछ भी नही थमता था…

- पता है वो हमेशा अज़ान के वक्त प्रेयर करना चाहता था लेकिन हम कभी इतनी सवेरे उठ नही पाते थे। मैने २-३ वीक्स से उसके घर जाना छोड़ दिया था। क्या कर सकती थी? उसे ऎसे मरते हुये नहीं देखा जाता था… पता है मैं उसे मिस नहीं करती इवेन मुझे खुशी होती है कि वो चला गया। वो बहुत तकलीफ़ में था… और मैं चाहती थी कि उसे कोई तकलीफ़ न हो…

- पता है सुबह की अज़ान के वक्त ही……  शायद, वो जाते जाते प्रेयर कर पाया……

 

कॉल्स अभी भी आ रहे थे और इंटरव्यू के लिये लोगों की भीड़ भी बढती जा रही थी… मै उससे ’बाय’ करके अपने क्यूबिकल की ओर बढ रहा था और पीछे इंटरव्यू के लिये आये लोगों  को नियंत्रित  करती, उसकी आवाज़ आ रही थी:

- Kindly take your seats. HR people will be coming in a while…

 

सच में वो लड़की नहीं पहाड़ है…  

 

*नानावती हॉस्पिटल ओपीडी मे लिखी

Monday, June 7, 2010

राजनीति – मेरी नज़र से

poster-1 किसी फ्लॉप मूवी का एक डायलाग था कि यूपी-बिहार में हर घर में एक आईएएस, एक नेता और एक गुंडा होता है… मुझे ये कथन बड़ा जमीनी लगता है।

मेरे बाबा एक स्वतंत्रता सेनानी थे और एक कट्टर कांग्रेसी। मुझे याद है बचपन मे वो मुझे आजादी की लड़ाई के किस्से सुनाया करते थे और मैं उनकी बोर बातों से दूर भागता था। अभी अपनी सोंच बन भी न पायी थी कि पता चला था कि पापा और चाचा किसी चुनाव में बीजेपी को वोट देकर आये थे और हमें  ये बात बाबा को नहीं बतानी थी। राजनीति को बाबा, पापा और चाचा की नज़र से ही देखता था। जब तक बाबा जिंदा रहे कांग्रेस के नाम से घर में हल्ला मचा देते थे। उनके जाने के बाद घर में कई बार ऎसा भी हुआ कि पापा बीजेपी को वोट देते थे और चाचा सपा को और कई बार घर के आठ वोट एक जगह पर भी गिरते थे।

इस मुद्दे पर मेरी समझ अभी भी नहीं  बन पायी है। कुछ साल पहले जब लखनऊ में भविष्य की  दिशाओं की खोज कर रहा था, तब अटल जी से जरूर प्रभावित था। कुछ समय ’विद्यार्थी निवास’ में रहा भी, जहाँ रहकर अटल जी ने कभी अपने पिता जी के साथ एक ही कक्षा मे वकालत(Law) की पढाई की थी। उनको कुछेक पत्र भी लिखे और इन बातों पर कई बार मित्रों के बीच हंसी का पात्र भी बना। एक बार राउरकेला में एक पर्सनालिटी डेवलपमेन्ट क्लास के दौरान काउंसलर ने क्लास से पूछा कि आपमें से कितनों में  लीडरशिप क्वालिटीज़ है? कितने लोगो को लगता है कि वो लीड कर सकते हैं? मेरा हाथ तुरंत हवा में उठ गया। मै सबसे आगे वाली पंक्ति में था। आस-पास देखा… फ़िर पीछे घूमकर देखा तो सिर्फ़ मेरा हाथ ही हवा में था…

गुजरात में  दंगे  हुये… नये चुनाव हुये… अटल जी अपनी बातों पर अटल नहीं रह पाये… बीजेपी एक लीडरशिप क्राईसिस में दिखी… यूपी में पुराने नेता रद्दियो में बदलते गये और नया कुछ वो ढूढ नहीं  पाये… कुछ ने ’उत्तम प्रदेश’ के सपने भी दिखाये लेकिन साइकिलों के पहियों में ही खो गये… जनसँख्या पर ध्यान देने की बजाय मूर्तियो की संख्या पर नेताओं का ध्यान ज्यादा दिखा… और इन सबने मुझे दूर, बहुत दूर कर दिया। …… अब अगर वो काउंसलर वो सवाल फ़िर से पूछेगी, वो अकेला हाथ भी उसे खड़ा  नही दिखेगा।

 

अभी अभी ’राजनीति’ देखकर लौटा हूँ… कुर्ते-पायजामे से डेनिम-नोन डेनिम पहने हुये  पात्रों को ’सिर्फ़’ राजनीति करते हुये देखा। भीड़ों को भटकते हुये देखा और इन पात्रों को उन भीड़ों को बरगलाते हुये। सबको उस ’कुर्सी’ तक पहुचने के रास्ते तलाशते देखा और उस कुर्सी के बाद एक डेड एन्ड को भी…

इस फ़िल्म ने राजनीतिक गलियारो में घुसते हुये  जो कहानियां दिखायीं, उन्हें  देखकर युवाओं के गंदी राजनीति में जाने के सपने को चोट ही लगनी चाहिये। सच्चाई कड़वी होती है और मै अभी इस कड़वेपन को महसूस कर रहा हूँ…

फ़िल्मी लिहाज से मूवी ने अंत  के कुछ पहले तक बांधे  रखा और अंत में जैसे अपनी ग्रिप छोड़ती नज़र आयी। इंटरवल तक कहानी में एक कसावट थी जिसे मैंने अपने आस पास भी महसूस किया। इंटरवल के बाद की कहानी ओबवियस होती गयी और अंत बेहद फ़िल्मी… फ़र्स्ट हाफ़ तक कहानी महाभारत जैसी लगती रही… सेकन्ड हाफ़ मे जबरदस्ती इसे महाभारत बनाने की कोशिश सी दिखी… कहानी मे काफ़ी कुछ परोसकर रखने के बजाय, बिटवीन द लाईन्स भी छोड़ा जा सकता था… अंत में बचे हुये मोहरों  के बीच करवाया गया युद्ध, महाभारत युद्ध कम और गैंगस्टर वार ज्यादा लगा और उस वक्त समर के हाथ मे दी गयी पिस्टल, एक इंटेलीजेंट पात्र को बेहद फ़िल्मी बना गयी।

 

poster-3आखिर में मुझे बस एक चीज़ ने कचोटा कि क्या होता अगर एक जागरुक, दलित नेता ’सूरज’ जो इस राजनीति में सबसे गंदा होते हुये भी कईयों से साफ़ था, अंत में कुर्सी पर बैठता और न कि ‘इंदु’  जिसने जमीनी सच्चाई कभी देखी ही नहीं थी, जिसे इन सारे पात्रों में से राजनीति की सबसे कम समझ थी?

