Friday, December 24, 2010

देजा वू

“जिया! मुझे लगता है पहले भी मेरे साथ ये सब घट चुका है। ये सब कुछ… मेरा इस वक्त जागना… बेमौसम नवंबर में बारिश होना… ”

“देजा वू?”

“शायद!… कितना खूबसूरत शब्द है न? देजा वू… कितनी ही भावनाओं को कितनी आसानी से कह देता है। कुछ और जोडना-घटाना ही नहीं पडता। बस सिर्फ़ एक शब्द। काश मैं भी कभी ऎसा कुछ लिख पाता!”

जिया उसकी किताबों वाली अलमारी से हटकर अब खिडकी पर आ गयी थी। खिडकी के काँच के उस पार नवंबर की बेमौसम बारिश थी और इस पार मनु।

“मनु! बेमौसम बारिश अक्सर उदास क्यों कर जाती है?”

“बेमौसम बारिश की बूंदों की बेचैनी और छटपटाहट उदास कर जाती है… जैसे अपनी ही आवाज की प्रतिध्वनि उदास कर जाती है। ऎसा लगता है कि उन्हें जिनतक पहुँचना था उन्होने अपने कान बंद किये हुये थे। जैसे वो उदास बैरंग चिट्ठियाँ थीं…”

“…जिन्हें उनके पते नहीं मिले?”

“और उन्हें वापस हमारे पास ही आना पडा। पता है, ये बडा भयानक है कि आप जिन्हें कुछ कहना चाहें, वो उसे ना सुन सकें। मैं अभी भी किसी फ़िल्म के ऎसे दृश्य को सोचते हुये भी डर जाता हूँ जहाँ कोई व्यक्ति कुछ कहना चाहता है और बगल से कोई ट्रेन तेजी से निकल जाती है। कहने वाला कह देता है और जिसे सुनना चाहिये, वो उन्हें सुन नहीं पाता। उन बच्चों के जैसे जो इस संसार में आ तो जाते हैं, लेकिन उन्हें कोई नहीं अपनाता…। उन कहानियों के जैसे जिन्हें कोई नहीं पढता।”

मनु अक्सर ऎसी बातें करते हुये अपनी कुर्सी से खडा हो जाता और कमरे में टहलने लगता। उसकी आवाज अब हर एक कोने से आती हुयी लगती। जिया की एक निगाह बाहर छिलती, रिसती बूंदो पर थी और एक निगाह मनु के चारों तरफ़ से छीलने को आते हुये शब्दों पर।

“लिखकर मैं कभी कभी अपने आप को पा लेता हूँ। लेकिन न जाने कितनी ही बार अपने आप को कहीं खो भी देता हूँ।”

“ये डरावना है!”

“और वो देखना, जो आपके साथ कभी हुआ ही न हो? कहीं से भी किसी भी व्यक्ति के भीतर चले जाना। उसके भीतर उसके जैसे ही होकर रहना और उसकी ही ज़िंदगी जीना जैसे वो जीता है। वैसे ही आसपास को स्पर्श करना, महसूस करना जैसे वो करता है। उसके ही जैसे सोचने को अपनी सोच से अलग रखते हुये सोचना।”…… “यूं ही कभी कभी उन घटनाओं का हिस्सा बन जाना जो आपकी अपनी कभी थीं ही नहीं इन फ़ैक्ट अपने जीते जी आप ने ऎसी किसी भी घटना के घटने के बारे में भी नहीं सुना… “

“बेहद अजीब है…”

“लिखना कुछ वैसा ही है। बेहद अजीब।”

मनु अपनी एक किताब उठाकर उसे सहलाने लगा। उसे सहलाते हुये वो घर की दीवारों के पार किसी दुनिया में चला गया।

“लिखना किसी खाली पडे घर में घुस जाने जैसा है जहाँ रहने वाले लोग अब वहाँ नहीं रहते। लिखना उन घरों में रहने जैसा है।”

उस कमरे में जैसे सब कुछ चुप हो गया। कई शब्द चुपचाप उसकी किताब से निकलकर उस कमरे में चारों तरफ़ फ़ैल गये। बस धीरे धीरे हल्की होती हुयी एक ध्वनि रही जिससे ये आभास होता रहा कि अभी अभी यहाँ देर तक रहने वाला कुछ कहा गया है।

“उन घरों में रहने जैसा जहाँ आपकी कही हुयी बातें दीवारों से टकराती हैं और फ़िर वापस आपके ही पास आ जाती हैं। हमें एक क्षण को लगता है कि ये तो वहाँ के रहने वालों की आवाज है लेकिन असलियत में वहाँ कोई नहीं होता।”

“तो लिखना अपनी ही आवाज को किरदारों की आवाज में सुनना है?”

मनु ने खिडकी खोल दी। जिया अभी भी खिडकी की एक तरफ खडी थी। खिडकी खुलने से बारिश थोडी तेज सी लगने लगी।

“लिखना अपनी आवाज को खो देना है…” मनु धीरे से बुदबुदाया।

उसका बुदबुदाना वैसे ही रह गया। खिडकी के पल्लों की चरमराहट और बारिश की तेज आवाज किसी ट्रेन के जैसे उसके कहे के ऊपर धडधडाती गुज़र गयीं।

जिया कभी कभार उस कमरे में अभी भी चली जाती है। उसे अब देजा वु शब्द मनु जितना ही खूबसूरत लगता है। उस कुर्सी पर अब कोई नहीं बैठता लेकिन मनु की वो बातें जैसे हमेशा से वहीं हैं। वहीं कहीं कूडे के डिब्बे में मुडे तुडे आधे अधूरे कागजों के संग या उसकी किताबों वाली अलमारी में रखी किसी किताब में छुपी हुयी या उसकी मेज पर फ़ैली मैगजीनों में दबी हुयी……।

वो घर अभी खाली है। जुलाई की धूप में भी कभी कभी उसे उसी खिडकी के बाहर नवंबर की बारिश सा आभास होता है। वो एक पल तो उसमें डूब जाती है फ़िर अगले ही पल मुस्कराते हुये सोचती है… देजा वु।

Sunday, December 12, 2010

लाईफ़ इन सेक्टर्स…

atomic किसी सेक्टर के एक कफ़े कॉफ़ी डे में घुंघराले बालों वाला एक लडका, एक खूबसूरत आँखों वाली लडकी की तस्वीर टिसू पेपर पर बना रहा है। तस्वीर कुछ यूं बनती है कि लडकी तुरंत ही अपने पैरों से उसे फ़ुटबाल की तरह किक मारती है। घुंघराले बालों वाला लडका, कबाब में हड्डी बने एक और लडके की तरफ़ देख मुस्कराते हुये कहता है कि “देखा! आजकल आर्ट की कोई  इज्जत नहीं दोस्त…”| फ़िर लडकी की तरफ़ देखकर बशीर साहेब का एक शेर कहता है:-

कोई हाथ भी न मिलायेगा जो गले मिलोगे तपाक से,
ये नये मिजाज का शहर है, जरा फ़ासले से मिला करो ॥

 

 

इसी नये मिजाज के शहर के किसी और सेक्टर में, मोमो की एक दुकान के पास इस शहरी समीकरण के लिये एक नया लडका, दूसरे से पूछता है कि “यहाँ मोमो कुछ ज्यादा ही नहीं चलते?””जिस शहर में चिंकियां चलतीं हैं दोस्त, वहाँ मोमो भी चलते हैं”

सामने नेक्स्ट के एक बडे शोरूम में बाहर रखी एलईडी पर धौला कुआँ रेप केस की ब्रेकिंग न्यूज आ रही है… अपोजिशन पार्टी के कार्यकर्ता हाथों में बैनर लिये प्रोटेस्ट कर रहे हैं – Save North East Girls

”शुक्र है, मुझे इन दोनो में से किसी का भी ’शौक’ नहीं!” नया लडका न्यूज देखते हुये बुदबुदाता है…

पास ही खडी कार से एक गाना बाहर आ रहा है - गल मिट्ठी मिट्ठी बोल…

 

कार की आगे वाली सीट पर एक लडका और एक लडकी के बैठे होने का आभास होता है। कार के काले शीशे चढे हुये हैं और इस गाने की आवाज के अलावा, उन शीशों के पीछे कुछ बनते, कुछ टूटते रिश्तों की कोई भी आवाज बाहर नहीं आती… बस सामने रखी एलईडी पर इस ब्रेकिंग न्यूज के वक्त ऎड बढ जाते हैं। बाजार को अभी भी इन खबरों का ’शौक’ है। नया लडका कार के काले शीशों से नजरें हटा कर मोमो को देखता है फ़िर नजरों को एलईडी की तरफ़ मोड देता  है। प्रियंका चोपडा कह रही हैं - व्हाई शुड ब्वॉयेज हैव ऑल द फ़न…

 

पास ही किसी और सेक्टर में एक बीयर शॉप के पास तीन कारें रुकती हैं… उनमें से तीन लडके उतरते हैं… काली पॉलीथीन में छुपी बीयर की बोतलें लेते हैं और फ़िर एक ही कार में बंद हो जाते हैं। बीयर की दुकान वाला नये ग्राहक से बडे गर्व से कहता है “सर बडी अजीब जगह है ये। यहाँ लोग कम हैं और कारें ज्यादा” नया ग्राहक मुस्कुराता है “अपनी ही दुकान पर पीकर बैठे हो? कितने पैसे हुये?” “सर यहाँ मकान और जमीनें कितनी भी मँहगी हो, कुछ चीज़ें बडी सस्ती हैं”

“क्या?” मुसकुराते हुए…

“अमीर लोग, गरीबों की ज़िंदगी और एल्कोहल…”

 

कार में बैठे लडके बीयर की बोतल फ़ोडने के लिये लड रहे हैं… कार का दरवाजा खुलता है… बीयर की बोतलों के फ़ूटने की आवाज के पीछे कार के म्यूजिक सिस्टम से आती एक दबी सी हल्की सी गाने की आवाज है…

ये शहर है अमन का, यहाँ की फ़िज़ा है निराली,
यहाँ पे सब शांति शांति है……

 

बीयर की बोतलों के काँच अभी भी जमीन पर दूर दूर तक बिखरे पडे हैं……

Sunday, November 14, 2010

कॉफ़ी हाउस की घडी…

वो हर रोज की तरह एक उदास दोपहर थी… सडकों पर इक्के दुक्के लोग चलते दिख जाते थे तो जैसे लगता था कि सब कुछ जीवित है नहीं तो सभी कुछ बडी उदासियत के साथ खामोश था जैसे कोई गमी थी… जैसे कोई उनका बहुत करीबी गुजर गया था और वे उसका गम मना रहे थे।

उस सडक से लगी कुछ दुकानें थी जो शाम को स्कूल, कॉलेज के जोडों के साथ हंसती, खिलखिलातीं थीं। लेकिन उस दोपहर वो सब भी उदास थीं। रेस्तरां शांत थे… आईसक्रीम पार्लर सुस्ता रहा था… कॉफी हाउस खामोश था… कभी कभी कोई धडधडाता हुआ ऑटो उस सडक से निकल जाता तो जैसे एक पल के लिये ये सब उठकर बैठ जाते… उस ऑटो को दूरतलक जाते देखते…। धीरे-धीरे वो आँखों से ओझल हो जाता और दूर कहीं से उसकी आवाज ’और दूर’ जाती हुयी प्रतीत होती… वो आवाज फिर कहीं चली जाती… खो जाती… कहीं दूर अंतरिक्ष में जाकर मिल जाती।

वो सडक फिर सूनी हो जाती… और दुकानें फ़िर उदास।

 

उसी उदास दोपहर में उस उदास कॉफी हाउस में अविनाश रोज की तरह उसके आने का इंतजार कर रहा था… । उसकी उम्र तकरीबन २५ से ३० के बीच थी, रंग गेहुँआ था और बाल इतने छोटे कि उन्हें संवारने की भी जरूरत नहीं थी। वो बार बार अपने मोबाईल को लॉक – अनलॉक करने में व्यस्त था… जैसे ऎसा करने से वो समय को आगे बढा सकता था और समय कम्बख्त जैसे उसके इस खेल में खुद ही उलझा हुआ था… एक पशोपेश में कि कितना आगे बढे और कितना पीछे…

 

उन दोनो की उम्र में तकरीबन १०-१५ साल का अंतर था। लेकिन वो उसे उसका हमउम्र ही लगता था। वो उससे हर वो बात नि:संकोच कह जाती थी जो उसी की उम्र के कई लडकों को ’तुम नहीं समझोगे’ कहकर टाल देती। दिया को ये बात बडी अजीब लगती कि अविनाश उम्र में उससे छोटा होकर भी उससे बडा क्यूं लगता था। वो बहुत कम बोलता था पर उन कम शब्दों को कहने के लिये भी जब वो अपने होठों को गोल करता तो वो अपने आप को ढेर सारे गोल गोल छ्ल्लों के मध्य पाती जो उसके चारों ओर इस तरीके से घूमते रहते जैसे वो कोई जिमनास्ट हो और इन छल्लों के साथ कोई करतब दिखा रही हो…। धीरे धीरे वो उसके कहे शब्दों से मिलने जुलने लगती… बात करने लगती… उन्हें सहलाने लगती…। धीरे धीरे वो छल्ले उसमें समाते जाते। … और फिर वो एकदम से चुप हो जाता, सोचने लगता। उसके चुप होने से जैसे वो फिर छोटा दिखने लगता और वो उससे बडी। वो फिर देरतक उससे बोलती रहती… बातों को किसी गहरी खान से खोदकर निकाल लाती और उसपर उडेलती रहती। तबतक जबतक उसके होंठ फिर से गोल नहीं हो जाते… और ये सिलसिला चलता रहता।

 

अविनाश को हमेशा आश्चर्य होता कि दिया उसे एक बच्ची जैसी क्यूं लगती है। उसकी वो ढेर सारी बिन सिर पैर की बातें जिनमें कभी कोई तत्व नहीं होता, किस खदान से आती हैं? वो इतनी बातें लाती कहाँ से है? और ये सोंचते हुये कब उसके  होंठ गोल हो जाते वो जान नहीं पाता… वो एकदम से उससे बडा हो जाता और तबतक बडा रहता जबतक उसे इस बात का अहसास नहीं होता कि वो उससे बडी है …और तब वो झेंपकर चुप हो जाता…

