Sunday, March 28, 2010

फेंको ये किताबें...

हाँ  हाँ  यादों  में  है  अब  भी,

क्या  सुरीला  वो  जहाँ  था,
हमारे  हाथों  में  रंगीन  गुब्बारे  थे,
और  दिल  में  महकता  समां  था,
यारा  हो  मौला…

वो  तो  ख्वाबो  कि  थी  दुनिया,
वो  किताबो  कि  थी  दुनिया,
साँस  में  थे  मचलते  हुए  ज़लजले,
आँख  में  वो  सुहाना  नशा  था,
यारा  हो  मौला…

वो  ज़मीन  थी, आसमान  था,
हम  को  लेकिन  क्या  पता  था,
हम  खड़े  थे  जहाँ  पर,
उसी  के  किनारे  पर  गहरा  सा  अँधा  कुआ  था,

फिर  वो  आये  भीड़  बन  कर,
हाथ  में  थे  उनके  खंजर,
बोले  फेंको  यह  किताबे ,
और  संभालो  यह  सलाखें,
ये जो  गहरा  सा  कुआ  है, हाँ  हाँ  अँधा  तो  नहीं  है,
इस  कुए  में  है  खज़ाना, कल  कि  दुनिया  तो  यही  है,
कूद  जाओ  लेके  खंजर, काट  डालो  जो  हो  अन्दर,
तुम  ही  कल  के  हो  शिवाजी, तुम  ही  कल  के  हो  सिकंदर,


हमने  वो  ही  किया  जो  उन्होंने  कहा,
क्यूंकि  उनकी  तो  ख्वाहिश  यही  थी,
हम  नहीं  जानते  यह  भी  क्यू यह  किया?
क्यूंकि  उनकी  फरमाइश  यही  थी,
अब  हमारे  लगा  जायका  खून  का,
अब  बताओ  करे  तो  करे  क्या?
नहीं  है  कोई  जो  हमे  कुछ  बताये,
बताओ  करे  तो  करे  क्या??

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विद्यार्थियो को क्रान्ति के नाम पर बरगलाने वालो को ये तमाचा था… रोज़ कश्मीर मे आतंकवादियो और बाकी क्षेत्रो मे नक्सलवादियो के चक्कर मे आने वाले छात्रो के लिये ये एन्थेम होना चाहिये……

ये गाना ज्यादा पॉपुलर नही  हुआ… पीयूष मिश्रा के शानदार शब्द और इंडियन ओशियन का लाजवाब संगीत शायद लोगो के कानो के पार नही पहुँचा। हमारे हिन्दी समाज मे ऐसे चिल्लाते हुए गानो का ज्यादा प्रचलन भी नही है।

वेस्ट मे ऐसे कई सिंगर रहे जिन्होने वहाँ के सोते हुये समाज को जगाने की कोशिशे की। ऐसे गानो को प्रोटेस्ट सांग कहा गया और ये गाने जनता की आवाज़ बनते गये…

this_machine_kills_fascists साठ के दशक मे बाब डायलन ने इन गानो को एक नयी पहचान दी। उनके तकरीबन सारे गाने उस  समाज के शोषित वर्ग को सम्बोधित करते थे और उनपर होने वाली त्रासदियो को बताते थे… यहा तक कि इन्होने अमेरिका के सिविल राईट आन्दोलन मे मार्टिन लूथर किन्ग की रैलियो मे भी गाया…

वूडी एक ऐसे सिंगर थे जिन्होने वहा के फोल्क म्यूजिक को एक अलग परिभाषा दी और प्रोटेस्ट गानो को नये मायने। उनके गिटार पर लिखा होता था – This machine kills Fascists.

हाल मे ही एक फ़िल्म आयी थी – आई एम नाट देयर, जिसमे अलग अलग प्रोटेस्ट सिन्गर्स के पर्सपेक्टिव से बाब डायलन की ज़िन्दगी को दिखाया गया था। अवश्य देखे उसे..

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मैने ये सब क्यू लिखा?

बस इंडियन ओशियन का ये गाना सुन रहा था, इसका वीडियो जब यू ट्यूब पर ढूढा तो रिज़ल्ट अपेक्षा से बहुत ज्यादा कम दिखे… सोचा आपसे पूछू कि क्या आपने इसे सुना है??

P.S   इसी तर्ज़ पर अपने पसन्दीदा गाने भी जरूर शेयर करे……

19 comments:

PD said...

गुलाल..

Anonymous said...

हमारे हाथों में रंगीन गुब्बारे थे,
और दिल में महकता समां था,
यारा हो मौला… वो तो ख्वाबो कि थी दुनिया,


इन पंक्तियों ने दिल छू लिया... बहुत सुंदर ....रचना....

PD said...

वैसे कभी कभी मूड में होने पर नहाते समय चिल्ला चिल्ला कर ये गीत हम गाते हैं.. ;)

somyaa said...

Vikas ji ki rachna yaad aa gayi - Udaas ho jaata hu (ye sab dekh kar)...
jab aksar ye sab sunti hu... aisa lagta hai kisi ne ideal world se khinch baahar nikaal diya ho...
Bachho ke saath aur mahilaao ke saath hone waali har traasdi jyada gehri lagti hai...
bandook haath me sambhaale us pandrah saal ke bachhe ka chitra aankho ke saamne ghum jaata hai jise ye tak nahi yaad usne bandook kab aur kyun uthaayi thi?