Thursday, May 6, 2010

थोड़ी गोसिप…

- हेलो  सर! मैं ___ बोल  रही  हूँ ___ बैंक से 
- हम्म…
- सर, आपको  पर्सनल  लोन  की  रिक्वायरमेंट है? 
- नहीं। 
- सर , कोई  रेफेरेंस ?

(रेफेरेंस?? मैं  जानता  ही  किसे  हूँ…  मुझे  भी  तो  कोई  नहीं  जानता… मैं  खुद  भी  तो  खुद  को  ही  नहीं  जानता…  फिर  किसका  रेफेरेंस  दूं…)
- ...............नहीं, नो रेफेरेंस।


2415943993_e158f2e4c7 फेसबुक पर  रोज़  ही  एक  दो  नयी  फ्रेंड रिक्वेस्ट्स आ  जाती  हैं… फ्रेंड  काउंट बढ़ता  जा  रहा  है… ब्लॉग  का   फीडकाउंट  भी  बढ़  ही  रहा  है…

बस  मैं  घटता  जा  रहा  हूँ …  रोज़  रोज़… थोडा  सा… जैसे,  नयी  सरकारी  रिपोर्टों  में  गरीबी  घटती  जा  रही  है…… जैसे  नक्शों  पर से  गाँव  घटते  जा  रहे  हैं…… जैसे मुम्बई से यूपी/बिहार के लोग घटते जा रहे है…

 
वैसे ही मेरा  आसमान  भी  छोटा  होता  जा  रहा  है…  मेरे  समुन्द्र  भी  सिकुड़ते  जा  रहे  हैं…  जैसे,  ये  कोने  में  पड़ा  ख्वाहिशों  का  गुब्बारा  सिकुड़ता  जा  रहा  है,  जो  श्रीकांत  ने  इजिप्ट जाने  से  पहले  अपने  पैसों  से  मेरे  लिये  खरीदा  था  और  शायद  पहली  बार  'डिवाइड  बाई  टू' भी  नहीं  किया  था…


बस साँसें  वैसी  की  वैसी  हैं… मेरी  ज़िन्दगी  मे  उलझी  हुई, लेकिन चलती हुई…… जैसे,  सीडी  ड्राइव  में  एक  सीडी  फंसी  हो  और  बार  बार  बाहर  निकलने  की  कोशिश  कर  रही  हो… जैसे  कमरे  में  गलती  से  कोई  फतिंगा  फंस  गया  हो  और  हर  दीवार  में  एक  खिड़की/रोशनदान  ढूँढने  की  कोशिश  कर  रहा  हो…  जैसे  कोई  बंधुआ  मजदूर  मजूरी  करता  ही  जा  रहा  हो… जैसे  मेरी  लिखी  कुछ  इधर उधर की लाइने  एक  कविता  बनना  ही  चाह  रही  हों... 

इन्हें  भी  तो  थोडा  आराम  चाहिए…  

तो क्या मैं भी ’प्यासा’ के किरदार की तरह सारी दुनिया के सामने ये चिल्लाकर कह दूँ कि ’जो तुम मुझे समझ रहे हो, वो मैं नहीं हूँ। वो तो कबका मर चुका है।’ लेकिन फ़िर वो पूछेंगे कि कैसे मरा तो क्या जवाब  दूँगा? आगजनी के आरोप मे अन्दर न कर दे…? आत्मदाह ही तो किया था… कुछ आत्माये ही तो जलाये थी…

या आसमान की तरफ़ देखते हुये कह दूँ कि ’तलाक, तलाक… तलाक’

या चिल्लाऊ जोर से कि ’आई नीड सालवेशन’……

 


चंद रेखाओं में सीमाओं में
ज़िन्दगी  कैद  है  सीता  की  तरह,
राम कब लौटेंगे मालूम नहीं,
काश, रावण ही कोई आ जाता.......

                            - कैफ़ी आज़मी

Friday, April 23, 2010

अहसान फरामोश सा एक दिन..

234705442_2b7a231b6d दिन कभी कभी कितनी बेतरतीब तरीके से शुरू होता है जैसे उसे भी मेरे साथ ही ऑफिस जाना है... मैं तो लेटलतीफ हूँ लेकिन उस कमीने को मुझसे भी जल्दी रहती है...
 
कहने को तो वो हमेशा मुझसे पहले ही उठता है लेकिन हमेशा ही उस एक वाश बेसिन के लिए हम दोनों फाइट करते हैं... फिर एक ही मिरर में डिफ़रेंट डिफ़रेंट एक्सप्रेशंस लाते हुए ब्रश करते हैं... मैं अपने बढ़ते हुए बालों को देखकर खुश होता हूँ… पोनी टेल रखने की ख्वाहिश आलमोस्ट पूरी होती दिखती है.. और दिन, उसे इससे कोई मतलब नहीं.. वो तो हर पल बस गुज़रता जाता है...