उम्र के इस खेल को खेलते खेलते, एक-दूसरे से छोटे और बडे होते हुये कब वो सच में हमउम्र हो जाते, उन्हें भी पता नहीं चलता…

 

उस कॉफ़ी हाऊस की घडी अभी आगे चल रही थी… उसके आने का समय पीछे चलता हुआ नजदीक आ रहा था और थोडी देर में दोनो समय उसी जगह मिलने वाले थे। मोबाइल के लॉक से खेलते हुये उसके जेहन में कुछ रैंडम तस्वीरें बन रहीं थीं:-  दिया के बच्चे कॉलेज जा चुके थे… वो घर की सफ़ाई करवा रही थी… खाना–पीना हो चुका था… वो उस कॉफी हाउस के लिये निकलने की तैयारी कर रही थी…

 

हर दोपहर अविनाश के साथ साथ वो उदास कॉफी हाउस, वो सडक, वो सन्नाटे, वो उदासियत; सब उसका इंतजार करते। सबकी नज़र सिर्फ़ कॉफी हाउस की उस घडी की तरफ़ होती जिसकी हर एक टिक-टिक के साथ उसके ऑटो के आने की आवाज आ रही होती।

टिक-टिक  टिक-टिक  टिक-टिक  टिक-टिक …………………

Tuesday, November 9, 2010

’ट्रस्ट’ इज ब्लाईंड…

Trust_is_blind कभी कभी मुझे लगता है कि लडकियों का यूं उम्र भर एक पहेली रहना भी ठीक है… उनकी पहेलियों को समझते बूझते ये ज़िंदगी कब गुज़र जाती है शायद पता नहीं चलता वरना ज़िंदगी को यूं कुछ सुलझे हुये सवालों और बहुत ढेर सारी समझदारी के साथ, धीरे धीरे गुज़रते देखना भी बहुत तकलीफ़ देता है… जैसे आपको अपने मरने का दिन और वक्त पता है और आप हर लम्हे एक एक तत्व को अपने आपसे अलग जाते हुये देखते हैं…  जैसे आप किसी पटाखे को जलते हुये देखते हैं… धीरे धीरे पलीते में लगी आग बारूद तक पहुँचती है और उतनी ही धीरे धीरे आपकी आँखें आपके पूरे शरीर के साथ साथ उसके फ़टने का इंतजार करती हैं… फ़टने का इंतजार?…  खुद के फटने का इंतज़ार! अभी… बस अभी।

 

……लेकिन कभी कभी ये सब जानते हुये भी मैं इसे समझना चाहता हूँ। खासकर उस भाग को जहाँ ज़िंदगी ’होकर भी नहीं रहती’। जहाँ एक अधेड उम्र का गंवई इंसान कैंसर की लास्ट स्टेज में होते हुये रोज जीता रहता है और उसके और उसकी पत्नी के सिवा ये सबको पता होता है कि पटाखा फ़टने वाला है… सब पलीते को जलते देखते रहते हैं…  धीरे धीरे…

जहाँ उसकी गंवई पत्नी  आपकी समझदारी पर विश्वास करते हुये किसी डॉक्टर की गंदी हैंडराईटिंग में लिखा दवाईयों का एक पर्चा आपकी तरफ़ बढाती है और पूछती हैं कि इनसे ये ठीक हो जायेंगे न? और तब आप सच और झूठ की परिभाषायों को रिवाईज करना चाहते हैं… ’ठीक’ होने को समझना चाहते हैं… तब आप ज़िंदगी की ऎसी किस्सागोई को समझना चाहते हैं… या समझते हुये भी नहीं समझना चाहते हैं

उसी मरे हुये पर्चे (जिसकी अब कोई जरूरत नहीं) को देखते हुये मुझे याद आता है कि बचपन में मुझे मरना बेहद पसंद था… मुझे मरने में एक रोमांच दिखता था। अपने मुहल्ले के बच्चों के साथ खेले जाने वाले छोटे छोटे नाटकों में मैं मर जाता था और मरकर सबको मेरे लिये रोते देखता था… सबको मुझे ढूंढते देखता था। मुझे लगता था जैसे मेरे ’होने’ से जो नहीं हो सकता था वो मेरे ’न होने’ से हो रहा था और ये मेरे रोमांच को बढाता था।

मैंने ये भी देखा कि किसी ऊँचाई से नीचे देखते हुये मैं कभी ऊँचाई से नहीं डरता था जैसे लोग डरते हैं… मैं ’खुद’ से डरता था क्योंकि ऊँचाई से गिरने के सिर्फ़ एहसास में जो रोमांच था वो मुझे अपनी तरफ़ खींचता था और मैं डरकर पैर पीछे कर लेता था। मेरे आस पास के लोग इसे मेरा ऊँचाई से डरना ही समझते थे जैसे वो मेरे ट्रेन के डर को समझते थे क्योंकि प्लेटफ़ार्म पर जब ट्रेन आती थी, मैं सबसे पीछे खडा पाया जाता था। लोग कभी जान ही नहीं पाते थे कि मैं खुद से डर रहा हूँ… दौडती हुयी ट्रेन मुझे अपनी तरफ़ खींच रही है… और मुझे याद है कुछ सालों बाद जब मेरी समझ भी कुछ साल की हो गयी, तब मुझे यह सोचकर बडा आश्चर्य होता था कि मौत और ज़िंदगी में कौन मौत है और कौन ज़िंदगी… ये जो हम रोज जीते हैं वो ज़िंदगी है या ब्याज पर ली हुयी इन साँसों को यहाँ सौंपने के बाद जब हम कहीं दूर क्षितिज में चले जाते हैं वो ज़िंदगी है…

 

उस पर्चे को हाथ में लिये मैं उन दो क्षितिजों के बीच झूल रहा था… और वो दोनो क्षितिज धीरे धीरे एक दूसरे के पास आ रहे थे… और मैं उन दोनो के बीच फ़ंसता जा रहा था… दवाईयों के नामों से बनी एक अंधी सुरंग में…

’प्यार’ अंधा हो न हो, ’विश्वास’ अक्सर अंधा होता है… ट्रस्ट इज ब्लाईंड…

Sunday, September 19, 2010

कहीं जाते हुये कहीं और चले जाना…

गैस पर रखी चाय खौल रही थी और वो फ़िर कहीं चला गया था…

इसी तरह से वो अक्सर कहीं भी चला जाता था… कभी भी। कभी कभार तो वो कुछ कह रहा होता था और अपनी बात कहते कहते ही वो कहीं चला जाता था और कई बार तो कुछ कहता भी नहीं था…

रोज सुबह उठकर सबसे पहले वो उस ’चले गये’ को ढूंढकर लाता था फ़िर दोनों साथ साथ एक चाय पीते थे और ऑफ़िस जाने की तैयारियां करते थे… ऑफ़िस जाते जाते रास्ते में वो फ़िर से कहीं चला जाता था। जाने कब लौटकर आता था…। उसका यूं जाना उसके अलावा कोई और जान भी नहीं पाता था। 

वो यूं कहाँ और क्यूं जाता था.. ये वो खुद से भी नहीं पूछता था… खुद से पूछना उसे आता भी नहीं था… किसी ने उसे ये विधा सिखायी भी नहीं थी… और तो और कभी उसने किसी को खुद से कुछ पूछते देखा भी नहीं था। इसलिये अक्सर ऎसे मौकों पर वो मौन पाया जाता था…

लोग कहते रहते थे वो मौन रहता था… फोन बजते रहते थे और वो मौन रहता था। कभी सालों बाद उसे किसी रिश्ते की याद आती थी तो वो उसे निभा आता था और फ़िर अगले कई सालों तक वो उस रिश्ते से कहीं दूर चला जाता था। कई रिश्ते उसे भी भुला चुके थे जहाँ से वो कभी चला आया था या वे खुद चले गये थे।

वो किताबें पढते पढते उनमें चला जाता था। उसे यूं समय में आना-जाना बेहद पसंद था और बिना किसी टाईम मशीन के ये किताबें ही उसे समय के इधर-उधर पहुँचाती रहती थीं। चेखव की ’डेथ ऑफ़ अ क्लर्क’ के क्लर्क के साथ साथ वो भी सोचते सोचते जीता रहता था और अगली सुबह जब वो क्लर्क सोफ़े में मृत पाया जाता था, तो वो कहानी तो खत्म हो जाती थी लेकिन वो उसी कहानी में कहीं और चला जाता था… शायद स्वयं ही चेखव को ढूंढने ।

वो कभी कभी उसे झकझोरते हुये उससे पूछती थी कि ’ऎसा क्यूँ करते हो? यूँ कहाँ चले जाते हो?’

’इसमें भी एक नशा है… यूं कहीं भी चले जाने में… पढते हुये, लिखते हुये, सोचते हुये… ’कहीं’ और जाते हुये ’कहीं’ और चले जाना’

तब वो चुपचाप उसे देखती रहती कि एक दिन वो ऎसे ही उससे भी कहीं दूर चला जायेगा

… और वो …वो कुछ सोचते हुये किचेन में चाय चढाने के लिये चला जाता।

Sunday, September 12, 2010

एक कॉफ़ी और ढेरों कोरी पर्चियाँ

kuch_to_hai कुछ पात्र जाने कैसे, कब और क्यूं हमारी ज़िंदगी की फिल्म से जुडते चले जाते हैं… हमारी फिल्म? न… ये ’सिर्फ़’ हमारी फ़िल्म तो नहीं…

ये ज़िंदगी एक ऎसी फ़िल्म है जहाँ कोई मुख्य पात्र नहीं… किसी पात्र् की केन्द्रीय भूमिका नहीं। इस भदेस फ़िल्म में हर पात्र के हाथ में एक कैमरा है और हर दृश्य के ढेरों एंगल्स… कभी जाने – अनजाने मैं किसी और के कैमरे में चला जाता हूँ और कभी ना जाने कैसे, कब और क्यूं कुछ जाने-अनजाने पात्र मेरे कैमरे में आ जाते हैं… e.g ये कॉफ़ी…

(ये कॉफ़ी मेरे कैमरे में है या मैं इसके कैमरे में… फ़िलहाल तो ये सिर्फ़ एक सवाल है। )

मैं अक्सर यहाँ इसी तरह अकेले बैठकर कॉफ़ी पीता हूँ… घंटो इस समंदर से कॉफ़ी के मग में चम्मच चलाते हुये एक भंवर का निर्माण करता हूँ और फिर इस भंवर को एक छोटे से सिप के साथ अपने भीतर उतार लेता हूँ। फ़िर एक नयी भंवर और एक नया सिप…। ये सिलसिला तब तक चलता रहता है जब तक भीतर की सारी भंवरें दम नहीं तोड देतीं।

बचपन में नहाने से पहले भी मैं घंटो, पानी भरी बाल्टी में ऎसे ही भंवरें बनाया करता था। फिर उनके साथ क्या करता था वो याद नहीं… चुपचाप नहा ही लेता होऊंगा और बचपन में किया ही क्या जा सकता था। अभी भी क्या ही कर पाता हूँ!!…

 

’हर की पौडी’ की शांति और ओबेराय माल के इस पल की शांति में सिर्फ़ इतना फ़र्क होता है कि वहाँ सन्नाटे में भी जाने कैसी कैसी आवाजें होती हैं और यहाँ सिर्फ़ एक नग्न सन्नाटा… और इस नंगेपन से भीतर की आवाज भी इतना डरती है कि वो निकलती नहीं… भीतर ही कहीं छुपी बैठी रहती है।

मेरा इस वक्त यहाँ आना भी एक नयी आदत बनती जा रही है… फ़िल्म में यह सीन कुछ ज्यादा ही बार होने के कारण सीन और इस सीन के संवाद रट गये हैं। मसलन जब भी यहाँ आता हूं, समय यही होता है मतलब रात ’आधी’ बस होने ही वाली होती है… और हर बार पूछता भी यही हूँ कि शॉप कब तक ओपेन है? - ११:३०… फ़िर हमेशा की तरह एक ’कैफ़े मोका’ आर्डर करके सारी खाली जगहों में से किसी एक खाली जगह पर बैठ जाता हूँ जहाँ से खालीपन भरा भरा लगे… बहुत सारा उन खाली सोफ़ों का और थोडा बहुत मेरा भी। फ़िर एक पेन और पेपर माँगकर अक्सर ही उस अनप्रिंटेड बिल के पेपर पर कुछ लिखना… (जो शायद उस मशीन में छप जाते तो किसी और के नाम के बिल होते… अभी वो कोरे हैं और मेरे कैमरे के एंगल के अधीन। )

पहले टिशू पेपर पर भी लिख देता था… अब उसपर नहीं लिखता… उस उजले पेपर पर मेरे शब्द किसी दाग जैसे प्रतीत होते थे और उन्हे देख मैं अक्सर सोच में पड जाता था कि मेरे शरीर के दागों से भी शायद किसी के शब्द झलकते होंगे… फ़िर मस्तिष्क में एक तिलिस्मी भंवर बनती जाती थी कि ’किसके शब्द’…  ’किसकेएएएएएए शअअअअब्द’… और मैं तब देर तक कॉफ़ी को हिलाता रहता था।

 

 

लखनऊ में इन दौडते-भागते लोगों से सिर्फ़ चिढ थी… बॉम्बे में ये नफ़रत बनती जा रही है। मानव की कहानी का हंसा मुझे बडा हांट करता है।

जब से वह पैदा हुआ है तब से वह व्यस्त है। उसने कभी किसी भी काम के लिए किसी को भी मना नहीं किया सो वह दूसरों के काम करने में हमेशा व्यस्त रहता था। जो लोग उसे जानते थे वह उससे अपना काम करने को नहीं कहते थे.. वह उसके बदले ’एक ज़रुरी काम की पर्ची..’ उसकी जेब में डाल देते थे, जिसे वह समय रहते पूरा करता चलता था। उसके पास एक जेब की कई सारी शर्टे थी... दो जेब वाली शर्ट पहनने से वह घबराता था। मैंने उससे एक बार कहा था कि तुम बिना जेब की शर्ट पहना करो... तो उसने कहा कि काम की पर्चे वह हाथ में नहीं रखना चाहता है... काम के पर्चे पैंट की जेब में मुड़ जाते हैं... फिर क्या काम करना है ठीक से समझ में नहीं आता है। वह अपने घर के कामों की भी पर्चियाँ बनाकर जेब में रख लेता। अपने काम भी वह बाक़ी ज़रुरी कामों की तरह करता... समय रहते। इन पर्चियों के बीच उसका एक खेल भी था... एक दिन उसने मुझसे कहा था कि वह कई बार कोरी पर्चियाँ अपनी जेब में, किसी महत्वपूर्ण काम की तरह रख लेता... जब वह कोई महत्वपूर्ण काम के लिए कोई कोरी पर्चि निकालता तो खुश हो जाता... वह उस महत्वपूर्ण काम के समय... कुछ भी नहीं करता... और उसे यह बहुत अच्छा लगता था। काम के वक्त काम नहीं करने की आज़ादी बहुत बड़ी आज़ादी थी।

इन दौडते भागते लोगों में मुझे एक व्यस्त हंसा दिखता है… जेब से एक के बाद एक पर्चियां निकालता हुआ और बस उन्हें एक के बाद एक  निपटाता हुआ…

…मन करता है इन सब दौडते-भागते लोगों की  जेबों में ढेरों ‘कोरी पर्चियां’ भर दूँ॥

Wednesday, September 8, 2010

जाने कैसी कैसी आवाजें!

