Saturday, March 20, 2010

कुछ एं वें ही..

random

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

Dumb Charades

तुमने वो सब कुछ, जो अपनी आँखों से बोला था,

ज़िन्दगी आजतलक हमे उनके मायने समझाती है॥

 

Rebellion

मैं रोज़ इस ज़िन्दगी से लडता था,

माओ और चे की तरह नही, एक आम आदमी की तरह

आज मैं मर गया हूँ और मेरे साथ मेरी क्रान्ति भी……

 

Riot

इक आक्रोशित भीड़ सी जमा कर रखी है,

अपने भीतर..

और एक निहत्था, दबा, कुचला इंसान भी,

आज भीतर दंगे हुए हैं…

शूट ऑन साइट का ऑर्डर है

आज ये इंसान मारा जायेगा……॥

 

Salvation

इन दस सरो का बोझ अब उठता नही है,

काश, कोई राम आये और मेरी भी नाभि फ़ोड दे……

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24 comments:

श्रीश पाठक 'प्रखर' said...

मै अपने सारे एहसास फिर से गिनती करने लगा हूँ..!

भाई शानदार लिखा है..! एं वें ही तो नहीं...ना...!!!

ज्ञानदत्त पाण्डेय Gyandutt Pandey said...

इस पोस्ट को पसन्द करने का कोई एक कारण है तो ये पंक्तियां:
मैं रोज़ इस ज़िन्दगी से लडता था,

माओ और चे की तरह नही, एक आम आदमी की तरह

आज मैं मर गया हूँ और मेरे साथ मेरी क्रान्ति भी……

Pankaj Upadhyay (पंकज उपाध्याय) said...
This comment has been removed by the author.
somyaa said...

Just Few lines - and profound poetic thought !!! :)

आनन्द वर्धन ओझा said...

आपकी क्षणिकाएं और कवितायें देखीं, अच्छी लगीं ! वे प्रभावित करती हैं !
'इन दस सरो का बोझ अब उठता नही है,
काश, कोई राम आये और मेरी भी नाभि फ़ोड दे...' कलिकाल में राम की आतुर प्रतीक्षा जन-जन को है !
हाँ--
'मुझे लिखो,
मैं कटी हुई उंगलियाँ हूँ,
जिसे समय की धारदार छुरी ने
काट लिया है !'
आपकी टिप्पणियों और मंतव्यों का समादर करता हूँ, आभारी हूँ !
--आनंद व्. ओझा.

"अर्श" said...

तुमने वो सब कुछ, जो अपनी आँखों से बोला था,
ज़िन्दगी आजतलक हमे उनके मायने समझाती है॥

बेहद खुबसूरत बात कही है आपने... सच कहूँ तो मेरे पास शब्द नहीं हैं... इस बात के लिए कुछ कहने के लिए...


अर्श

Apanatva said...

aapkee post bahut acchee lagee .
aapne mere blog par comment choda accha laga.
haar walee baat inderectly likhee gayee hai.


दौलत प्रदर्शन से
क्यों कर घबराए ?

लक्ष्मी जी की तो
असीम कृपा है उन पर
असामाजिक तत्व भी
पूरा साथ निभाए ।

maksad vo hee tha .......:)

दर्पण साह 'दर्शन' said...

आज बहुत दिनों बाद आपके ब्लॉग में आया ये कहां तो अनुचित होगा, पर आज बहुत देर तक ठिठक सा गया,
सच बताना क्या इंसान रोज़ नहीं मरता, macro इंसान ही नहीं , अपने अन्दर के इंसान को भी रोज़ मरते हुए देखा है.
सारी कि सारी मारक है, पर मेरी personal favourite दूसरी वाली है...
मैं रोज़ इस ज़िन्दगी से लडता था,

माओ और चे की तरह नही, एक आम आदमी की तरह

आज मैं मर गया हूँ और मेरे साथ मेरी क्रान्ति भी……




उस लगभग ढहती हुई दिवार से सटाकर...
जब अंगीकार करता हूँ तुम्हें ,
तुम्हारी पीठ से छुप जाती हैं...
हँसिया और हथौड़ा,
मैं एक आम कॉमरेड हूँ.

'अदा' said...

अरे क्या बात है पंकज ...
तुमने तो कमाल ही कर दिया...मैं तो बस हैरान हो गयी हूँ देख कर ...तुम्हारे सोच की पहुँच तो बस सुभानअल्लाह...
ज़बरदस्त ...