घर से बाहर निकलता हूँ... मोबाइल पर टाइम देखता हूँ... रोज़ की तरह 'लेट' हूँ... सब कुछ इस कमीने दिन की वजह से... क्या बिगड़ जाता अगर वो मेरे उठने के बाद उठता... थोडा सा मुझसे पीछे चलता तो क्या वो छोटा हो जाता... भरपाई करने के लिए ऑटो में बैठता हूँ.. सदियों से बोरीवली से गोरेगांव की बस नहीं पकड़ी है... एक आत्म चिंतन जरूरी सा लगता है.. रोज़ रोज़ एक तरफ के ये 60-70 रुपये बहुत भारी हैं...

बाइक खरीद लेता हूँ... पर अच्छे से चलानी नहीं आती.. कार... नहीं , पहले से काफी चीज़ें प्रायरटाइज़ हैं...वो ज्यादा जरूरी हैं ... एक अच्छी साइकिल ले लेता हूँ... पर ये गर्मी... ऑफिस जाकर फिर से नहाना पड़ेगा ...

"साहेब ब्रिज के ऊपर से या नीचे से..."
हब माल आ गया है...
"नीचे से.. राईट साइड में रोक दीजिये..."
रिक्शा से उतरता हूँ... सोंचता हूँ कि कल घर से और जल्दी निकलूंगा... सारे घोड़ागाड़ी के ख्याल फुस्स हो चुके हैं...

ऑफिस आकर बैठता हूँ... सिस्टम अनलाक करता हूँ और अपने मूड को बूट मारता हूँ... मेरी मूड मशीन न जाने किस जमाने का प्रोसेसर यूज करती है… ये बूट होने में बड़ा टाइम लेती है और जब तक ये बूट नहीं होती मेरा किसी से बात करने का मन नहीं करता...

cubicle में एक ख़ामोशी है... शायद सब मेल चेक कर रहे हैं...

और मैं ये टाइप कर रहा हूँ... मूड अभी भी बूट हो रहा है...



टाइटिल डाक्टर अनुराग की एक नज्म से बिना पूछे उठाया हुआ :)

Monday, April 19, 2010

सबसे बडा टिकट..

कहते है एक तस्वीर कई हज़ार शब्दो के बराबर होती है… :)

 

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बहुत खुश हू और बहुत एक्साईटेड भी… दिमाग मे तरह तरह के विचार भी आ रहे है.. जैसे बैनर पर क्या लिखू.. क्या पहनकर जाऊ.. इत्यादि… इत्यादि… :)

 

वैसे काफ़ी तमन्नाये ऐसी भी है जिनका पूरा होना बहुत मुश्किल दिखता है जैसे:

- ओल्ड ट्रैफ़र्ड स्टेडियम मे बैठकर रोनाल्डो को मानचेस्टर यूनाईटेड के लिये खेलते हुये देखना.. (आजकल ये रीयाल मैड्रिड मे है..)

- किसी टेनिस स्टेडियम से फ़ेडरर और नडाल को किसी ग्रैंडस्लैम के लिये जूझते हुये देखना…(उन दोनो की फ़ार्म और अपनी जेब, दोनो को देखकर ऐसा होना बडा मुश्किल लगता है…)

 

 

 

(*If I am violating any kind of law by putting this image over here. Kindly let me know. I will surely do the needful.)

Friday, April 16, 2010

ख्वाहिशो की स्टेटस रिपोर्ट

4316811677_b0e7bcf1c6 आसमान तब भी उतना ही बड़ा था… बारिशें तब भी पूरा ही भिगोतीं थीं… वो पानी के बताशे तब भी लार गिरवाते थे… और वो आइसक्रीम तो उफ़्फ़…

अस्थमा मरीज होने के कारण ठंडी चीज़ें खाना मना था… मतलब घर वालो के सामने खाना मना था… बाहर तो बस कुल्फियों के दौर चलते थे… तबियत खराब होने पर पुछाई होती थी कि क्या खाया, कब खाया… तो हम कोई हरिश्चन्द्र थोडे ही थे…

सपनो की एक दुनिया थी जहा के हम सिकंदर थे… सपनो मे हम स्ट्रीट हॉक की बाईक चलाते थे… तो कभी एक ओवर मे छह छ्कके मारते थे… आस पास काफ़ी काल्पनिक पात्र थे- सुपर कमांडो ध्रुव तब इसलिये अच्छा लगता था कि उसके पास कोई स्पेशल पावर नही थी और वो हमारे जैसा आम इन्सान ही था… ईश्वर जैसे काल्पनिक पात्र से तो हम घन्टो बतियाते रहते थे और बात बात पर कुछ न कुछ माँगा करते थे…

फ़ूफ़ा जी इरीगेशन डिपार्ट्मेन्ट मे इन्जीनियर है… हमे लगता था कि बडे पैसे वाले है… एक बार चुपके से खत लिखकर दांत चियारते हुये कुछ बोर्ड गेम्स की ख्वाहिश जाहिर कर दी… बोर्ड गेम्स तो आये पर माता श्री ने हमारी अच्छी क्लास ली और इन ख्वाहिशो को वहीं विराम लगा… अभी कुछ दिन पहले बनारस गया था… बोर्ड गेम्स की उमर तो निकल गयी थी…   फ़ूफ़ा जी बोले चलो आज तुम्हे ज़िन्दगी की सच्चाई दिखाये… कुछ फ़िलोसोफ़िकल मूड मे थे… नही तो हम कुछ अज़ीब से मूड मे रहे होगे जो उन्होने पढ लिया होगा…

जो भी हो, थोडी देर मे हम लोग मणिकर्णिका घाट पर खड़े थे… लाशें धू धू करके जल रही 4123919016_4719912769थी… लोग बिलख रहे थे… वहीँ कुछ लोग लकड़ियाँ बेच रहे थे… चन्दन की वीआईपी लकड़ियाँ भी थी… फ़ूफ़ा जी हमको समझा रहे थे कि ये कटु है लेकिन सत्य है… सबको यही आना है…

और हम सोच रहे थे कि ख्वाहिशे भी कैसी कैसी… कुछ ख्वाहिशे जो जल रही है और कुछ वही तराजुओ पर तौली जा रही है…

ज़िन्दगी की इस रेलगाड़ी में ख्वाहिशो को हर प्लेट्फ़ार्म पर चढ़ते-उतरते देखा है… बुद्धा की तरह मैं भी पशोपेश में हूँ कि ज़िन्दगी का लक्ष्य क्या होना चाहिये?