’इनएक्सेसिबिल’

वो अपनी सीट पर बैठने से पहले सीधे मेरी आँखों में एकटक देखती है। उसके यूँ देखने से मुझे अहसास होता है कि मैं भी पिछले कुछ मिनट से शायद उसे ही देख रहा हूँ। अनायास ही मेरे भीतर से एक बहुत दबा हुआ सा ’हेलो’ निकलता है जो दबे दबे उस तक पहुँच जाता है। वो भी मुझे ’हेलो’ बोलती है और उसकी आँखे मेरे अगली बात सुनने के लिये तैयार दिखती हैं। पर उस वक्त मेरी बातूनी बातें मेरा साथ नहीं देतीं और मैं वापस अपनी बॉम्बे टु दिल्ली फ़्लाईट की गोल खिडकी वाली सीट से बाहर के गोल गोल दृश्यों को देखने में लग जाता हूँ।

मेरी एक दोस्त मुझसे हमेशा कहती है कि अगर मुझे किसी एक शब्द में डिफ़ाईन करना हो तो वो होगा ’इनएक्सेसिबिल’। मैं उस गोल खिडकी के बाहर देखता हुआ यही सोचता हूँ कि शायद ये भी वही सोच रही हो।

खैर… दिल्ली उतरने से पहले इस अधेड उम्र की महिला से कुछ बातें हो ही जाती हैं जिनमें से अधिकतर मेरे बैग और लैपटॉप के ब्रांड, मेरे विदेश जाने की संभावनायें, मेरा वेतनमान और छोटे शहरों से बॉम्बे आये लोगों के इर्द गिर्द ही घूमती हैं।

फ़्लाईट से उतरते ही हम दोनो भीड का एक हिस्सा बन जाते हैं।

निशांत मुझसे पहले एयरपोर्ट पहुँच चुका है करीबन २ साल बाद उसे देख रहा हूँ। हम दोनो पवन के फ़्लैट के लिये रवाना होते हैं…

और मेरे जेहन में अभी भी उस महिला की कही कुछ बातें हैं और एक दुविधा भी है कि उनमें शो-ऑफ़ ज्यादा था या स्नाबरी ……या मेरा ’इनएक्सेसिबिल’ रहना ही ज्यादा अच्छा है…


काम का जिक्र करो!

पवन के ही फ़्लैट पर विराग से मिलता हूँ। उसमें अभी भी उन बातों के लिये एक जोश है जिन्हे मैं न जाने कबसे नकार चुका हूँ। वो कहता है कि उसकी पूरी टीम के पास एलसीडी मॉनीटर तक नहीं लेकिन उसकी डेस्क पर एलसीडी के साथ साथ एक लैपटॉप एक्स्ट्रा पडा हुआ है। वो अब काफी आर्गेनाईज्ड लगता है। जरूरत की सारी चीजें उसके पास हैं और उन चीजों की सारी जरूरतें भी। वो कहता है कि ’काम की फ़िक्र मत करो, काम का जिक्र करो’।

पहली बार में तो मैं बुद्धिजीवी बनने की कोशिश के तहत उसे सुनाता हूँ लेकिन बाद में उसकी कही यही बात मुझे बहुत जमीनी लगती है। मैने काम की बहुत फ़िक्र तो नहीं की लेकिन ’खुद’ को तलाशते तलाशते, उसका जिक्र करना कहीं छूट गया। जरूरतें भी छूटती गयीं और धीरे धीरे चीजें भी…

वैसे फ़िक्र का जिक्र करना भी कहाँ बुरा है या जिक्र की फ़िक्र करना… (कुछ नहीं दिमाग पर चढी कुछ जिक्रों-फ़िक्रों का असर है… आप इसे अन्यथा न लें।)


जाने कैसी कैसी आवाजें

अभी तक गंगा जी के लिये लोग गा रहे थे, अब उनकी आरती खत्म होने के बाद गंगा खुद गा रही हैं। पवन एकदम शांत सा मेरे साथ गंगा जी में पैर डाले बैठा है। हम दोनो के बीच कुछ आवाजें इधर उधर से अपनी जगह बनाकर आ जा रही हैं… गंगा के तेज बहने की आवाजें हैं… बगल में एक पिता अपने पुत्र को घाट से लगी जंजीर पकडकर डुबकी लगाने को कह रहा है… एक असफ़ल प्रयास के बाद लडका डुबकी लगा लेता है… उसकी एक असफ़ल और एक सफ़ल डुबकी की आवाज है… दोनो आवाजें लगभग एक जैसी ही हैं। कुछ महिलायें गिलसिया भर दूध गंगा में डालने को कह रही हैं… उनके कहने की आवाज भी है और दूध की धार के गंगा में गिरने की भी आवाज। कुछ लोग पानी मे सिक्के डाल रहे हैं तो कुछ मैले कुचेले कपडे पहने लडके पानी में डाले गये सिक्कों को खींचने के लिये चुंबक फ़ेंक रहे हैं। सिक्कों में भरी हुयी श्रद्धा की भी आवाज है और डोरो से बंधे उन चुंबको में मजबूरी की भी एक आवाज। एक बच्चा एक दिये को पानी में बहा रहा है। छोटा और नासमझ है इसीलिये दिये को गंगा जी की धार की विपरीत दिशा में बहाने की कोशिश कर रहा है… उम्मीदों का वह दिया परेशान सा है कि डोरी और चुंबक लिये वो मैले कुचेले कपडो वाला लडका उस दिये को हल्का हाथ लगाकर नदी के बहाव के साथ बहा देता है। नासमझ बच्चे की उम्मीदों को राह मिल गयी है और शायद ज़िंदगी के लिये एक सबक भी। उस नासमझ बच्चे की खुशी की भी आवाज है और उस समझदार लडके के समझदारी की भी…

हमारे पीछे ही दो-तीन लोगो ने भजन कीर्तन शुरु किया है… मैं उठकर उनके पास चला जाता हूँ… पवन अभी वहीं गंगा जी में पैर डाले बैठा है… कीर्तन में लोग बढने लगे हैं… उन सबके बढने की भी आवाजे हैं और उनके गाने की भी आवाजे हैं। मैं रिकार्ड करने की कोशिश करता हूँ लेकिन मोबाईल धोखा दे जाता है… मैं वापस पवन के पास आकर बैठ जाता हूँ। गंगा के बहने की एक आवाज है… और हमारे कुछ ना कहने की भी एक आवाज…

ट्रेन का टाईम हो गया है। दोनो वहाँ से ऎसे उठते हैं जैसे मन न भरा हो और रेलवे स्टेशन की तरफ़ चल पडते हैं। हमारे चलने की भी आवाज है और हमारे मन के वहीं रह जाने की भी एक आवाज…

Tuesday, September 7, 2010

बुदबुदाती हुयी सी कुछ तस्वीरें…

 

P280810_15.08DSCN0749 DSCN0750DSCN0771 DSCN0794DSCN0807  A room with a windowDSCN0958 DSCN0983DSCN0991 

 

इनमें से कुछ तस्वीरें मैने पवन के कैमरे और अपने मोबाईल से ली हैं और कुछ पवन ने ली हैं। कुछ और तस्वीरें हैं, जो इधर हैं और कुछ पवन के फ़्लिकर पर…

Monday, August 16, 2010

ताकि सनद रहे!

फ़्लैशबैक…… कैमरा रोलिंग… ज़िंदगी रिवाईन्ड… एक्शन!!

 

टेक – १

घर से ४ घंटे दूर लखनऊ के डालीगंज के एक कमरे की वो रात। ’कुछ’ बन कर दिखाने की कोशिशें जारी हैं… ’पापा कहते हैं बडा नाम करेगा’  जैसे रक्त कोशिकाऒ तक जाकर, उनसे पूछ्ता है कि ’भैया तुम बताओ? तुम क्या बनोगे?’  डिनर में खिचडी बनी है जो मुझे उस वक्त बनानी नहीं आती है इसलिये मेरा शोषण होता है… बर्तन धोने के काम, बिना किसी वोटिंग के मेरे क्रूर तानाशाही  रूममेट्स के द्वारा मेरे जिम्मे कर दिये जाते हैं। खैर मुझे तब भी आज के ही जैसे आवाज उठानी नहीं आती है और माताश्री के हर बार फोन पर ये कहे जाने पर भी, कि ’हाय, मेरा लड़का बर्तन धोता है!’ मैं खुशी खुशी बर्तन घिसता रहता हूँ  और सोचता रहता हँ कि कभी उनमें से भी कोई जिन्न निकलेगा और मेरे सारे ख्वाबों को पूरा  कर देगा.. लेकिन शायद उसे भी मेरी आऊटडेटेड ख्वाहिशों में कोई इन्ट्रेस्ट नहीं… या आजकल जिन्न साहब भी आऊट ऑफ़ स्टॉक हैं।

खैर उस रात पर वापस आते हैँ… वो रात का समय होता है और बिजली के जाने का समय भी… बिजली वालों को पता है कि भाई रात में बिजली का क्या काम… रात का मतलब ही अंधेरा होना है… तो क्यों प्रकृति के साथ छेड़-छाड़ करी जाय। तो उस घुप्प अँधेरी रात में, हम लोग  डिनर को थोडा हैप्पनिंग बनाने की कोशिश करते हैं। छत पर खुली ऑक्सीजन के साथ कैन्ड्ल लिट डिनर करने की तैयारी की जाती है… एक जली हुयी मोमबत्ती के साथ  तीन लोग, तीन थालियाँ और एक कुकर में थोड़ी अधजली खिचड़ी।

तभी बगल वाले घर की खिड़की से एक चेहरा झाँकता है… और उस घुप्प अँधेरे में भी चटाई पर बैठकर असभ्य तरीके से जली खिचड़ी खाने वालों में भी एक लुप्तप्राय सभ्यता उगती प्रतीत होती है… एक की आवाज आती है “अबे! मशरूम थोडे और दो?”…… दूसरा - “पुलाव आज अच्छे बने हैं। काजू सही से डाले तूने।”… कमबख्त मैं अज्ञानी, जिज्ञासु बालक पूछ बैठता हूँ - “मशरूम? पुलाव? काजू?”… ये दो-तीन शब्द मुँह से अभी निकले भी नहीं होते हैं कि उस अँधेरे में न जाने मुझे कितनी चिकुटियाँ काटी जाती है और मैं उस सांकेतिक भाषा में अपने द्वारा पूछे गये शब्दों का अर्थ ढूढने की पूरी कोशिश करता हूँ… एकदम ईमानदारी से… लेकिन इतना समझदार होता तो मेरी शादी नहीं हो गयी होती (ये हमारे शहर के लोगों का समझदारी को लेकर एक तकियाकलाम है… आप इसे अन्यथा न लें…) तभी कानों में सरसराते हुये से कुछ शब्द गुजरते हैं “ अबे! ‘#$%^$%’ खिड़की पर लड़की है|”

ओह्ह… मै भी अपनी नयी नयी समझदारी का परिचय देते हुये उस काजू वाले पुलाव और मशरूम के भोज में अपना ’सक्रिय’ योगदान देता हूँ।

…और उस दिन हम तीनों जली हुयी खिचड़ी को मशरूम के जैसे ही चाट चाट्कर खाते हैं।

कट…

अरे कुछ रह गया… अरे हाँ इस टेक में एक गाना भी है। चलिये फ़िर से ’एक्शन’…

लेकिन ये गाना फ़िल्माया कैसे जाय? छत पर कोई पेड़ भी नहीं है जहाँ इन लड़कों को घुमाया जाय… अँधेरे में छत पर गोल-गोल यहाँ से वहाँ दौड़ाया भी नहीं जा सकता… बेचारों के हाथ-पैर टूट जायेगे.. शरीफ़ लडके हैं भई.. पढने – लिखने लखनऊ आये हैं। फ़िर?

फ़िर क्या… तीनो मस्त खा-पीकर लेटे हुये हैँ। अँधेरे में खिडकी पर कोई चेहरा है कि नहीं, पता नहीं लेकिन उन्होने भी गणित के किसी भी प्रूफ़ की आखिरी लाईन याद रखी है ’इति सिद्धम’। यूपी बोर्ड के इतने सारे एग्जाम्स पास करने के बाद वो ये तो जानते हैं कि प्रूफ़ में कुछ भी लिखा हो या न लिखा हो, ये लाईन सबसे महत्वपूर्ण है। इसी ’इति सिद्धम’ के सिद्धांत पर बिना दिमाग का यूज किये वो मानते हैं कि खिड़की पर अभी भी वो चेहरा है।

सेट कुछ ऎसे सजा है कि दो चटाईयां बिछी हैं और तीन लडके जगजीत सिंह की गज़ल गुनगुना रहे हैं -

ना उम्र की सीमा हो, न जन्म का हो बंधन…

जब प्यार करे कोई, तो देखे केवल ……

कि अनायास ही… बिना किसी लिखी हुयी स्क्रिप्ट के… अपनी अपनी मूल सोचो के साथ तीनो एक साथ अलग अलग कहते  हैं -

तन… मन… धन… (दायें से बायें की तरफ़ ऊपर वाले खाने में फ़िट करें)

कट……

 

नोट:

फ़िल्म अभी बाकी है मेरे दोस्त! मैं राईटर कम डायरेक्टर कम साईड-ऎक्टर दोनो के बीच में लेटा हुआ हूँ और ’मन’ ही कहता हूँ… :-) सोचा बता दूँ नहीं तो आपकी सोच तो मुझे पता ही है…  हे हे हे

Saturday, August 14, 2010

तुम अकेले ही नहीं, हे कवि!