Vivek Rastogi said...

गुलाल के गाने सुनना और इस्कॉन के लेक्चर सुनना यही दो जुनून हैं हमारे तो ।

कृष्ण मुरारी प्रसाद said...

अच्छी प्रस्तुति......
http://laddoospeaks.blogspot.com/

mukti said...

गाना पहले नहीं सुना था. अभी सुना. बहुत अच्छा लगा. एकदम झिंझोड़कर रख देने वाला.

dimple said...

गाना खत्म हो जाता है फिर भी कुछ पल रुक जाती हूँ.आगे और क्यूँ नहीं है?सवाल छोड़ जाता है.बताओ करे तो करे क्या और सही में..विद्यार्थियो को क्रान्ति के नाम पर बरगलाने वालो को ये तमाचा था… रोज़ कश्मीर मे आतंकवादियो और बाकी क्षेत्रो मे नक्सलवादियो के चक्कर मे आने वाले छात्रो के लिये ये एन्थेम होना चाहिये……

चंदन कुमार झा said...

यह गाना मैनें सुना है, बहुत ही बेहतरीन है यह !!

संजय भास्कर said...

हमारे हाथों में रंगीन गुब्बारे थे,
और दिल में महकता समां था,
यारा हो मौला… वो तो ख्वाबो कि थी दुनिया,


इन पंक्तियों ने दिल छू लिया... बहुत सुंदर ....रचना....

PD said...

Hi Pankaj, कभी मौका मिले तो इस लिंक को देखना.. मेरे ही ब्लॉग का है(छोटे आदमी ही अपने ब्लॉग का लिंक देते हैं, ऐसा तुमने ही पूजा के ब्लॉग पर लिखा था :P)..
मेरे द्वारा कुछ और गुलाल के गाने शुरू के दो पोस्ट में ही है.. :)

गीत

मनीषा पांडे said...

फिल्‍म तो एकदम फालतू थी, हां गीत बेशक अच्‍छा है। बहुत अच्‍छा। अच्‍छा तो आज तुम इस गाने के साथ वीकेंड मना रहे हो।

Pankaj Upadhyay (पंकज उपाध्याय) said...

@Anonymous
शुक्रिया.. वैसे ये मेरी रचना नही है :P

@PD
दोस्त, पढा तुम्हारी पोस्ट्स को.. हमारे सोचे काफ़ी मिलती है.. लम्बी बनेगी अपनी :) बस मिलने पर गाने गाकर बोर मत करना.. :)

@Somyaa
मुझे हमेशा लगता है कि मेरे लफ़्ज़ हल्के होते है लेकिन तुम हमेशा समझ लेती हो जो मै कहना चाहता हू :)

@Vivek ji
अच्छे शौक है, पाले रखिये :)

@Mukti
indian ocean को सुनना। अच्छा गाते है.. ’कन्डीसा’ बहुत फ़ेमस है और ब्लैक फ़्राईडे का एक गाना भी - ’अरे रुक जा रे बन्दे’

@Dimple
सही कहती हो कि सवाल छोड जाता है, इसी सवाल से तो बचाना है इन मासूमो को जिन्हे क्रान्ति के नाम पर ऐसे अन्धे कूओ मे फ़ेन्का जा रहा है..

@Chandan
धन्यवाद आपकी सहमति के लिये..

@मनीषा
हाँ रे, सुबह से ही जबान पर चढा हुआ था.. ब्लॉग पर निकालकर थोडा चैन मिला :)

कुश said...

इन्डियन ओशियन को तो रुक जा रे बन्दे से जाना है.. "यारा मौला" मैंने एक नहीं कई बार सुना है.. इसके लिरिक्स पर तो कुर्बान जाऊ.. अपूर्व की बात दोहराना चाहूँगा कि पियूष मिश्रा गुलाल में वो कर गए है कि अब कुछ ना भी करे तो बहुत है..

बड़े दिनों बाद अपने टेस्ट का मिला है कोई.. जोड़ी जमेगी.. क्या ख्याल है फौजी नंबर दो..

'अदा' said...

पंकज,
आजकल तुम्हारी लेखनी की धार पर बस निसार हूँ...
क्या ख्याल क्या रफ़्तार...सबकुछ लाजवाब..
दी..

डॉ .अनुराग said...

अरे रुक जा रे बन्दे .मुझे किक देता है ....ठीक गुलाल के गाने जैसा ....तुमने भी ऐसे ही मूड में ये पोस्ट डाली है ....इसलिए लय में है ....

हरकीरत ' हीर' said...

अब हमारे लगा जायका खून का,
अब बताओ करे तो करे क्या?
नहीं है कोई जो हमे कुछ बताये,
बताओ करे तो करे क्या??

अच्छा गीत है ......!!

सही कहा आपने विद्यार्थियो को क्रान्ति के नाम पर बरगलाने वालो को ये तमाचा ही तो है ..…!!

दिगम्बर नासवा said...

अब हमारे लगा जायका खून का,
अब बताओ करे तो करे क्या?
नहीं है कोई जो हमे कुछ बताये,
बताओ करे तो करे क्या ..

हर चीज़ इक नशा है और सब किसी न किसी नशे के शिकार हैं ....
नारे लगवाने वाले हाथों में खंजर लिए .... शिकारी ही तो हैं ....

अनूप शुक्ल said...

सुन्दर! लोगों की टिप्पणियां मजेदार हैं!