 

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अपनी पहली कविता जो मैने ८-९ साल की उम्र मे लिखी थी और जो लखीमपुर खीरी के एक लोकल डेली मे छपी थी… बडे बडे कविगण किसी बात का कोई शक न करे… उस जमाने मे वो पेपर वकीलो को फ़्री मे मिलता है… यानी उसे कोई नही पढता था… वैसे पढता उसे अभी भी कोई नही है :)

 

मेरे घर मे आयी टीवी
मैने उसमे देखी बीवी

’चित्रहार’ मे आया गाना
कल – परसो तुम भी ले आना॥

सब – पढ्ते है उपन्यास
सोमवार को आया ’उपन्यास’,

मंगलवार को आये ’हमराही’
बुधवार को ’तलाश’ की बारी

गुरुवार को ’बानो – बेगम’
शुक्रवार को ’संघर्ष’ का कार्यक्रम

नाट्क देखो बडा विशाल,
शनिवार को आया ’मशाल’,

समाचार मे आया टैंकर
रविवार को आये ’अम्बेडकर’

फिर बच्चो कि चुनिया मुनिया
सोमवार को ’नन्ही दुनिया’॥

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नवम्बर २००६ मे पहली पोस्ट डालने के बाद आज अप्रैल २०१० मे हमने सैकड़ा पूरा किया है… अपने आलसीपने पर फ़िर कभी बात करते है… फ़िलहाल बधाई के अलावा आप हमारी गुल्लक मे अपने तजुर्बे की कौडिया डाल सकते है…

ज़िन्दगी का लक्ष्य क्या होना चाहिये?

……

……

Wednesday, March 31, 2010

चंद मुलाकातों की है दिल कि कहानी!!

nonameकई  बार  यूँ  भी  होता  है  कि  ज़िन्दगी  कि  राह  पर  चंद  मुस्कुराहटें  पड़ी  मिल  जाती  हैं... कुछ  कुछ  उस  ५ रूपये के  सिक्के  कि  तरह  जो  मुझको कभी कभी  मोर्निंग ट्यूशंस  के  वक़्त  मिल  जाता  था  और  फिर  सुबह  सुबह  ही  उससे  जलेबियाँ  खायी  जाती  थीं...  

उस  सिक्के  ने  मंगलवार  के  मेरे  काफी  व्रत  भी  तुडवाये  हैं…

इन मुस्कुराहटो के लिये कभी कभी बस  सर  उठाकर  अपने  आस  पास  के  लोगों  को  देखने  भर  की  जरूरत  होती  है.. कभी  कभी  कुछ  बातें करना  भी  जरूरी  होता  है.. ऐसे  ही  चंद मुलाकातें  मैंने  यहाँ  सजाई  हैं  -

 

 

सब्जी  वाली  आंटी

अकेले  लड़के  होने  के  सुख  कम  होते  हैं  और  दुःख  ज्यादा  जैसे  आप  खाना  नहीं  बना  पाते  और  अपने  कपडे  तक  खुद  नहीं  धो  पाते.. रुमाल  और  मोज़े  तो  तब  तक  चलते  हैं, जब  तक  आपकी  आत्मा  न  बोल  दे  की  बस  भाई  अब  तो  रहने  दे.. 

मैं  आजकल  इन  सो  कॉल्ड  सुखों  से  ऊपर  उठने  की  कोशिश  कर  रहा  हूँ... आर्गेनाईज़ और  इन्डिपेन्डेन्ट बनने  का  काम युद्ध  स्तर पर चल  रहा  है..  आजकल   डिनर  खुद  से  ही  बनाने  की  कोशिश  करता  हूँ.. और  अपने  जले  हुए  खाने  को  भी  'वाह  वाह' करते  हुए  खाता  हूँ  :)


हाँ  तो  एक  दिन  चोखा  खाने  का  मन  था.. ऑफिस  से  आते  हुए  हम  सब्जी  वाली  आंटी  के  पास  पहुंचे  और  देखा  तो  वहां  टमाटर  का  नामोनिशान  नहीं.. ये  मेरे  साथ  होना  बहुत  ही  आम  बात  है.. मेरी  ख्वाहिशें  छोटी  हो  या  बड़ी, कभी  आसानी  से  पूरी  नहीं  होतीं..


- कुछ  और  ले  लो 
- नहीं, रहने  दीजिये.. आज  चोखा  खाने  का  मन   था  और  टमाटर   ही  नहीं  है  :(
- वो  आज  जल्दी  ख़त्म  हो  गए 
- हम्म… लेकिन  आज  बड़ा  मूड  था… चलिए  कोई  बात  नहीं ।
(उन्होंने  मराठी  में  अंकल को कुछ  बोला  और  किसी  बात  को  लेकर  दोनों में कुछ चर्चा हुई फिर  उन्होंने  अपना  पर्सनल  थैला  खोला  और  उससे  एक  टमाटर  निकाला)

- २  ही  टमाटर  बचे  थे, मैंने  आज  रात  के  खाने  के  लिए  रख  लिए  थे.. एक  आप  ले  लो.. वैसे  भी  एक  से  काम  हो  जायेगा..
- नहीं, नहीं.. आप अपने टमाटर रखिये.. मैं कल ले लूँगा..
- अरे   ले  लो.. इसका पैसा भी मत  देना  :)
- नही, बिल्कुल नही… आपको पूरा नहीं  होगा..
(मेरी बात काटते हुए)
- बैग लाये  हो… रुको, (पोलिबैग  में  एक   टमाटर  रख  दिया  उन्होंने… )


फिर  मैंने  उनसे  बाकी  सारी  सब्जी  ली..
वो  सिर्फ  एक   टमाटर  नहीं  था.. वो  उन  'दो' टमाटरों  में  से  एक  टमाटर  था  जो  उन्होंने  खुद  के  खाने  के  लिए  बचाया  था..