रोज़ ऑफिस जायें, आयें
खाना पकायें, सो जायें
अगली सुबह फिर ऑफिस जायें..


लिखें प्रेम कवितायें,
और ऑफिस की सारी प्रेम गॉसिपों
में प्रेम का मखौल बनायें


जियें ज़िन्दगी, ये न जानते हुये
कि जीते क्यूँ हैं..
और मर जायें एक दिन
कई सारे सवाल लिये...

 

वीकेंड में पीयें दारू
धोयें कपडे,
देखें ’पीपली लाईव’
ठहाकें लगायें किसानों की मौतों पर
बाहर आयें और मालों से खरीदें महँगे कपडे
...और सब एक साथ रोयें बढने वाली महँगाई पर

 


साल में एक दिन झंडे खरीदें
एफ़-एम पर फ़रमाइश रखें देशभक्ति की..
फेसबुक पर बाँटे गाने
बाकी दिनों, लगाते रहें चूना
बोतें रहें बारूद..
मचायें शोर
फ़ैलायें अफवाहें
प्रजातंत्र के सारे पलीतों
में एक एक सिरे से लगायें आग
…और इन्तजार करें किसी फ़ायर-ब्रिगेड के आने का..

 

हम सबका विनाश हो... (तुम अकेले ही नहीं हे कवि)

 


*कई दिनों से एक अलग सा मूड है, कुछ नयी ही किस्म का…। आज सागर की झकझोर देने वाली कविता पढते हुये अपने आस-पास के समाज में झांकते हुये ये ’कविता सी’ बन गयी। इसका पूरा क्रेडिट सागर को…


Sunday, August 8, 2010

'सच' क्या होता है?

'सच' क्या होता है? कैसा दीखता है 'सच'? 

कश्मीर के बदलते हालातों पर सन्डे टाइम्स की स्पेशल रिपोर्ट है 'डेस्परेट हाउसवाइफ़्स'.. वो पढ़ता हूँ.. रोते बिलखते चेहरे हैं.. सलवार कमीज में पत्थर फेंकती औरते हैं... मेरा नजरिया बनने वाला  ही होता है कि गौतम भाई की पोस्ट पढ़ता हूँ.. 'भारतीय कुत्तों वापस जाओ' के नारे हैं...   पत्थर खाते पुलिसवाले हैं... फूटे सर पर हैंडीप्लास्ट लगाये भीड़ के सामने खड़ा एसपी है... सच बैलेंस्ड होता लगता है कि फिर शायदा जी की पोस्ट पढ़ता हूँ और कहीं गहरे, इक अनजान अँधेरे में डूबता जाता हूँ.... एक जबरदस्त तलब होती है छोडी हुयी सिगरेट को अंगीकार करने की..

इस दुनिया में सच की भी पोलिशिंग होती है.. 

क्या कोई दुनिया है इन सब सहमति- असहमति, वादों -विवादों के परे, जहाँ सच सिर्फ 'सच' होते हों?

 

P.S. कुछ दिनों में पहलगाम- पटनीटोप- कटरा जाना है... जम्मू – कश्मीर की वादियों के सच को अपनी आँखों से महसूस करना चाहता हूँ... लेकिन तब तक वादियों में सच बचेगा... ...वादियाँ खुद बचेंगी? मेरा जाना बचेगा?

कमबख्त ये सब लिखते लिखते सिगरेट की तलब भी भीतर से ऊपर और ऊपर चढती जाती है वैसे ही जैसे आज के दिन ये सारे सच मेरे ऊपर बहुत ऊपर चढकर बैठे हैं… ॥

Saturday, July 31, 2010

घर लौटने का समय

- और?

- और क्या? उससे इतना प्यार करूंगी, जितना आजतक किसी ने किसी से भी नहीं किया होगा?

- सब यही कहते हैं…

- अच्छा, फ़िर इतना प्यार… इतना, कि कोई ’किसी’ से भी इतना प्यार करेगा तो मुझे ईर्ष्या होगी कि कोई किसी से भी इतना प्यार कैसे कर सकता है

- तो तुम खुद से ईर्ष्या करोगी?

- हाँ, जितना प्यार करूंगी, उतनी ईर्ष्या भी करनी पड़ेगी…

- इंट्रेस्टिंग…… लेकिन अगर तुम अपनेआप से ही उतना प्यार करो, तो? तो तुम्हे अपनेआप से ईर्ष्या भी करनी पड़ेगी? क्या ये संभव है? तुम्हे लगता है कि ये दोनो साथ साथ चल सकेगे?

 

और फ़िर वो एक सोच मे डूब जाती। उधर दूर सूरज भी धीरे धीरे डूबता जाता……

दोनो चुपचाप साथ साथ दूर तक देखते रहते। दोनो का अलग अलग ’दूर’  धीरे धीरे खिसकते खिसकते एक ’दूर’ हो जाता और तब दूरियाँ ’दूरियाँ’ नही रहतीं। वो उनके वापस घर लौटने का समय होता…

चुपचाप… साथ साथ…

Tuesday, July 20, 2010

मेरी नज़र से एक शख्सियत – अभय तिवारी

Picture0102उस गली में ’साईं’ नाम की कई बिल्डिंग्स हैं। एक बिल्डिंग के सामने से अभय भाई को फ़ोन लगाता हूँ “फ्लैट नंबर…? भूल गया?” वो बताते हैं और मैं उनके फ़्लैट के सामने खड़ा हूँ।

दाढ़ी-मूछों  वाले ये भाईसाहब, दरवाजा खोलते हैं… मैं ’नमस्कार’ करता हूँ, वो बड़े प्यार से हाथ मिलाते हैं। मैं सोफ़े पर बैठ जाता हूँ… आस पास नज़र दौड़ाता हूँ तो बस किताबें ही किताबें हैं। मेरा मन होता है उठकर सबकुछ अपने हाथों से छूकर देखूँ फ़िर चुप ही बैठा रहता हूँ।

बातें शुरु होती हैं और फ़िर चल पड़ती हैं… किसी बात पर वो कहते हैं कि “हाँ, लोग ’उदय प्रकाश’ को भी तो नहीं छोड़ते”। मैं  साहित्यिक विकलांग, पूछ्ता हूँ  कि “कौन उदय प्रकाश?” “अरे! उदय प्रकाश की कहानियां नहीं पढीं?” और वो सोफ़े से उठ जाते हैं। अपनी उस संजोयी हुई धरोहर से एक किताब निकालकर मुझे देते हैं “इसे पढ़ना।” मैं उस किताब को बड़ी नरमी से छूता हूँ… देखकर लगता है कि बहुत पुरानी किताब है। नाम देखता हूँ – “…और अंत में प्रार्थना”

 

करीब एक हफ़्ते बाद मैं फ़िर उसी बिल्डिंग के सामने हूँ। फ़ोन लगाता हूँ “फ्लैट नंबर…? फ़िर भूल गया?”

उन्होने सर पर एक गमछा बाँधा हुआ है। मैं कहता हूँ “स्मार्ट लग रहे हैं?” मुस्कराते हुये जवाब आता है “पढ़ते वक्त मैं गमछा बांध लेता हूँ  ताकि सारे विचार मस्तिष्क के साथ जुड़े रहें, इधर उधर छिटके नहीं”। “अच्छी तकनीक है, मैं भी ट्राई करूंगा” मैं कहता हूँ। उनके साथ बैठा हूँ… वो रामचरितमानस पढ़ रहे हैं… पूछते हैं “रामचरितमानस पढ़ी है?” “अपने पास-पड़ोस, रिश्तेदारों में रामायण बैठने पर मुझे ही बुलाया जाता था” मै लम्बी वाली फेंकता हूँ। वो दो चौपाईयाँ पढ़ते हैं और अपने साथ साथ मुझे भी उसमें स्वीमिंग करवा देते हैं। उनके साथ बातें करने में आनन्द आता है। कुछ जाना – अनजाना सीखता रहता हूँ… कुछ ’नहीं’ पूछने वाले सवाल भी पूछता हूँ,  जिनका अहसास मुझे घर आकर ही होता है… इस बार उनकी किताब ’कलामे रूमी’ ही ले आया हूँ। ’सरपत’ भी किसी दिन मांगकर देख ही डालूँगा।

 

अभय तिवारी किसी परिचय के मोहताज नहीं हैं।  थैंक्स टु पीडी, Picture0135c मैंने उनकी एक खूबसूरत सी पोस्ट  पढ़ी थी जो मैं गाहे बगाहे लोगों के सामने ऐज अ डायलाग मार देता हूँ… ’कबूतर जैसा मशहूर नहीं ’। उनको जितना पढ़ा, हमेशा एक नया प्वाइंट, एक नयी ऎनालिसिस समझने को मिली और जिसे मेरे जैसे लोग भी अच्छी तरीके से समझ पाये… अब चाहे वो फ़ुटबाल से भारत के प्राचीन रिश्ते की बात हो , या सर के पिछले हिस्से के महत्व की बात, या टाई लगाकर हिन्दी कहने की बात, या जुझारु जेसिका और एडवर्ड सईद के किस्से,  या ……आप खुद ही पढ़ लीजिये

 

कलामे रूमी’ की एक प्रति, अब मेरी हो चुकी है और मेरी डेस्क पर चमक रही है। आदतन सबसे पीछे वाला पन्ना पढता हूँ तो उनके ब्लॉग का लिंक भी है… मैं मन ही मन मुस्कराता हूँ और एक्नोलेजमेन्ट का एक पैरा पढ़ता हूँ:

सबसे पहले तो मैं धन्यवाद देता हूँ अपने पिता स्व. नरेश चन्द्र तिवारी और माँ श्रीमती विमला तिवारी को, जो मेरे शरीर, चरित्र और व्यक्तित्व के निर्माता हैं। उसके बाद मैं  अपनी पत्नी तनु का आभारी हूँ जिसने मुझे हमेशा एक नैतिक बल दिया और मेरे ऊपर सांसारिकता की सीढियां चढ़ने का कोई दबाव नहीं बनाया। फ़िर धन्यवाद देता हूँ मेरे मित्र फ़रीद खान को जिन्होने उमर में छोटे होने के बावजूद उर्दू-फ़ारसी का अक्षर ज्ञान कराने में मेरी उंगली पकड़ी ; और मेरे मित्र बोधिसत्व जिन्होने मेरी जरूरत की किताबें मुझे मिलती रहे, इसके लिये नि:स्वार्थ चिन्ता की; और मित्र प्रमोद सिंह को जिन्होने मेरे काम के प्रति उत्साह और अपने प्रति निर्ममता को बनाए रखने में निरंतर सहयोग दिया। अंत में बिबोध पार्थसारथी और विश्वजीत दास समेत अपने तमाम साथियों और मित्रों के साथ, अपनी उन पेशेवर असफलताओं का भी आभारी हूँ  जिन्होने मुझे यह काम करने का आयाम उपलब्ध कराया।

 

तभी याद आता है कि किताब पर उनके ऑटोग्राफ़ लेना तो भूल गया हूँ… चलिये बिल्डिंग तक का रास्ता तो पता है ही और आगे बस एक फ़ोन करना है और पूछना है -  “फ्लैट नंबर…? फ़िर भूल गया?” 

 


P.S. कलामे रूमी फ़्लिपकार्ट पर उपलब्ध है। पहली वाली फ़ोटो का लिंक  भी उसी पेज पर रिडायरेक्ट करता है।


पुनश्च:

टिप्पणी में सतीश पंचम जी ने अभय भाई की एक पोस्ट का जिक्र किया जिसमें मुम्बई में हिंदी किताबें रखने वाली दुकानों का जिक्र था और ये हिंदी साहित्य पढ़ने वाले मुम्बई वासियों के लिये एक सहेजकर रखी जाने वाली पोस्ट ही है।

 

पिछले पन्नो से: मेरी नज़र से एक शख्सियत - संकल्प शर्मा

Saturday, July 17, 2010

मुम्बई की एक रात…

बगल में रखा मोबाईल वाईब्रेट कर रहा है…… ATT00006

स्क्रीन पर आदित्य का नाम फ़्लैश कर रहा है और कमरे के उस घुप्प अँधेरे में मोबाईल के स्क्रीन की बार बार जलती-बुझती उस रोशनी से रिया की आँखें चुभ रही हैं । पिछले एक हफ़्ते से यह सिलसिला बदस्तूर जारी है। हर रात रिया घंटों उस नम्बर को फ़्लैश होते देखती रहती है और आदित्य उन कॉल्स को तड़प तड़पकर मरते…

 

उस दिन आदि की आवाज़ में कितनी बैचेनी थी… एक हताशा थी… एक हार थी। मुम्बई की रोज की दौड़ में उस दिन वो शायद पिछड़ गया था… या शायद दौड़ा ही नहीं था। दौड़ा नहीं तो थका भी नहीं … इसलिये उसे नींद नहीं आयी होगी। सोने की भरपूर कोशिश करने के बाद भी जब बिस्तर की सिलवटों को किसी और की कमी खली होगी, तब उसने मुझे रात के उस तीसरे पहर कॉल  किया होगा…। ह्म्म… अपने खालीपन को पूरा करने के लिये… उसी के लिये ही…

ये सब सोचते हुये रिया अपने अँधेरे कमरे की खिड़की खोल देती है और उस खिड़की से दूर दिखती लैम्पपोस्ट को एकटक देखती रहती है।

’अँधेरे को उजाला आसानी से चीरता है या उजाले को अँधेरा” ये सोचते सोचते, वो भी कहीं बहुत भीतर से, उसी लैम्पपोस्ट की रोशनी से,  धीरे धीरे चिरती जाती है। धीरे धीरे, लैम्पपोस्ट की वो रोशनी  भी जलने-बुझने लगती है। आदित्य का नाम वहाँ भी फ़्लैश होने लगता है।