इक आक्रोशित भीड़ सी जमा कर रखी है,

अपने भीतर..

और एक निहत्था, दबा, कुचला इंसान भी,

आज भीतर दंगे हुए हैं…

शूट ऑन साइट का ऑर्डर है

आज ये इंसान मारा जायेगा……॥

जवाब नहीं ....

दिल खुश कर दिया तुमने...सच्ची...

दी..

कुश said...

कम शब्दों में गहरी बाते.. ओह! ये विधा मेरी फेवरेट है.. याद है मुझे जब मैं चे का नाम भी नहीं जानता था तब उसकी फोटो को अपने टी शर्ट पर छपवा कर लाया था.. वैसे मैंने भगत सिंह की भी फोटो छपवा रखी है.. मुझे दोनों ही काफी पसंद है.. नाभि को फोड़ने का ख्याल झन्नाटेदार है.. अन्दर तक खींच के ले जाने वाली बाते.. अभी बहुत कुछ है सीखने को मेरे पासपंकज..

हिमान्शु मोहन said...

बहुत ख़ूब पंकज!
सारी रचनाएँ बहुत बढ़िया हैं और इस ब्लॉग का अनुसरण प्रारंभ कर दिया है मैंने भी ।

रचना दीक्षित said...

बहुत अच्छी पोस्ट.आक्रोश झलक रहा है हर बात सोलह आने सच हर शब्द बोलता हुआ

M.A.Sharma "सेहर" said...

Interesting !Let youe emotions Flwo Pankaj!

हरकीरत ' हीर' said...

इक आक्रोशित भीड़ सी जमा कर रखी है,

अपने भीतर..

और एक निहत्था, दबा, कुचला इंसान भी,

आज भीतर दंगे हुए हैं…

शूट ऑन साइट का ऑर्डर है

आज ये इंसान मारा जायेगा……॥

पंकज जी लाजवाब कर दिया आपने तो ......इसे पढ़ कर तो ठिठक गयी ......सुभानाल्लाह ......!!



बस गज़ब.....गज़ब.....गज़ब........!!

सागर said...

जे बात... यह हुई ना मर्दों वाली बात.... कहाँ छुपे थे जनाब... जबरदस्त...

दिगम्बर नासवा said...

इन दस सरो का बोझ अब उठता नही है,
काश, कोई राम आये और मेरी भी नाभि फ़ोड दे…

बहुत लाजवाब लिखा है ... सच है इंसान कितने मुखहोते ला कर जी सकता है ...
समय का दर्द सिमटा हुवा है इन रचनाओं में ...

अनामिका की सदाये...... said...

dil k tufan ko itne saral shabdo me udail kar dhaala ja sakta hai...hatprabh hu...bahut acchhi rachna. badhayi.

आशीष/ ASHISH said...

Kuchh to baat hai ae rafeeq!
Bata tu itna sanjeeda kyun hai?
Sab keh kar bhi khamosh sa rehta,
Tu itna posheeda kyun hai?
Pankaj, I really liked your couplets. It has got an altogether different feel to it. You seem to say a lot.....
And, if you don't mind; I think it should be 'shoot at sight' and not 'shoot on sight'!

Pankaj Upadhyay (पंकज उपाध्याय) said...

Thanks for writing Ashish and it was so nice of you to find that..

BTW The idiom 'at or on sight' can be used interchangeably and 'on sight' should be a right word for it.
Kindly refer:http://www.thefreedictionary.com/sight

P.S There is a movie by Jag Mundra with the same title (Shoot on sight) and the lead role was played by Naseer Bhai..

संजय भास्कर said...

आपके लेखन ने इसे जानदार और शानदार बना दिया है....

संजय भास्कर said...

इस पोस्ट को पसन्द करने का कोई एक कारण है तो ये पंक्तियां:
मैं रोज़ इस ज़िन्दगी से लडता था,

Dimps said...

Hello ji :)

इन दस सरो का बोझ अब उठता नही है,

काश, कोई राम आये और मेरी भी नाभि फ़ोड दे……

I loved this one the most!!! Awesome concept :)

By the way, thanks for your comments, I read about 'Hedonism'

Thanks :)
Regards,
Dimple
http://poemshub.blogspot.com

अनूप शुक्ल said...

शानदार ऐं वैं है। जानदार च!

बाबुषा said...

sundar hain.