मैं  अगर  ज़िन्दगी  भर  भी  वहां  से  सब्जियां  लेता  रहूँ  तब  भी  उसका   मोल  नहीं   चुका  सकता॥


बाबु  साहिब

अपना  बनाया  खाना  खाने  का  एक  दर्द  भी  है.. आप  गलती  से  ज्यादा  बना  लेते  हैं  और  फिर  'बर्बाद  न  हो  जाए' के  डर  से  सब  खा  जाते  हैं… और  फिर  वो  होता  है  जिसकी  कल्पना  मात्र  से  भी  डर  लगता  है…  ये  पापी  और  जालिम  पेट अपना  अस्तित्व  दिखाना  शुरू  कर  देता  है…


आजकल  जिम नहीं  जा  पाता… योग  भी  धीरे  धीरे  'रेगुलरली  इरेगुलर' होता  जा  रहा  है.. लास्ट  टाइम  बाबु  सी  मिश्रा  के  ब्लॉग  पर  ही  कपालभाती  की  थी :P  तो  पेट  का  निकलना  स्वाभाविक  है  इसलिए  आजकल  अपनी  हेल्थ  कांशस आत्मा  को  ब्रेकफास्ट  के  नाम  पर  कुछ  फल  खिलाकर  चुप  करवा  देता  हूँ…


एक  फल  वाले  बाबा  से  रोज  सेब  या  केले  खरीदता  था… कभी  पर्सनल बात  नहीं  होती  थी… बस  वो  बोलते  थे  की  आज  अनार  खाइए  तो  अनार  खा  लिए… आज  अंगूर  अच्छे  लाया  हूँ, तो  अंगूर  ले  आया…

एक दिन:


- आप  क्या  करते  हैं  साहिब?
- कंप्यूटर  इंजिनियर  हूँ 
(सॉफ्टवेयर  इंजिनियर  बोलना  सवाल  जवाब  को  और  बढ़ाना  होता)
- अच्छा… हमारे  लड़के  भी  CA हैं
- अरे   वाह 
(मैंने  एक  ब्रोड  स्माइल  के   साथ  उन्हें  पूरा  अटेंशन दिया)
- बनारस  के  रहने  वाले  हैं  हम  लोग, बहुत  पहले  हम  हियाँ  आये  थे.. पहले  रिक्शा  चलाते  थे, उसके बाद ये फ़ल बेचने का काम शुरु किये…  
- अच्छा, और  आपके  बच्चे  आपसे  कुछ  नहीं  कहते?
- गुस्सा  करते  हैं  ऊ  सब, कहते  हैं  की  काहे  जाते  हो.. हम  लोग  क्या  कम  कमा  रहे  हैं... लेकिन, हम  भी  बोल  देते  हैं  की  भाई उम्र  भर  हम  यही  सब  किये  हैं, अब  आखिरी  वक़्त  कैसे  बदल  जायेंगे...
- बात  सही  है!
- इसलिए  जब  बच्चों  के  दोस्त  या  जानने  वाले  आते  हैं  तो  हम  उनसे  नहीं  मिलते  और  हमारे  जानने  वालों  से  उन्हें  नहीं  मिलाते
(उफ़्फ़्, ये बडे बडे शहरो की समझदारी )। हम  उनसे  बोल  देते  हैं  की  इसी  ठेले  से  तुम  लोग  बाबु  साहिब  बने  हो…
- एकदम  सही.. हम  जितना  ऊपर  उठ  जाएँ  हमें  अपनी  मिट्टी को नहीं  भूलना  चाहिए॥
- साहिब, हम  बैठ  जाते  हैं  तो  हमारी  चाय  और  बीडी  का  पैसा  निकल  आता  है... अब  ज़िन्दगी  भर  इसी  ठेले  से  उन्हें  बनाये  हैं  तो  आखिरी  वक़्त  अब  बीडी  के  लिए  भी  उनसे  पैसे  माँगना  अच्छा  नहीं  लगता… आप  आज  बेर  लीजिये… बम्बइया बेर  है…एकदम मीठे..

कभी  कभी  कुछ  बातें  आपको  वो  समझा  देती  हैं  जिन्हें  दूसरों  को  समझाने  के  लिए  आपके  पास  बोल  नहीं  होते.. उस  दिन  कुछ  ऐसी ही  चीज़े समझी  थी मैंने..

 

नालायक

दिसम्बर  के  आस  पास मैं ज़िन्दगी  के  एक  'कम  अच्छे  दौर'  से  गुज़र  रहा  था… ख़राब  दौर  नहीं  कहूँगा…

ज़िन्दगी  हंग  हो  गयी  थी… उस  वक़्त  इच्छाशक्ति  ढूंढ  रहा  था… जो  मेरे  लिए  ctrl alt del का  काम  करे.. लेकिन  हंग  स्टेट  में  कभी  कभी  टास्क  मैनेजर भी  हंग  हो  जाता  है, तब  इम्प्रोपर शट डाउन  के  अलावा  कोई  आप्शन  नहीं   बचता...