……आदित्य कॉलिंग

दीवाल घड़ी रात के दो बजा रही है। मुम्बई की जादुई बारिश भी शुरु हो गयी है…

उस रात भी तो बारिश ही थी न जब आदि मुझे भिगोता चला गया था। आदि की कल्पनाओं में कितनी वास्तविकता थी, कितनी विविधता थी और उसका कहने का अंदाज़… उस रात वो जो भी आब्जेक्ट्स दिखा रहा था, वो मुझे दिखते थे। मै उसकी कल्पनाओं में बहती जाती थी… मैं उसका सुनाया अपनी बंद आँखों के आसमान में  देख रही थी… उसकी बातों से ज़ेहन में  नये नये स्केचेज़ बनते जाते थे। ज़ेहन के किसी एक कोने मे ’सही/गलत’ की बातें भी सर उठाती दिखती थीं… उसे भी दिखती होगीं लेकिन जिसे दिखती थीं वो दूसरे को उसका दिखना कहाँ बताता था… वो बस बातें  करता जाता था… कुछ कुछ छिपाता… कुछ कुछ बताता। ’सही/गलत’ मुझे सिर्फ़ ताकते रह जाते थे… मैंने  भी उनसे आँखें न मिलाकर नीची ही कर रखी थीं…

…और,

और, अगली सुबह ज़िंदगी उस कमरे में बिखरी पड़ी थी। रात की खरोचें दर्द तो दे रही थीं लेकिन दिखती नहीं थीं। उनींदे ही, सबसे पहले उसने खुद को एक आईने मे देखा था। आँखें, चिटके हुये कई ख्वाबों से भरी हुयी थीं और चेहरा रात हुये किसी कत्ल का गवाह सा दिखता था। उस कमरे मे कोई लाश नहीं थी… खून के निशान भी नहीं थे… उसके शरीर पर खरोचें भी नहीं थीं… बस मन में  ’सही/गलत’ को सोचता हुआ एक गिल्ट था। एक बोझ था जिसकी वजह से वो अपने आप से दबी जा रही थी… उसे एक एकांत चाहिये था… मौत सरीखा काफ़्का का एकांत…

 

बाहर बारिश अभी भी जारी है। रिया और लैम्पपोस्ट की रोशनी के बीच बारिश की कुछ बूँदें  आ जाती हैं। रिया उन्हे पकड़ने के लिये हथेली खोलती है… हथेली पर रोशनी की एक चादर सी है और उस चादर में बारिश की बूँदें इकट्ठी होने लगती हैं… वो धीरे धीरे मुट्ठी बंद कर लेती है…

वो उस बारिश मे जमकर भीगना चाहती है… वो कमरे से बाहर आकर आसमान की तरफ़ देखते हुये अपने हाथों को पंख जैसे फ़ैला लेती है… सारी बारिश को खुद में समा लेना चाहती है… वो खुद एक ’मुट्ठी’ बन जाना चाहती है…  

उस बारिश में  रिया, ’मुट्ठी’ के जैसे खुलती, बंद होती है… उस बारिश मे रिया उड़ती है… भीगती है… बहती है… रोती है… खूब रोती है…

…और उस रात मुम्बई पानी से डूब जाती है॥

इधर अँधेरे कमरे में अभी भी मोबाईल की रोशनी जल-बुझ रही होती है

……आदित्य कॉलिंग

 

Saturday, July 10, 2010

काश सोचने के पैसे मिलते!!

think_cartoonसुबह ७ बजे माताश्री ने रोज की ही तरह फ़ोन करके पूछा कि “उठ गये” और हम भी रोज की तरह ’हाँ  ’ कहके, २ मिनट नींद में  ही बातें करके सो गये। ८ बजे मोबाईल में लगा अलार्म भी बजा… फ़िर हर १० मिनट पर बजता रहा… फिर शायद मेरे रूममेट ने उसे बंद किया… खैर…

बाहर झमाझम बारिश हो रही थी और मेरे बेड ने जैसे मुझे एक चुम्बक की मानिंद पकड़ा हुआ था। उठने की हर कोशिश नाकाम थी और आँखें  बंद करके अपने सपने में ही ऑफिस निकलने की तैयारी कर रहे थे।

करीब साढ़े दस बजे इस स्वप्न संसार से बाहर आते हुए हमने बेड छोड़ा और किचेन में घुसते ही चाय चढ़ा दी और लैपटाप ऑन करके बैठ गये। खिड़की के बाहर घमासान बरसती बारिश और हाथों में अदरक की चाय… और ऎसे वक्त ऑफिस… कयामत हो…

बस आव देखा न ताव और फ़ेसबुक पर एक अपडेट मार दी कि ’हम काम क्यूं करते है – वाई डू वी वर्क?’

…… और फ़िर चुपचाप सर झुकाये ऑफिस चले गये…

अनुराग भाई ने उसी पर पूछा कि ’दूसरा आप्शन बताओ’ तो दिमाग के घोड़े दौड़ गये और बस एक फ़ितूर सोच लाये…

कुछ खास नही बस बैठे बिठाये हम सोच रहे थे कि काश सोचना भी एक योग्यता होती और हमें सोचने  के पैसे मिलते……

…… और अगर मिलते तो ये दुनिया कैसी होती?

 

शादी की बातें कैसे होती?:

- लड़का क्या करता है?
बम्बई मे किसी बड़ी कंपनी में है… …’सोचता’ है…

- लड़की बहुत पढी लिखी है… गृहकार्य के साथ साथ उसे सोचना अच्छा लगता है… सोचने का होबी कोर्स भी किया है…

- हमारी सुशील कन्या के लिये एक सुन्दर वर चाहिये… सोचने वालों को वरीयता दी जायेगी…

 

इंटरव्यू कैसे होते?

- पहले कभी ’सोचा’ है?? हमारी कंपनी में वीकेंड पर भी ’सोचते’ हैं… क्या तुम इतना ’सोच’ पाओगे?

- तो आप पहले किस कंपनी में ’सोचते’ थे?

- अच्छा… तो आप पिछले दस सालों से ’सोचते’ हैं? क्वाईट इंट्रेस्टिंग …

- अच्छा प्रोफ़ाईल है आपका… तो अभी तक आप किन किन चीज़ो पर सोच चुके है??

- कुछ सोच के दिखाओ? (दो इंटरव्यूवर सोचते हुये सामने वाले से सवाल पूछते है

 

दोस्तों में बातें कैसे होतीं?

- साला कॉलेज में सोचने को कह दो तो गधे के हाँथ पाँव फ़ूल जाते थे… आज देखो फ़लाना कंपनी में है… पता नही कैसे सोचता होगा? वहाँ भी किसी सोचने वाले की कॉपी करता होगा …

- यार मैंने उनसे ६ लाख मांगे लेकिन वो बोले कि साढ़े पांच ही देंगे … लेकिन सीखने के लिये सोचने का इतना अच्छा प्लेटफ़ार्म भी तो दे रहे हैं…

- अबे कुछ सोचना सिखा न? सोच रहा हू इस बार सोचने का सर्टिफ़िकेशन क्लीयर कर ही लूं… तू तो सोचने में एक्सपर्ट है…

- (बार में टल्ली होकर सोच को गाली देते हुये) कहा था साले से दारू पीने आ जाना… लेकिन साले को सोचने से फ़ुर्सत मिले तब ना… अबे अब जितनी जरूरत है उतना सोचो…

 

पैरेन्टस से बातें कैसी होतीं?

- दिन भर अपने दोस्तों के साथ आवारागर्दी करते रहते हो… कभी बैठकर कुछ सोचते क्यूं नहीं??

- बेटा थोड़ा बहुत तू भी सोच लिया कर… देखता नहीं तेरे पिताजी अब सोचते सोचते कितना थक जाते है…

- शर्मा जी के लड़के को देखो… तुमसे छोटा है लेकिन अभी से  सोचता है और तुम!

 

………… और ज़िंदगी यूं ही सोचते सोचते कट जाती ॥

 


पुनश्च:

शम्स जी के जुगाड़ में थोड़ा परिवर्तन करके टिप्पणियों का जवाब देने के लिये ब्लॉग से जोड़ लिया है… कुछ समय पहले ज्ञानजी ने इसको इम्प्लीमेन्ट किया था। आप सामान्य तरह से टिप्पणी कर सकते हैं!!


Tuesday, July 6, 2010

दो मिनट…

clockट्रेन के आने में अभी भी समय है…

आज ’नेह’ को २ बजे वाली ट्रेन से वापस जाना है। बान्द्रा से दिल्ली जाने वाली वो ट्रेन, सिर्फ़ दो मिनट के लिये बोरीवली रुकती है। संडे होने के कारण आज प्लेटफ़ार्म पर रोज़ के मुकाबले भीड़ कुछ कम है। यहाँ छोटे शहरो की तरह लोग कभी कभार ट्रेन्स पर नहीं चढ़ते। बॉम्बे में ज़िंदगी हर पांच  मिनट पर उन पटरियों पर दौड़ती है। हर पांच मिनट मे न जाने कितने ही लोग उन ट्रेन्स से उतर जाते है और कितने ही नये लोग उसमे चढ़ जाते है। न तो रुका हुआ प्लेटफ़ार्म इसकी परवाह करता है और न ही भागती हुयी लोकल्स। दौड़ती हुयी ज़िंदगी भी कहाँ किसकी परवाह करती है…

बोरीवली के प्लेटफ़ार्म नम्बर चार की भागती दौड़ती उस भीड़ में वही एक रुका हुआ सा लगता है। कुछ सोंचते हुये इधर उधर किसी भी रैंडम डायरेक्शन में टहलता हुआ दिखता है… कभी कभार मोबाईल पर समय भी देख लेता है। उस दो मिनट की मुलाकात के लिये वो आधे घंटे पहले ही प्लेटफ़ार्म पर पहुँच गया है। कुछ महीने पहले आये एक कॉल से ही तो  ज़िंदगी कुछ थमी थी  और दो लोगों  ने इन दो मिनटो को सहेजने की रूपरेखा तैयार कर ली थी…

 

- पहचाना?

- ह्म्म… हाँ, शायद।

- नहीं पहचाना, आई नो…

- नेह?

- तुम्हारी ज़िंदगी मे ऎसी रांग टाईम एन्ट्री और कौन मार सकता है?

- तुम बिल्कुल नही बदली हो।

- लेकिन ज़िंदगी काफ़ी बदल गयी है… बॉम्बे आ रही हूँ लेकिन शायद मिल न पाऊ…

- ह्म्म…

- वो तुम्हारी क्रश कैसी हैं? सॉरी, मैं उनका नाम भूल गयी वो राईटर जिनके बारे में तुम बताया करते थे?

- ’एहसास’… उम्र बढ़ने के साथ साथ उनकी खूबसूरती भी बढती जा रही है…। अच्छी हैं… सुन्दर हैं…

- मुझे मेरे सामने तुम्हारे मुंह से किसी और लड़की की तारीफ़ अच्छी नहीं लगती… तुम भूल गये शायद? ऎनीवेज़… जोकिंग बाई द वे…

- ह्म्म… कोई बात नहीं…

- मुझसे मिलने का मन नहीं है न? ऎनीवेज़… जाते वक्त ट्रेन से जा रही हूँ… ट्रेन बोरीवली रुकती है… तुम आ जाओगे तो बाद का सफ़र आसान हो जायेगा…

- मै जरूर कोशिश करूँगा…

- पहले कोशिश करते तो शायद ये सफ़र भी आसान हो जाता… ऎनीवेज़… और सुनाओ?

- बस… सब बढ़िया है… तुम कैसी हो? बॉम्बे कैसे आना हुआ?

- अच्छी हूँ… खुश हूँ… अभी कुछ महीने पहले ही इंडिया आना हुआ… इन्होने दिल्ली में अपनी एक कम्पनी स्टार्ट की है। कुछ समय से उसी सिलसिले मे ये बॉम्बे में ही हैं। तुम्हें तो याद नहीं होगा? २ जुलाई को मेरा जन्मदिन है… इन्होने कहा कि बॉम्बे ही आ जाओ… फ़िर से हनीमून मनाते है। समटाईम्स ही इज़ रोमान्टिक, यू नो।

- तुम्हारा जन्मदिन मुझे याद है…

- अच्छा!! इन पांच सालों में कभी विश तो नहीं किया? ऎनीवेज़… इन्होने तो कहा कि ट्रेन से क्यूं जा रही हो पर मैंने सोंचा कि बोरीवली स्टेशन को भी देख लूंगी… शायद तुम्हारे साथ… जैसे तुम सब कुछ अपनी आँखों से दिखाते थे… वो बोरीवली से दिल्ली तक की जर्नी याद है? पूरे सफ़र तुम मुझे कुछ न कुछ दिखाते रहे थे…

- अब मुझे कुछ नही दिखता…

-  क्यूं? चश्मे का नम्बर बढ़ गया है क्या? वैसे चश्मे में तुम एकदम राईटर लगते थे… लेकिन तुम न कभी भी एक्स्प्रेसिव नहीं थे… न जाने कैसे इतना कुछ लिख लेते थे… कुछ कहते हुये तो मैंने कभी नहीं  सुना… वो तो मैं थी जिसने तुम्हें इतना झेल लिया… और कोई होती तब पता चलता तुम्हें…

 

अनाउन्समेंट:  बान्द्रा स्टेशन से दिल्ली जाने वाली एक्सप्रेस ट्रेन ५ मिनट की देरी से…………

वो मोबाईल में  समय देखता है। अभी १० मिनट और हैं…

 

- ह्म्म… कबकी ट्रेन है?

- ५ जुलाई को २ बजे  बोरीवली मे ऎराईवल टाईम है… कितने अच्छे दिन थे न? तुम्हारी हर कहानी में कहीं न कहीं मैं होती थी… नहीं तो मुझसे की गयी वो ढ़ेर सारी बातें जो तुमने कभी मुझसे सामने से नहीं कही… तुम्हारी कहानियों में मैं जीती थी… याद है एक बार जब तुमने मेरे कैरेक्टर को एक कोई भद्दा सा नाम दिया था

- ह्म्म… और तुमने कहा था कि अबसे कैरेकटर्स के नाम तुम डिसाईड किया करोगी… खासकर जो तुमसे इन्सपायर्ड हो…

- हाँ और तुम्हें लगा था कि एक्नोलेजमेंट में इसका नाम भी लिखना पड़ेगा (खिलखिलाते हुये)

- ट्रेन बस दो मिनट रुकेगी?

- हाँ!! चाहो तो साथ चल सकते हो दिल्ली तक… यादों की पुरानी पेंटिंग्स पर साथ साथ नये ब्रश मारेंगे… ऎनीवेज मैं तो अभी पुरानी नहीं हुयी हूँ, यू नो…

- मैं तो नया नहीं रहा… ऎनीवेज तुम्हारे ’ऎनीवेज’ अभी भी उतने ही मीनिंगफुल हैं… ऎसे एकदम से दिल्ली तो नहीं जा पाऊंगा… प्लेटफ़ार्म पर आने की कोशिश करता हूँ…

- ओह ’एकदम से’? याद है जब तुम्हारे कहने पर ’एकदम से’ मैंने अपनी ट्रेन छोड़ दी थी… अगले एक हफ़्ते तक मुझे फ़िर कोई रिजर्वेशन नहीं मिला था। वापस घूमकर हॉस्टल भी नहीं जा सकती थी… लेकिन कितनी अच्छी शाम थी न? हम तुम हाथों में हाथ डाले जे जे फ़्लाईओवर पर घूम रहे थे… घनघोर ट्रेफ़िक में… जहाँ फ़ोर व्हीलर रेंग रहे थे… हम भाग रहे थे… बॉम्बे के सबसे बडे फ़्लाईओवर पर… पैदल… और उसके बाद ऎशियाटिक लाईब्रेरी की सीढ़ियों पर घंटो बैठे रहना… सामने वाले पार्क में हो रहे किसी नाटक को देखते रहना… उन भीनी भीनी पीली लाईट्स मे

- अब शायद सफ़ेद लाईट्स लग गयी है वहाँ… कोई बता रहा था काफ़ी समय से उधर नहीं गया…

- अच्छा!… दूधिया रोशनी भी अच्छी लगती होगी… ऎनीवेज़ और क्या क्या बदल गया है?

- बस और आटो के रेट्स बढ गये हैं…

- तुम भी तो बढ गये हो! तुम्हारी नयी कहानी पढी थी। उसके पुरुष पात्र का किसी उम्रदराज महिला के साथ एक फ़िजिकल सीन भी था… किसके बारे में सोंचकर लिखा?……  सिर्फ़ सोंचा ही न?

 

ट्रेन की आवाज धीरे धीरे तेज होती जा रही थी… वो दूर पटरियों  की तरफ़ देखने लगा। दूर से एक ट्रेन आ रही थी… पुरानी यादों के साथ… धीरे धीरे… धीरे धीरे…

Monday, June 28, 2010

एक रिकर्सिव कहानी…

raindance मुम्बई की बारिश कभी किसी को काम पर जाने से नहीं रोकती… ये या तो तब शुरु होती है जब आप सो रहे होते हो या तब जब आप ओफ़िस निकल चुके होते हो… इसलिये बारिश की छुट्टी लेने के ख्याल अकसर सूखे ही रह जाते है…

ओफ़िस से अभिषेक आज थोड़ी जल्दी निकल आया था। बाहर बारिश हो रही थी… अपने छाते से अपने को भीगने से बचाते बचाते वो उस रोड तक पहुँच चुका था जहाँ से उसे घर के लिये रिक लेना था… रिक दिखते ही वो उसे हाथ हिलाकर रोकने की कोशिश करता… पर काफ़ी टाईम से किसी रिक ने उसकी तरफ़ देखा तक नहीं था…   इसी दौरान कभी कभार अपने छाते को हटाकर आसमान की तरफ़ देख लेता… ये बूँदें आखिर आती कहाँ से हैं … एक पल उसके और बादलों के बीच दूर दूर तक कुछ नही होता… फ़िर बूँदें न जाने कहाँ से अवतरित होती और धीरे धीरे बड़ी होती जातीं… फ़िर उन बूंदों का उसके चेहरे से ऎसे स्पर्श होता जैसे कोई बड़े प्यार से उसके चेहरे को हर तरफ़ से चूम रहा हो।

- आपको बोरीवली जाना है?

किसी मीठी सी आवाज़ ने उसकी एकान्तता मे दखल दिया था..

- क्या?

- आर यू गोइंग टु बोरीवली?

- या…

’क्यूं’ पूछने से पहले ही वो अगली लाईन बोल चुकी थी।

- आज रिक की काफ़ी शोर्टेज रहेगी सो अगर रिक मिलता है तो हम दोनो साथ जा सकते हैं…

उसने वो बात कहकर मुंह घुमा लिया… और आते हुए रिक्स को हाथ दिखाने लगी…  अभिषेक फ़िर अपनी दुनिया में खो गया…कहीं मेरी शक्ल किसी और से नहीं  मिलती न…?? न!, ये मेरे साथ तो नहीं  हो सकता… ये मेरी किस्मत तो नहीं  हो सकती कि हल्की हल्की बारिश हो… एक अन्जान लड़की हो… और वो भी एक रिक में जाने के लिये तैयार… नहीं नहीं … शी इज़ मिस्टेकिंग मी विथ समबडी…

- मै टाटा पॉवर से दूसरा रिक ले लूंगी। आप इसे लेकर निकल जाना…

 

दिखने में तो बहुत सामान्य है… आँखों  पर स्पेक्स हैं और शरीर पर एक बहुत ही नोर्मल सा सलवार सूट… मुस्कराती है तो सारे दांत दिखते हैं… कम्बख्त दांत भी एकदम करीने से लगे हुये हैं… और मेरे…… जैसे जहाँ जिसको जगह मिली निकल लिया और जगह कब्जिया कर बैठ गया…

कहाँ पिछले आधे घंटे से उसे कोई रिक्शे वाले ने भाव नही दिया था और कहाँ उसे आये हुए अभी दो मिनट भी नही हुये थे कि अचानक ही एक टैक्सी अवतरित हुयी… पीछे वाली सीट पर एक आंटी अंकल पहले से बैठे हुये थे… ड्राईवर ने उसे आगे बैठने के लिये कहा। वो आगे बैठते हुये उससे बोली “कम ना? ही इज़ गोइंग तो टाटा पॉवर। वहाँ से रिक ले लेंगे…”

ये तो साफ़ साफ़ जाहिर था कि वो टैक्सी ’उसे’ लिफ़्ट देने के लिये नहीं रुकी थी… लेकिन वो तो बुला रही थी और वो भी इतने हक से… मना करना बनता भी नहीं था… वो मना करना चाहता भी नहीं था…

- कम ना? फ़ास्ट?

टैक्सी के आगे वाले पोर्शन मे आधी जगह ड्राईवर की थी और बाकी आधी जगह मे उसे, उस बन्दी के साथ एडजस्ट करना था… बीच बीच मे टैक्सी का रोटेटिंग गियर भी कभी कभी एक दो राउंड मार जाता था। वो खिड़की से चिपककर उसी मे सिमट गया था और उसकी एक बांह लड़की के पीछे से होते हुए ड्राईवर से कुछ पहले तक जाती थी… सबलोग टैक्सी मे बैठ चुके थे… टैक्सी के इंजिन की आवाज के साथ साथ उस टैक्सी मे मौन का एक निर्वात बन चुका था। सब उसी मे तैर रहे थे…चुपचाप… । अपनी खिड़की से चिपका हुआ अभिषेक बाहर एकटक देख रहा था और अपने ही मौन मे उस लड़की से पूछने के लिये सवालों की रूपरेखा तैयार कर रहा था… सवाल सोंच रहा था… उन्हें जरूरत के मुताबिक फ़िल्टर कर रहा था… वो उस एंजेल को जानना चाहता था जिसने  एक पल को ही सही  पर उस बरसती बारिश में उसकी धूल भरी किस्मत से धूल की एक पर्त झाड़ी थी…

अचानक ही उसे इस मौन से घुटन होने लगी…

- यू वर्क इन निर्लोन काम्प्लेक्स?

- यप, आई एम वर्किग विथ डायचे बैक

- ओह्ह… डायचे बैक… टेक्निकल ओर फंक्शनल साईड?

- फंक्शनल बेसिकली

- ह्म्म… ……अच्छा डोंट यू थिंक बॉम्बे की बारिश भागते हुये बॉम्बे को थोड़ा स्लो कर देती है…?

- तुम मुम्बई से नहीं हो??… ……फ़िर कहाँ  से हो?

- लखीमपुर…

- क्या?

- लखनऊ के पास है… तुम कहाँ से हो?

- बोर्न एंड ब्रोट अप इन बॉम्बे… वैसे हम लोग राजस्थान को बिलोंग करते हैं…

- ह्म्म… मतलब ये बारिश तुम्हारे लिये नयी नहीं है?

- (मुस्कुराते हुये) यहाँ फ़ेमिली के साथ रहते हो?

- नहीं…… रूममेट्स के साथ

ये सवाल थोड़ा डायरेक्ट नहीं था… बंदियां कितना कुछ तो डायरेक्ट पूछ लेती हैं… लगती तो बैचलर है लेकिन सेल बार बार देख रही है जैसे कोई इंतज़ार कर रहा हो… माईट भी मैरिड… माईट भी बोयफ़्रेन्ड… हू नोज़?… कहीं वो ये तो नहीं चाहती कि मैं उससे उसका नंबर मागूँ…

- अभिषेक हीयर

- तिथी…

- तिथी, तुम न होती तो शायद मैं अभी भी वहीं रिक का वेट कर रहा होता…

- अभी नहीं कर रहे हो न? (अपनी करीने से लगी बत्तीसी दिखाते हुये)

यूं तो अभिषेक खिड़की से बाहर देख रहा था लेकिन पलटकर उसको मनभर कर देखना चाहता था… उस कन्जस्टेड जगह मे कभी कभी अभिषेक तिथी  को छू जाता तो कभी कभी तिथी की गर्दन अभिषेक की बांह पर जैसे रह जाती … उस बरसती बारिश मे कितना कुछ तो उनके भीतर बरस जाता  फ़िर भी दोनो सहज बने रहते। वो टैक्सी की सामने वाली विंडो से एकटक सामने देखती रहती तो वो साईड वाली विंडो से… कभी कभी वो सामने वाली विंडो से बाहर देखने की कोशिश भी करता…

- तुम बोरीवली मे कहाँ  रहते हो?

- नेशनल पार्क

- नेशनल पार्क में ? (अपनी ट्रेडमार्क बत्तीसी दिखाते हुये)

- आई मीन नेशनल पार्क के पास… …और तुम?

- मुझे वेस्ट जाना है…

टाटा पॉवर आ चुका था। बारिश अभी भी हो रही थी। लोग वहाँ रिक्स के इंतज़ार में खड़े थे। वो दोनो टैक्सी से उतरे ही थे और उन सारे लोगों की किस्मत को दरकिनार करते हुये उसकी ख़िदमत में  एक रिक हाजिर हो चुका था…

- मैं घर तक ड्राप कर दूं… वहाँ से रिक लेकर मैं अपने घर निकल जाऊगा।… (ओफ़र थोड़ा अटपटा था)

- अरे! ……मैं इधर जा रही हूँ और तुम्हें उधर जाना है… यू नो एकदम अपोजिट…

- कम्बख्त टाटा पावर को भी इतनी जल्दी आना था…  अच्छा… ………तुम न मिलती तो शायद मैं  अभी भी वहीं रिक का वेट कर रहा होता…

उसकी ट्रेडमार्क बत्तीसी सामने आ चुकी थी… उसने एक पल अभिषेक को देखा फ़िर अगले पल उसके पीछे खड़े एक बन्दे को… उसकी भी शक्ल से ही लग रहा था कि कितनी देर से वो अपनी धूल भरी किस्मत के सहारे एक रिक के लिये खड़ा है…

- आपको वेस्ट जाना है? आर यू गोइंग टु बोरीवली वेस्ट?

- हाँ…

- मैं भी उधर ही जा रही हूँ… कम ना? वी कैन शेयर दिस रिक।

 

…… इधर अभिषेक फ़िर रिक के इंतज़ार में खड़ा था।

Monday, June 14, 2010

आसमान के पेशेवर होने से बस थोड़ा सा पहले…

DSCN1655 लोकेशन – कोयमबटूर… साल २००७ के जुलाई महीने का पहला हफ़्ता… दो महीने चली एक रिगरस ट्रेनिंग के बाद आने वाले ४-५ दिनों में हमें अपनी अपनी ब्रांच लोकेशन्स में रिपोर्ट करना था… फ़ोटो खिंचाई अभियान जोरों शोरों पर था और स्लैम बुक भरवाई कार्यक्रम भी… दो महीने  में बने रिश्ते नाते छलक रहे थे… रोज़ थोड़ा थोड़ा सेन्टियाना बनता था… सुंदरियों को विदा करने वालों की लाईने लगीं थीं  और कई आधी अधूरी कहानियां बिखरने को तैयार थीं… प्रोफ़ेशनल ज़िंदगी में पहला कदम था और पेशेवर हवाओं में सिगरेट के छल्ले उड़ाने के अरमान…

उस दिन ओफ़िशियल ग्रुप फ़ोटो खींची जानी थी… मै हमेशा की तरह लेट था… पहुँचते ही किसी की आवाज़ आकाशवाणी की तरह आयी थी कि आईये ’पंक्चुअल पंकज’, क्या बात है हमेशा की तरह टाईम पर और हम अपनी बत्तीसी नपोरते हुये फ़ोटो के लिये खड़े लोगों में जगह बनाते हुये कहीं खड़े हो गये थे… जैसे दिमाग में  लेट में  दाखिल हुआ कोई विचार, दिमाग की पहले से बजा रहे विचारों के साथ जगह बनाकर खडा हो जाता है…