जब  भी  सोचने  बैठता  था  तो  सोंचता  था  की  क्या  सोंचूं…

रात्रिचर  होता  जा  रहा  था.. और  उसी  वक़्त  बतियाने  के  लिए  याहू  रूम्स  की  शरण  ली.. एक  बंदी  मिली  (नाम उसने आजतक  नहीं  बताया) जिसके  फलसफे  बड़े  अजीब  थे… कभी  मुझसे  हनुमान  चालीसा  सुनाने को  बोलती  तो  कभी  खुद  भजन  सुनाती…  रात  के  तीसरे  पहर  ऑफिस से आने के बाद मैं  उसे  याहू पर हनुमान  चालीसा  सुनाता, 'द स्पीकिंग ट्री' पर  कुछ  बातें  होती  और  उसके  बाद  सुबह  सुबह  5:15 बजे  मैं  वाक  के  लिए  चला  जाता… मै उस आध्यात्म को याहू पर ए़क्स्प्लोर कर रहा था जो मै अपने उस छोटे से शहर मे छोड आया था…

 

बाहर  सुबह  की  एक  चाय  होती, नेशनल  पार्क के सामने वाले मन्दिर मे सुबह सुबह शिव दर्शन और  फ़िर हमउम्र  बुद्धों  के  साथ  नेशनल  पार्क  के  अंदर  की  एक  सैर…

 

वहां  एक  dogy मिल  गया  था  मुझे… उसका  नाम  मैंने  रखा  था  'नालायक'… जिनती  गालियाँ  मैंने  उसे  दी  होंगी  उतनी  शायद  ही  किसी  को… मै उसके  कान  पकड़  के  उसे  थप्पड़  मारता  और  मेरी  इन  सैडिस्टिक हरकतों  के  बावजूद  वो  मुझसे  चिपक  जाता  और  कभी  'पार्ले -जी' तो  कभी  'टाइगर' बिस्किट्स खाता…


अभी  सुबह  की  चाय  कम  ही  हो  पाती  है, लेकिन  आज  भी  वो  जब  भी  मुझे  बाहर  पा  जाता  है… बस  चढ जाता  है  मेरे  ऊपर… कई  बार  तो  मैं  जान  भी  नहीं  पाता  और  एकदम  से  मेरे  पीठ  पर  कोई  दो  पैर  रख  देता है… पलटता  हूँ  तो  वो  आँखें  चुराता  है…

 

अब  उसे  कभी  कभी  'गुड  डे' भी  खिला  देता  हूँ  आखिर  वो  'नालायक' मेरे  कम  अच्छे  दिनों  का  साथी  है… और  कम  अच्छे  दिनों  में  नालायक दोस्त  ही  साथ  निभाते  हैं…

 

P.S.  आज अंगूर लेते समय एक अपडेट मिली कि फ़ल वाले बाबा के लडके की सेलरी बढ गयी है :)

 

Friday, March 26, 2010

वो कायर है......

theater-masks-1 उसकी  एक  पर्सनल   डायरी  के  इंट्रो  में  लिखा  है  - 'मैं  कायर  हूँ'.. उसने  ये  सच  गाँधी  जी  की  आटोबायोग्राफी  से  प्रभावित  होकर  लिखा  था.. उसे  लगता  था  की  उनकी  तरह  वो  भी  सच  स्वीकारने  की  क्षमता  रखता  है... (मोसो  कौन  कुटिल,  खल,  कामी)


आजकल  वो  उस  डायरी  को  नहीं  पढता.. उसमें  पेसिमिज्म  की  बू  आती  है... एक  सड़ी  हुई  गंध,  जिसे  वो  आजकल  बर्दाश्त  नहीं  कर  पता....


उन  दिनों  उसे  लिखने  का  नशा  था... दुनिया  बदलने  के  हंसी  ख्वाब  थे  जिन पर  वो  कब  खुद  पाँव  रखकर  आगे  बढ़  गया, नहीं  पता...


तब  उसकी  दुनिया  बहुत  छोटी  थी.. बस  उसकी  कविताओं  को  अपना  नाम  देने  वाले  कुछ दोस्त और  उसको  पाज़िटिवली  क्रिटीसाईज़ करने  वाले मुट्ठी भर लोग... अभी भी दुनिया कुछ बडी नही हुयी है पर अब  वो  'दुनिया'  शब्द  सुनते  ही  कान  बंद  कर  लेता  है...


उसके  शब्दों  में कभी  भी  जादू  नहीं  था.. लफ्ज़  हमेशा  हल्के  थे... बस  भावनाओं  में  टूट  के  लिखता  था.. रस्किन  बोंड  की  तरह…


मुझे याद है एक  दिन कोलकाता  में  उसके  हाथ  पाउलो  कोहेलो की  ’ज़हीर’  लग  गयी  थी... उसने  चंद पन्ने  पढ़े  थे  और  उस  किताब  को  हमेशा  के  लिए बंद  कर  दिया  था  और  खुद  लिखने बैठ  गया  था.... वो  लगातार तीन  दिन ऑफिस  नहीं  गया.. ऐसे  लिख  रहा  था  जैसे  कोई  महाकाव्य  लिख  रहा  हो ... तीन  दिन  बाद  जब  वो  इस  नशे  से  उतरा  तो  उसने  उन  पन्नो  को  फाड़ के  फेंक  दिया था.... और खुशी खुशी ऑफिस जाता था।


आज  उसे  उस  बात  पर  कोई  अफ़सोस  नहीं  है... और  आज  भी  वो  क्रोस्वर्ड्स में  पाउलो  केहलो  की  बुक्स  को  बस  देख  के  रख  देता  है... 'Alcehmist' और  'Veronica decides to die' घर  में ही  कहीं  खो  गयीं  है.. लास्ट  टाइम  फ्लैट  बदलने के वक़्त दिखीं  थी...
…………………

…………………

वो  आज  लिखता  नहीं  है... सिर्फ  सोंचता  है... उसके  पास  कोई  सोचालय नहीं  है... वो  शौचालय  में  सोंचता  है... वो  बस  में  सोंचता  है.. ऑटो  में  सोंचता  है.. सोते  वक़्त  बुदबुदाता  भी  है  लेकिन  कोई  आवाज़  बाहर  नहीं  आती... उसके  मुर्दा  ख्याल  अपनी  अपनी  कब्रों  से  बाहर  आकर  एक  दूसरे  से  लड़ते  हैं  और  उसके  दिमाग  की  नसें  फूलने  लगती  हैं... खून  का  दबाव  बढ़ने  लगता  है.. वो  ये  सब  देख  सकता  है.. उसे  दिखता  है   की  शिराएँ  फूल  रही  हैं  और  वो  फट  जाएँगी.... वो  तपस्या करना  चाहता  है… घन्टो, महीनो, सालो बस उसी मे बैठे रहना चाहता है…

सोंचता  है  की  शायद   उससे  उसके  विचार  शांत  हो  जायेगे...लेकिन ...नहीं  नहीं..