अगर कुछ दिन और पीछे चलें, तो कहानी यूं थी कि कोई मैडम (कुंवारी थी या R001-027मैरिड, उससे आपको क्या  लेना देना…) क्लास मे अलग अलग जगहों से आये हुये लोगों को एक दूसरे के और करीब लाना चाहतीं थीं… यू नो ’टीम स्किल्स’… तो चूतियापे भरा काम यह था कि आपको अपने नाम के पहले अक्षर से शुरु होने वाला कोई विशेषण, अपने नाम के साथ बोलना था और आपके बाद पड़ने वाले लोगों को आपका नाम उसी विशेषण के साथ बोलना था… हमेशा की तरह सबसे पहली दुनाली हमारे सीने पर रख दी गयी… दिमाग के भीतर के सारे वायर्स बडी मुश्किल से एक विशेषण ला पाये और एक स्लो मोशन में जैसे हमारे अन्दर से फ़ूटा - ’पंक्चुअल पंकज’। निकलते ही आत्मा को समझ आ गया कि बॉस! तुमने अपनी ही गोल पोस्ट मे गोल दाग दिया है… और ठहाकों की आवाज जैसे दर्शक दीर्घा मे उस गोल के होने की खुशी को बयान कर रही थी… किसी अत्यंत खुश दर्शक की खुशी से भरी एक लाईन भी मार्केट में उसी वक्त आयी थी – “साले तो रोज बस क्या ड्राईवर लेट करवाता है…”  :(

अब उन्हे मैं कैसे बताता कि साला मेरा रूममेट है जो मुझसे आधे घंटे पहले का अलार्म लगाता है और उसके बाद एक घंटे वो रूम से अटैच्ड उस इकलौते पाखाना+गुसलखाना टाईप कमरे में। मेरे अलार्म में मुझे उठाने की हिम्मत कभी नहीं रही… वो ’कोशिश करने वालो की हार नही होती’ की तर्ज पर हर पांच मिनट के बाद मुझे उठाने की कोशिश करता और फ़िर थक हारकर किसी तकिये के नीचे, नही तो मेरे पेट के नीचे… नही तो बेड के नीचे पड़ा मिलता। सुबह सुबह उसे देख यही लगता कि उसने आत्महत्या के कई असफ़ल प्रयास किये हों… नहीं तो मुझे जगाने के…

मेरा रूममेट, मेरा भाई, मेरा दोस्त, मेरा सच्चा दोस्त… अपने सारे क्रियाकलाप खत्म करने के बाद टाई पहनते हुये मुझपर अहसान करते हुये मुझे जगाते हुये कहता कि “जल्दी कर, बस आ गयी है” और फ़िर अपनी टाई बाँधने में मशगूल हो जाता… उठते ही मैं उसकी स्वार्थी कम दयावान टाईप पर्सनालिटी पर गर्व करता कि आज ये न होता तो क्या होता :( :)… और उसके टाई बांधकर, लिफ़्ट से नीचे जाते हुये बस मे बैठकर सबसे ये कहने से पहले कि चलो उसे लेट हो जायेगा, मुझे सारे क्रियाकलाप खत्म करते हुये बस तक पहुँचना होता था… अब इतना तो आपको अंडरस्टुड होगा ही कि ’सारे क्रियाकलाप’ मतबल ’सारे’ से ’कुछ कम’… ;) डियो वियो का जमाना है बॉस…

हाँ तो ग्रुप फ़ोटो के लिये जगह मिल गयी थी… ’पंक्चुअल पंकज’ जुमले ने जो आड़े तिरछे दांत नपोरवा दिये थे वो फ़ोटू लेने वाले भाईसाहेब को हजम नही हो रहे थे… कह रहे थे कि ’इस्माईल दो, दांत मत नपोरो’… अच्छा हुआ मन में हंसने के लिये नहीं कहा नहीं तो हमको तो उसकी प्रैक्टिस भी नहीं थी… खैर… कोडैक क्लिक हुआ… इस्माईल किये हुये और सबने उस लम्हे की एक एक कोपी की गुज़ारिश भी कर दी और अपनी अपनी चकाचक, रंगारंग स्लैमबुक निकालकर बैठ गये… हाय हमें लगा कि हम फ़िर से लेट… दौड़ कर बगल वाली स्टेशनरी की दुकान से एक ५ रूपये की डायरी उठा लाये और बिछा दिये सबके सामने…

आज घर की सफ़ाई करते हुये वही डायरी मिली… खोयी हुयी अच्छी चीज़ें, सरप्राईज के साथ मिलने पर मूड बना जाती हैं… इस डायरी ने भी बखूबी अपना काम अंजाम दिया… ये पोस्ट हिमान्शु जी और अन्य लोगों को डेडीकेटेड है जिनके मूड को मेरी लास्ट पोस्ट की वजह से डाउन होना पड़ा… उम्मीद है एक मुस्कराहट दे पाउँगा जैसे इस डायरी ने मुझे दी है…

इसी डायरी से हमारे लिये कही गयी कुछ अनसेन्सर्ड तारीफ़े ;) 


- अबे कंजूस, एक अच्छी स्लैम बुक खरीद… I have only two words for you (Hope you had seen WWF some point in your life!!)  MISS U :(

- भाभी को सिद्धार्थ का प्यार देना ;)

- ’बक भो……’  वेल स्पोकेन!!

- What a jolly person you are! रियली तुम्हारे बिना तो बस मे माहौल भी नही बनता था… तुम्हारे कमेन्ट्स on GPL ceremonies were ‘wunderwar’… And timely asking ‘BHAI KUCH HO TO BATA DENA……’

- Punctual Pankaj!! साला लोगो को पागल समझ रखा है क्याR001-019? लेकिन फ़िर भी मैं पागल  हूँ। तेरे लिये मैं ये भी करने को तैयार  हूँ। साले एक तेरे कारण हम लोगो को स्मोक करने के लिये इतनी दूर जाना पड़ता है… साला जरूरी था कैम्पस के अन्दर स्मोक करना… कुछ नही इस कारण लोगो से मुलाकात हो जाती है। और पता है in the beginning of ILP लोग कहते थे कि पंकज लोगों  की मारता रहता है तो मै लोगों से कहता था कि कौन है साला…तुम लोगों को मारना नही आता क्या… जब मिला तो पता चला कि कौन है साला। साले डीजी की इतनी मत मारा कर और पीयूष की भी… साले तू वो दिन याद करना जब तेरे कारण कोलिन सर ने हम लोगों  को डांटा था… साले कम पी लिया कर… चल कोई नही, ज्यादा नहीं लिखूंगा, नहीं तो कहेगा कि साला interactive हो गया है…

- Hi Tau! you are very nice, ugly, technically bullshit… ताई से कब मिला रहा है…… अभी जो लिखा सब बकवास। you rock man!!

- Hello Pankaj! Nice to have you as a friend. Its so nice that you are so caring, good at heart, try to calm others, solve their problems. You have such a great knowledge about everything. Be the way you are. Don’t change and do take care of yourself. You’ll surely achieve all the success… Have a great life ahead. Don’t forget us. You’ve got a good smile :)

- Hi Pankaj! I met you in ILP and our whole batch feels that you are very intelligent person. (बहुत हो गया क्या?) You are very nice person. got a great sense of humor and one good thing about you is you care for others. Keep it up. Keep smiling. Wish a great future… Dont forget us. keep in touch..

- Hello Pankaj! You are a very good, helpful and smiling friend and I would also like to mention that you are technically very strong. So मुम्बई मे doubts clear kar dena.. Keep in contact in “Mumbai”.

- Enjoy Life… उठा ले!!:)


Thursday, June 10, 2010

वो लोग जो पहाड़ हैं…

वो हमारी कम्पनी का फ़ेस है… कम्पनी का मेन गेट खोलिये और दीवार पर लगे कम्पनी के एक बड़े लोगो(Logo) के साथ साथ, कानों में हेडसेट लगाये हुये उसकी मुस्कुराहट आपका स्वागत करती है। हमारी कम्पनी की सारी इनकमिंग और आउटगोइंग कॉल्स भी बिना उसकी इजाजत के कहीं कनेक्ट नहीं होतीं…

अभी एक हफ़्ते पहले ही एक ईमेल ब्राडकास्ट आया कि उसके शौहर इस दुनिया में नही रहे… पढते ही जैसे सब कुछ एक पल के लिये  रुका था और फ़िर से उसी स्पीड से चलने लगा था। जो भी हुआ था उसकी गवाही देने के लिये फ़्रीज हुआ सिर्फ़ वो एक पल था जो इन दो-तीन दिन में आये असंख्य पलों में खो गया था। बस इतना ही हुआ था…

परसों से वो फ़िर से हमारा फ़ेस बन गयी है। मुस्कराहट शायद थोड़ी  फ़ीकी है पर सारी कॉल्स वैसे ही कनेक्ट होती हैं।

दो दिन से मैं न उससे कुछ कह पाया था और न कुछ पूछ पाया था। सिर्फ़ ’सो सैड’ कहना मुझे आया नहीं और उन दो दिनों में जब भी अपनी निगाहें मिलीं मेरा सर एक आटोमैटिक मशीन की मानिंद नीचे झुक गया… बोलने को कुछ ढूंढा तो साले शब्द भी सर झुकाये कहीं कोने में घुसे मिले…

आज सुबह जल्दी ही ऑफिस चला गया था। अपनी फिंगर,  ’स्वाईप मशीन’ में स्वाईप करने के बाद जैसे ही दरवाजा खोला वो सामने थी… निगाहें मिलीं…  उसने ’हैलो’ बोला… मैने उसका हाल चाल पूछा…

उससे पता चला कि उसके पति को काफ़ी पहले से कैंसर था और उसके सास-ससुर मेडिकल ट्रीटमेन्ट को छोड़कर ब्लैक मैजिक में ज्यादा विश्वास रखते थे।  इसके जबरदस्ती करने पर ऑपरेशन  तो करवाया गया लेकिन बाद में कीमोथेरेपी में लापरवाही दिखायी जाने लगी और ओझाओं -तांत्रिकों पर ज्यादा विश्वास किया जाने लगा। उसकी हालत दिन पर दिन बिगड़ने लगी थी और वो ये सब देख पाने में असमर्थ थी। अपनी आँखों के सामने अपने ही शौहर को तिल तिल मरते देखना बहुत ही मुश्किल था। इनफ़ेक्शन दिमाग तक फ़ैल रहा था। वो सबसे लड़ -झगड़ कर फ़िर से उसे लेकर किसी बड़े  न्यूरोसर्जन के पास गयी। न्यूरोसर्जन ने देखते ही हालात का अंदाज़ा कर लिया था:

- …… Go back to your Cancer Doctor

- OK…… any idea how much time he has now?

- To be honest, 4-5 months.

ये कहते कहते उसकी पलकें गीली हो चुकी थीं और आँखें एकदम लाल।

- पता है पंकज, मैं उसे घुट घुट कर मरता नहीं देख सकती थी। वो घर मुझे काटने लगा था इसलिये मैं अपने मम्मी-पापा के पास चली आयी और बेबी को भी ले आयी। हर वीकेंड उससे मिलने जाती थी  तो सास-ससुर मुझे खूब सुनाते थे लेकिन तब भी जाती थी… बेबी को भी ले जाती थी…कि तीनो इन लास्ट मूमेन्ट्स में  थोड़ा साथ रह लेंगे … शायद उसे अच्छा लगेगा… पर  एक दिन मेरी सास ने बोला कि ’तू निकाहनामे के लिये आती है न? जा नहीं देंगे  तेरा निकाहनामा… हराम की औलाद कहलायेगा न? हराम की औलाद है तो कहलाना ही चाहिये!!…’

उसकी गीली और लाल आँखों पर लगा स्पेक्स भी लाल होता जा रहा था… वो अपने दुपट्टे के किनारे से आंसू पोंछती  जा रही थी और उसी बीच कॉल्स भी आ रहे थे और इंटरव्यू  देने के लिये लोग भी… कम्बख्त कुछ भी नही थमता था…

- पता है वो हमेशा अज़ान के वक्त प्रेयर करना चाहता था लेकिन हम कभी इतनी सवेरे उठ नही पाते थे। मैने २-३ वीक्स से उसके घर जाना छोड़ दिया था। क्या कर सकती थी? उसे ऎसे मरते हुये नहीं देखा जाता था… पता है मैं उसे मिस नहीं करती इवेन मुझे खुशी होती है कि वो चला गया। वो बहुत तकलीफ़ में था… और मैं चाहती थी कि उसे कोई तकलीफ़ न हो…

- पता है सुबह की अज़ान के वक्त ही……  शायद, वो जाते जाते प्रेयर कर पाया……

 

कॉल्स अभी भी आ रहे थे और इंटरव्यू के लिये लोगों की भीड़ भी बढती जा रही थी… मै उससे ’बाय’ करके अपने क्यूबिकल की ओर बढ रहा था और पीछे इंटरव्यू के लिये आये लोगों  को नियंत्रित  करती, उसकी आवाज़ आ रही थी:

- Kindly take your seats. HR people will be coming in a while…

 

सच में वो लड़की नहीं पहाड़ है…  

 

*नानावती हॉस्पिटल ओपीडी मे लिखी

Monday, June 7, 2010

राजनीति – मेरी नज़र से

poster-1 किसी फ्लॉप मूवी का एक डायलाग था कि यूपी-बिहार में हर घर में एक आईएएस, एक नेता और एक गुंडा होता है… मुझे ये कथन बड़ा जमीनी लगता है।

मेरे बाबा एक स्वतंत्रता सेनानी थे और एक कट्टर कांग्रेसी। मुझे याद है बचपन मे वो मुझे आजादी की लड़ाई के किस्से सुनाया करते थे और मैं उनकी बोर बातों से दूर भागता था। अभी अपनी सोंच बन भी न पायी थी कि पता चला था कि पापा और चाचा किसी चुनाव में बीजेपी को वोट देकर आये थे और हमें  ये बात बाबा को नहीं बतानी थी। राजनीति को बाबा, पापा और चाचा की नज़र से ही देखता था। जब तक बाबा जिंदा रहे कांग्रेस के नाम से घर में हल्ला मचा देते थे। उनके जाने के बाद घर में कई बार ऎसा भी हुआ कि पापा बीजेपी को वोट देते थे और चाचा सपा को और कई बार घर के आठ वोट एक जगह पर भी गिरते थे।

इस मुद्दे पर मेरी समझ अभी भी नहीं  बन पायी है। कुछ साल पहले जब लखनऊ में भविष्य की  दिशाओं की खोज कर रहा था, तब अटल जी से जरूर प्रभावित था। कुछ समय ’विद्यार्थी निवास’ में रहा भी, जहाँ रहकर अटल जी ने कभी अपने पिता जी के साथ एक ही कक्षा मे वकालत(Law) की पढाई की थी। उनको कुछेक पत्र भी लिखे और इन बातों पर कई बार मित्रों के बीच हंसी का पात्र भी बना। एक बार राउरकेला में एक पर्सनालिटी डेवलपमेन्ट क्लास के दौरान काउंसलर ने क्लास से पूछा कि आपमें से कितनों में  लीडरशिप क्वालिटीज़ है? कितने लोगो को लगता है कि वो लीड कर सकते हैं? मेरा हाथ तुरंत हवा में उठ गया। मै सबसे आगे वाली पंक्ति में था। आस-पास देखा… फ़िर पीछे घूमकर देखा तो सिर्फ़ मेरा हाथ ही हवा में था…

गुजरात में  दंगे  हुये… नये चुनाव हुये… अटल जी अपनी बातों पर अटल नहीं रह पाये… बीजेपी एक लीडरशिप क्राईसिस में दिखी… यूपी में पुराने नेता रद्दियो में बदलते गये और नया कुछ वो ढूढ नहीं  पाये… कुछ ने ’उत्तम प्रदेश’ के सपने भी दिखाये लेकिन साइकिलों के पहियों में ही खो गये… जनसँख्या पर ध्यान देने की बजाय मूर्तियो की संख्या पर नेताओं का ध्यान ज्यादा दिखा… और इन सबने मुझे दूर, बहुत दूर कर दिया। …… अब अगर वो काउंसलर वो सवाल फ़िर से पूछेगी, वो अकेला हाथ भी उसे खड़ा  नही दिखेगा।

 

अभी अभी ’राजनीति’ देखकर लौटा हूँ… कुर्ते-पायजामे से डेनिम-नोन डेनिम पहने हुये  पात्रों को ’सिर्फ़’ राजनीति करते हुये देखा। भीड़ों को भटकते हुये देखा और इन पात्रों को उन भीड़ों को बरगलाते हुये। सबको उस ’कुर्सी’ तक पहुचने के रास्ते तलाशते देखा और उस कुर्सी के बाद एक डेड एन्ड को भी…

इस फ़िल्म ने राजनीतिक गलियारो में घुसते हुये  जो कहानियां दिखायीं, उन्हें  देखकर युवाओं के गंदी राजनीति में जाने के सपने को चोट ही लगनी चाहिये। सच्चाई कड़वी होती है और मै अभी इस कड़वेपन को महसूस कर रहा हूँ…

फ़िल्मी लिहाज से मूवी ने अंत  के कुछ पहले तक बांधे  रखा और अंत में जैसे अपनी ग्रिप छोड़ती नज़र आयी। इंटरवल तक कहानी में एक कसावट थी जिसे मैंने अपने आस पास भी महसूस किया। इंटरवल के बाद की कहानी ओबवियस होती गयी और अंत बेहद फ़िल्मी… फ़र्स्ट हाफ़ तक कहानी महाभारत जैसी लगती रही… सेकन्ड हाफ़ मे जबरदस्ती इसे महाभारत बनाने की कोशिश सी दिखी… कहानी मे काफ़ी कुछ परोसकर रखने के बजाय, बिटवीन द लाईन्स भी छोड़ा जा सकता था… अंत में बचे हुये मोहरों  के बीच करवाया गया युद्ध, महाभारत युद्ध कम और गैंगस्टर वार ज्यादा लगा और उस वक्त समर के हाथ मे दी गयी पिस्टल, एक इंटेलीजेंट पात्र को बेहद फ़िल्मी बना गयी।

 

poster-3आखिर में मुझे बस एक चीज़ ने कचोटा कि क्या होता अगर एक जागरुक, दलित नेता ’सूरज’ जो इस राजनीति में सबसे गंदा होते हुये भी कईयों से साफ़ था, अंत में कुर्सी पर बैठता और न कि ‘इंदु’  जिसने जमीनी सच्चाई कभी देखी ही नहीं थी, जिसे इन सारे पात्रों में से राजनीति की सबसे कम समझ थी?

Monday, May 31, 2010

आधी अधूरी ज़िन्दगी…

- सर, मिनरल वाटर ओर प्लेन वन? painting

- ६० रूपीज फ़ोर अ वाटर बोट्ल? आप लोग एक्वागार्ड यूज करते है न अपने रेस्तरां में?

- यस सर…

- गुड, देन ब्रिंग प्लेन वाटर प्लीज़…

- तुम्हे प्लेन वाटर चलेगा न?

- या या… श्योर……

 

दोनो की वो पहली मुलाकात थी… दोनो को एक दूसरे के बायोडेटा में लिखा नाम बड़े सलीके से याद था…

प्रिया और गणेश…

कल रात ही प्रिया को उसकी माँ  ने गणेश के नये ईमेल के बारे में बताया था… कुछ रोज पहले ही गणेश ने शादी डोट कॉम पर प्रिया को रिक्वेस्ट भेजी थी… पूरे परिवार की सोंचा  विचारी के बाद इक मुलाकात फ़िक्स की गयी थी… पहली मुलाकात। गणेश एक आईआईएम पासआउट होने के  साथ साथ एक आन्त्रेप्रेन्योर भी था और इसी साल उसकी कम्पनी को टाप २५ स्टार्ट अप्स मे नोमिनेट किया गया था… कुल मिलाकर ’एक शादीलायक मटीरियल’ था… थोडा अच्छे शब्दो मे कहे तो ’एन एलिजिबल बैचलर’…

प्रिया ने उसकी एक छवि बनाकर रखी थी… एक स्नोबी पुरुष जो हर बात पर अपनी ही करेगा… कहेगा कि ये ऎसे किया करो ये वैसे… वो कह देगी कि उसे कोई ऎसा वैसा न समझे… वो एक सॉफ्टवेयर इन्जीनियर है  और अपने पैरो पर खड़ी है। तीन साल से नोयडा मे इन्डिपेन्डेन्टली  रह रही है।        …… उसने कुछ भी स्नोब्री दिखायी तो साफ़ साफ़ मना कर देगी।

लेकिन कभी कभी ज़िन्दगी का सबसे बड़ा  फ़ैसला लेने के लिये किसी की कही एक लाईन ही काफ़ी होती है और कभी कभी कहे गये लम्बे से लम्बे पैराग्राफ़्स भी टस से मस नही कर पाते…

गणेश ने उस वक्त ऎसी ही एक लाईन कह दी थी… उस अमेरिकन रेस्तरां में,  स्नोब्री और शो-ओफ़ मछली मार्केट की बू जैसा हवा मे फ़ैला हुआ था और गणेश ने उस हवा को दरकिनार करते हुये कितनी सादगी से प्लेन वाटर के लिये कहा था…। प्रिया ने अपने माता-पिता  को मन ही मन धन्यवाद कहा और अपनी उसी किस्मत पर बहुत नाज़ किया जिससे वो कुछ दिन पहले एक लव मैरिज चाहती थी… लव मैरिज… उससे… जो कभी उसके प्यार के लायक ही नही था…

वो अपने इन्ही विचारों में पर्त दर पर्त डूबती जा रही थी और उस टेबल पर वो दोनो पर्त दर पर्त खुलते जा रहे थे। उनकी बातों से बातें निकल रहीं  थीं और निकली हुयी बातों से फ़िर ढेर सारी बातें… एक ही बात को सोंचते हुये दोनो की आँखों  में अलग अलग आकृतियाँ बनती थीं  वैसे ही जैसे बादल, आकाश में मोर्ड्न आर्ट बनाते रहते हैं… और हर देखने वाले को उनमें कुछ अलग ही दिखता है। उस अमेरिकन रेस्तरां मे दो बादल साथ मिलकर ऎसी ही कुछ तस्वीरें बना रहे थे……

- आई एम डन। तुम्हे कुछ और चाहिये?

उसने गर्दन हिलाकर ’ना’ कहा और वापस टेबल की ओर देखते हुये अपनी उन्ही आकृतियाँ  में खो गयी।

- प्रिया…………?

- ………हाँ?  (आँखें टेबल को छोड़ गणेश की आँखों को देखने लगीं)

- बिफ़ोर गोइंग अहेड, मैं तुम्हे एक बात बताना चाहता हूँ…

- हाँ … कहो……

- ……मुझे अर्थराईटिस है। …………मैं ज़िन्दगी के इस मोड़ पर जहाँ मुझे किसी के साथ जुड़ना है, इस सच्चाई से मुंह  नहीं घुमा सकता और मुझे लगता है कि मेरे जीवन में आने वाली को, ये सब पहले से पता होना चाहिये।

प्रिया के लिये आसपास का शोर म्यूट हो गया था… दिमाग और दिल आपस मे किसी मुद्दे पर बात करना चाहते थे…

- …………गणेश! ………………… ऎसी बातें  मेरे लिये मायने नहीं रखतीं …। अगर इन्सान तुम्हारे जैसा सुलझा हुआ और इतना समझदार है तो ये सब बातें  बेमानी है। (उसका दिमाग और दिल अभी भी बातें  करना चाह रहे थे)

- ह्म्म… तुम्हे ये बात अपने परिवार को भी बता देनी चाहिये जिससे कोई भी किसी कन्फ़्यूजन मे न रहे…

- ह्म्म…

- चलो तुम्हे घर ड्राप कर दूँ…

- ह्म्म…

 

पूरे सफ़र प्रिया ख्यालों  के एक जाले में उलझी हुयी थी।

ये उसकी ज़िन्दगी का सबसे बड़ा  निर्णय है आखिर शादी-विवाह रोज़ थोड़े  ही होते हैं… लेकिन गणेश कितना सुलझा हुआ है… ज़िन्दगी नर्क बन जायेगी… उसका साथ रहा तो नर्क को भी स्वर्ग बना लेंगे… काश वो लड़का  भागता नहीं … अच्छा हुआ जो सच्चाई बाहर आ गयी… लव मैरिज… गणेश… आप लोग एक्वागार्ड यूज करते है न अपने रेस्तरां में ?… प्लेन वाटर… अर्थराईटिस…

- तुम्हारा घर आ गया…

- ओह, हाँ … (कार से उतरते हुये)

- इट वाज़ अ नाईस इवनिग विद यू

- सेम हियर… …गुड नाईट…

- गुड नाईट…

वो मंजर अधूरा था, अधूरा ही रहा… गणेश की कार आगे बढ़ गयी… प्रिया ने उसे थोड़ी देर जाते हुये देखा फ़िर घर के अन्दर चली गयी। अधूरा मंजर एक अधूरी रात के साथ उस जगह कई सालों तक पड़ा रहा…

 


प्रिया आजकल यूएसए में  है… उसके पति के पास ग्रीन कार्ड है… कुछ दिन में उसे भी मिल जायेगा… उसकी झोली में ढेर सारी खुशियाँ  हैं लेकिन उसकी ज़िंदगी अभी भी कुछ अधूरी सी है… अभी भी वो फ़ेसबुक पर गणेश की पब्लिक अपडेट्स देखा करती है… फ़्रेन्ड रिक्वेस्ट आजतक नहीं  भेज पायी… फ़ेसबुक प्रोफ़ाईल पर गणेश का मेराईटल स्टेट्स (marital status) ’मैरिड’ है…

गणेश की शादी तो हो गयी है लेकिन क्या वो खुश है? क्या वो अभी भी प्रिया को याद करता है?… काश फ़ेसबुक ये भी बता सकता!

और अक्सर ही ये सब सोंचते हुये प्रिया अपने मेलबाक्स में ’गणेश’ नाम से सर्च मारती रहती है और एक लम्बी साँस लेते हुये यही सोचती है कि उस आखिरी ईमेल का जवाब आजतक नहीं  आया………

 

और वो अधूरा मंजर इतने सालों बाद भी उसी जगह अधूरा ही पड़ा है।

Friday, May 28, 2010

हे आधुनिक कवि!!

हे आधुनिक कवि!  confusion
जिस पल तुम परेशान होकर
’क्या कविता लिखूँ’ कि उधेड़बुन में
अपनी शर्ट की सिवन के साथ खेलते रहते हो…
उस एक पल ही, न जाने कितनी कविताओं
के पोशाकों की सिवन उधेड़ी जा रही होती है…
उस एक पल ही, किसी दुनिया में कविताओं
पर थोपी जा रही होती है वस्त्रहरण की परम्परायें
और कहीं बिना परम्पराओं के ही
किये जा रहे होते हैं वस्त्रहरण…

 

हे आधुनिक कवि!
जिस पल अपने लैपटाप पर कविता को टाईप करना
शुरु कर चुके होते हो तुम,
उसी पल न जाने कितनी कवितायेँ शोषित हो रही होती हैं,
उनके ही घर में… उनके ही लैपटाप पर शायद…
उनके निर्माण से ही शुरु हो जाता है उनका धीरे धीरे जलना,
फ़िर जैसे एक तीली से पूरी माचिस ही जला दी जाती है
अरे नहीं!! जलाना आधुनिक कहाँ रहा…
कवितायेँ तो आज मार दी जाती हैं खुलेआम
तुम्हारे समाज की हथेलियों में फंसाकर…
और मच्छ्ररों के लिये बाजार से स्प्रे ले आते हैं…

 

हे आधुनिक कवि!
जैसे ही तुम्हें लगता है कि तुमने
एक नयी कविता का सृजन कर डाला है,
कई नयी कवितायेँ भ्रूण में ही मार दी जाती हैं।
और जब तुम अपने नग्न विचारो में तलाशते हो
अपनी कविता के आधुनिक नाम…
नग्न नामों से बुलाया जा रहा होता है उन्हे
तुम्हारे कमरे की खिड़की से दिखते हुये ’किसी भी घर’ में…

 

हे आधुनिक कवि!
तुम जैसे ही अपनी कविता को पोस्ट करके
छटपटाते हो चन्द टिप्पणियो के लिये,
न जाने कितनी कविताओं का
झूठा पोस्टमार्टम हो रहा होता है,
… और उन्हे छटपटाने भी नहीं देता तुम्हारा ये समाज॥

 

हे आधुनिक कवि!
तुम कविता लिखना बंद क्यूँ नहीं कर देते??

 


    *अंजलि  और कई ऐसी बेनामियों को समर्पित…