वो  भागना  चाहता  है... दौड़ना  चाहता  है.. तब  तक,  जब  तक  वो  थक  के  गिर  न  जाए.. तब  तक,  जब  तक  वो  इन  विचारों  को  कहीं  पीछे  न  छोड़  दे... कहीं  बहुत  पीछे……

और  वो  भाग  रहा  है.. दौड़  रहा  है....

हफ़ हफ़ हफ़……हफ़………हफ़………हफ़………………………हफ़……………

 

हां  उसकी  पीठ  दिख  रही है…………

…………………

…………………

वो  आज  भी  कायर  ही है।

Saturday, March 20, 2010

कुछ एं वें ही..

random

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

Dumb Charades

तुमने वो सब कुछ, जो अपनी आँखों से बोला था,

ज़िन्दगी आजतलक हमे उनके मायने समझाती है॥

 

Rebellion

मैं रोज़ इस ज़िन्दगी से लडता था,

माओ और चे की तरह नही, एक आम आदमी की तरह

आज मैं मर गया हूँ और मेरे साथ मेरी क्रान्ति भी……

 

Riot

इक आक्रोशित भीड़ सी जमा कर रखी है,

अपने भीतर..

और एक निहत्था, दबा, कुचला इंसान भी,

आज भीतर दंगे हुए हैं…

शूट ऑन साइट का ऑर्डर है

आज ये इंसान मारा जायेगा……॥

 

Salvation

इन दस सरो का बोझ अब उठता नही है,

काश, कोई राम आये और मेरी भी नाभि फ़ोड दे……

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Sunday, March 14, 2010

वो अधेड़ तन्हा आँखें!!

lonely eyes

 

वो एक जोडी तन्हा आँखें,
खिड़की की उस जानिब से
हर राहगुजर मे कुछ
ढूढती रहती हैं……

और उनके पीछे रखी टीवी के
चैनल्स बदलते रहते हैं,
बेटा टीवी के रिमोट से खेल रहा है,
और वो आँखे अपनी यादो के रिमोट से…

अधेड़ उम्र है उन आँखो की,
किचन मे दूध के साथ
कुछ जले हुए सपने हैं,
कुछ सच्चाईया है, जो खुली खिड़की
से भी बाहर नही आती…
कुछ अन्तरंग लम्हे, जो वो शायद
खुद ही भूल गयी हैं….

उन आखो मे ज़िन्दगी से शिकायते हैं
और बेतरतीब से किये गये काफ़ी सवाल..
बाते हैं, ढेर सारी
जो वो जाने अन्जाने बोल ही जाती हैं……

वो मुझे एकटक देखती रहती हैं……
कुछ अनबोला सा बोलती रहती हैं……
मै आँखे नही मिलाता……

बस अपनी खिड़की बंद कर देता हू….

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कई बार कविताये/कहानियां कनक्लूज़न (conclusion) नही दे पातीं क्यूकि उनका कवि/लेखक या तो कायर होता है या कनफ़्यूज़्ड…

हमे पसरे हुए अगर कोई मोराल ओफ़ द स्टोरी दे दे तो ठीक……लेकिन ऐसे मोड पर लाकर छोड़ दे, जहाँ से आगे का रास्ता लिखने वाले को पता ही न हो और पढने वाले को खुद ढूढना हो…… तब ऎज़ अ रीडर, दिमाग कि धज्जिया उड जाती है। ऐसी कुछ कहानियो, कविताओ और फ़िल्मो ने मुझे कई रातो जगाया है……

ये आँखें मेरे सामने वाले फ़्लैट मे ही रहती है और अक्सर मैने इन्हे खिड़की पर ही बैठा हुआ देखा है। दिन भर, उसी खुली हुई खिड़की पर…… कभी कभी फ़्रस्टियाता हू तो सोचता हू कि इस हाउसवाइफ़ के लिये, ३५+ ज़िन्दगी के मायने क्या होते होंगे और वो भी बाम्बे जैसे शहर मे जहाँ हर जगह एक आईडेन्टिटी क्राईसिस है……

खिड़की बंद करने के अलावा मैं कुछ भी नही कर पाता…कुछ भी नही…

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Tuesday, February 23, 2010

पिछ्ले पन्नो से कुछ - रेत पे नाम!!

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सुना है यादें संजोकर रखी जाती हैं इस गतिमान पर स्थिर ह्रदय में.....

मेरी भी कुछ यादें उससे जुड़ी हुई हैं। न जाने हम कब तक समंदर के किनारे बैठे रहते थे, हर एक लहर को अपने पास आते और थोड़ा सा भिगोकर जाते हम साथ बैठे देखा करते। वो रेत पे मेरा नाम लिखती और में उसका। और अगली सुबह हम दोनों का नाम समंदर में समां चुका होता था। यह विशाल समंदर हमें पूरे दिन निहारा करता था। हमारी प्यारी बातें शांत भाव से सुना करता , हमारे झगडे पे मुस्कराता, वो मुझे घूंसे मारती और में भागता तो जैसे ये भी उसके साथ मुझे पकड़ने के लिए दौड़ता।

वो मुझे कहती थी की

"पंकज! ये लहरें हमारी बातें सुनने के लिए आती हैं न?"

"नही! ये सारे जहाँ से खूबसूरत इन पैरों में लिपटने आती हैं और इस ज़न्नत में मिल जाती हैं।"

वो मुझे धक्का देकर गिरा देती और खिलखिलाते हुए कहती

"धत! बेवकूफ"

और हम दोनों हंसने लगते। पर न जाने क्यों वो बार -बार मुझे हमारी दोस्ती ही याद दिलाती। क्या ये सब प्यार नही था? दोस्ती भी तो प्यार का दूसरा नाम है। एक दिन हिम्मत करके मैंने उससे कहा की "मै तुमसे प्यार करता हूँ"। उसने बड़े रूखे मन से टाल दिया। मैंने फिर कहा उसने अनसुना कर दिया। फिर धीमे से बोली

"तुम मेरे सबसे अच्छे दोस्त हो और में तुम्हारी दोस्ती खोना नही चाहती हूँ "।

मैंने अपनी पलकें बंद कर ली आँसूओ को आंखों में ही रोकने के लिए, पर एक-दो आंसू बाहर छ्लक ही आए।

दरअसल.. वो किसी मुकाम पे पहुँचाना चाहती थी और वह समझती थी की मेरा प्यार उसके पैरों में बेडियाँ दाल देगा। वो भूल गई की उसके मरे हुए आत्मविश्वास को मैंने ही साँसें दी थीं। मैंने ही उसे वो सपना दिखाया था। मै वहाँ से उठकर चला आया। अगले दिन उसने समन्दर किनारे आना छोड़ दिया। कुछ दिन बाद शहर भी छोड़ दिया।

अब समन्दर की रेत पर उसी का नाम था क्यूंकि मै तो उसी का नाम लिख सकता था।

इन रेतों में मेरा नाम लिखने वाला कोई नहीं था, कोई नहीं... ।

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ज़िन्दगी की किताब पर धूल जम गयी है……न जाने कबसे अपने बन्द कमरे की खिड्किया भी नही खोली…ताज़ी हवा से शायद अब दम घुट जाये… कम्फ़र्ट ज़ोन से बाहर आने का डर भी है……

मेरे काम की काफ़ी चीज़े मेरे तकिये के पास ही रहती है…बची कुछ चीज़े बेड से सटी हुई मेज पर… कुछ खास नही, बस ’अहा ज़िन्दगी!’ के कुछ पुराने एडीशन्स, ’क्रेस्ट’ की कुछ कापिया, चन्द किताबे जैसे अभी ’जापानीज वाईफ़’, ’कपोचीनो ड्स्क’,’स्लो मैन’ और ’फ़्रेन्च लवर’, मेरी कुछ बूढी डायरिया, पिता जी का एक पुराना पत्र, मेरे कमरे की चाभिया, वालेट और हमारा कम्पनी आई कार्ड…

खिडकी मेज के बगल मे है, खुलने से हवा चीज़ो को इधर-उधर कर सकती है…एक ऐसी ही हवा इस वीकेन्ड आयी थी……ज़िन्दगी की किताब के पन्ने इधर उधर कर गयी..ये भी भूल गया कि किस पेज पर था…कन्शन्ट्रेशन प्राब्लम मेरे साथ हमेशा से है…

२-३ दिन से पूरा साहित्यमय हो गया हू..और कुछ पुरानी पोस्ट्स खुल गयी है…… जिन्हे ऐसे ही हवाओ से छुपा कर रखा था….

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Sunday, February 21, 2010

स्वप्न!!

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तुम्हे क्या कहूं ख़ुद ही बताओ,
अपने नैनो की भाषा
हमें भी समझाओ,

शायर की ग़ज़ल कहूं या कहूं
'पंकज' की कविता,
आंखों को तेरी कमल कहूं
या सूर्योदय मैं सविता ।

झील सी इन आंखों को हल्के हल्के,
उठाने के बाद जैसे ही देखती हो,
हल्का सा मुस्कुराकर ,
जब कुछ कहती हो ।
पता नही क्यों कोई
झकझोरता है दिल को,
लगता है की हेमंत में आया हो
पवन का झोंका,
नस-नस में होती है चुभन
हृदय कहता है अब स्पर्श
कर ही लूँ तेरा तन,
स्पर्श करने से हाथ में आती
नही हो,
फिसलती हो ऐसे ॥

जैसे मैंने स्पर्श किया हो कोई स्वप्न!!
कोई स्वप्न...!!

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पुरानी हसीन यादो मे से कुछ यादे है जो ऐश्वर्य राय से जुडी है :) जवानी की दहलीज पर पाँव थे और अपने दोस्तो की गर्लफ़्रेडस मे इन्डायरेक्टली चर्चे…… वो कविताये, जो मै ऐश के लिये लिखता था, वो मेरे कमीने दोस्त उनके नामो के साथ उनकी  गर्लफ़्रेडस को देते थे… (सिर्फ़ कमीना बोलकर मै उन्हे बख्श रहा हू :))

एक डायरी थी जिसके हर एक पेज पर ऐश की फोटो थी…… एक बार उनका पता हाथ लग गया तो पिता जी की हार्ड अर्न्ड कमाई से वो डायरी उन्हे कोरियर कर दी गयी…उस जमाने मे कोरियर भी शायद बडी चीज थी…पता नही कि डायरी उन्हे मिली भी कि नही, पर एक अच्छा खासा कलेक्शन हाथ से गया :)

तब बस ’नीली’ या ’झील सी’ आँखे ही कविताओ मे बधती थी…ये सब कुछ ऊपर लिखी ’झील सी’ आँखो का एक्स्प्लेनेशन है….. :)

साफ़्टवेयर लाइन मे इसे प्रोएक्टिवनेस बोलते है!!! :)

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Sunday, February 14, 2010

स्टेचू….

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याद है, तुमने जब मुझे
भरी रोड पर ’स्टेचू’ बोला था,
वो लम्हा फ़्रीज़ हो गया था,
सिर्फ़ तुम्हारे एक ’पास’ के इन्तजार मे.....

आज जब ज़िन्दगी भागती है,
हर एक लम्हे पर पाव रखकर....
मै मजबूर लम्हो के बीच,
खडा सोचता हू, कि
तुम आओ और ’स्टेचू’ बोल दो....

और इस बार कोई ’पास’ नही.......

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P.S. सभी चाहने वालो को ’वैलेन्टाईन्स डे’ की शुभकामनाये… स्पेशली डा अनुराग को, जो आज के ही शुभ मौके पर विवाह के शुभ बन्धन मे बधे थे……

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