Sunday, November 14, 2010

कॉफ़ी हाउस की घडी…

वो हर रोज की तरह एक उदास दोपहर थी… सडकों पर इक्के दुक्के लोग चलते दिख जाते थे तो जैसे लगता था कि सब कुछ जीवित है नहीं तो सभी कुछ बडी उदासियत के साथ खामोश था जैसे कोई गमी थी… जैसे कोई उनका बहुत करीबी गुजर गया था और वे उसका गम मना रहे थे।

उस सडक से लगी कुछ दुकानें थी जो शाम को स्कूल, कॉलेज के जोडों के साथ हंसती, खिलखिलातीं थीं। लेकिन उस दोपहर वो सब भी उदास थीं। रेस्तरां शांत थे… आईसक्रीम पार्लर सुस्ता रहा था… कॉफी हाउस खामोश था… कभी कभी कोई धडधडाता हुआ ऑटो उस सडक से निकल जाता तो जैसे एक पल के लिये ये सब उठकर बैठ जाते… उस ऑटो को दूरतलक जाते देखते…। धीरे-धीरे वो आँखों से ओझल हो जाता और दूर कहीं से उसकी आवाज ’और दूर’ जाती हुयी प्रतीत होती… वो आवाज फिर कहीं चली जाती… खो जाती… कहीं दूर अंतरिक्ष में जाकर मिल जाती।

वो सडक फिर सूनी हो जाती… और दुकानें फ़िर उदास।

 

उसी उदास दोपहर में उस उदास कॉफी हाउस में अविनाश रोज की तरह उसके आने का इंतजार कर रहा था… । उसकी उम्र तकरीबन २५ से ३० के बीच थी, रंग गेहुँआ था और बाल इतने छोटे कि उन्हें संवारने की भी जरूरत नहीं थी। वो बार बार अपने मोबाईल को लॉक – अनलॉक करने में व्यस्त था… जैसे ऎसा करने से वो समय को आगे बढा सकता था और समय कम्बख्त जैसे उसके इस खेल में खुद ही उलझा हुआ था… एक पशोपेश में कि कितना आगे बढे और कितना पीछे…

 

उन दोनो की उम्र में तकरीबन १०-१५ साल का अंतर था। लेकिन वो उसे उसका हमउम्र ही लगता था। वो उससे हर वो बात नि:संकोच कह जाती थी जो उसी की उम्र के कई लडकों को ’तुम नहीं समझोगे’ कहकर टाल देती। दिया को ये बात बडी अजीब लगती कि अविनाश उम्र में उससे छोटा होकर भी उससे बडा क्यूं लगता था। वो बहुत कम बोलता था पर उन कम शब्दों को कहने के लिये भी जब वो अपने होठों को गोल करता तो वो अपने आप को ढेर सारे गोल गोल छ्ल्लों के मध्य पाती जो उसके चारों ओर इस तरीके से घूमते रहते जैसे वो कोई जिमनास्ट हो और इन छल्लों के साथ कोई करतब दिखा रही हो…। धीरे धीरे वो उसके कहे शब्दों से मिलने जुलने लगती… बात करने लगती… उन्हें सहलाने लगती…। धीरे धीरे वो छल्ले उसमें समाते जाते। … और फिर वो एकदम से चुप हो जाता, सोचने लगता। उसके चुप होने से जैसे वो फिर छोटा दिखने लगता और वो उससे बडी। वो फिर देरतक उससे बोलती रहती… बातों को किसी गहरी खान से खोदकर निकाल लाती और उसपर उडेलती रहती। तबतक जबतक उसके होंठ फिर से गोल नहीं हो जाते… और ये सिलसिला चलता रहता।

 

अविनाश को हमेशा आश्चर्य होता कि दिया उसे एक बच्ची जैसी क्यूं लगती है। उसकी वो ढेर सारी बिन सिर पैर की बातें जिनमें कभी कोई तत्व नहीं होता, किस खदान से आती हैं? वो इतनी बातें लाती कहाँ से है? और ये सोंचते हुये कब उसके  होंठ गोल हो जाते वो जान नहीं पाता… वो एकदम से उससे बडा हो जाता और तबतक बडा रहता जबतक उसे इस बात का अहसास नहीं होता कि वो उससे बडी है …और तब वो झेंपकर चुप हो जाता…

उम्र के इस खेल को खेलते खेलते, एक-दूसरे से छोटे और बडे होते हुये कब वो सच में हमउम्र हो जाते, उन्हें भी पता नहीं चलता…

 

उस कॉफ़ी हाऊस की घडी अभी आगे चल रही थी… उसके आने का समय पीछे चलता हुआ नजदीक आ रहा था और थोडी देर में दोनो समय उसी जगह मिलने वाले थे। मोबाइल के लॉक से खेलते हुये उसके जेहन में कुछ रैंडम तस्वीरें बन रहीं थीं:-  दिया के बच्चे कॉलेज जा चुके थे… वो घर की सफ़ाई करवा रही थी… खाना–पीना हो चुका था… वो उस कॉफी हाउस के लिये निकलने की तैयारी कर रही थी…

 

हर दोपहर अविनाश के साथ साथ वो उदास कॉफी हाउस, वो सडक, वो सन्नाटे, वो उदासियत; सब उसका इंतजार करते। सबकी नज़र सिर्फ़ कॉफी हाउस की उस घडी की तरफ़ होती जिसकी हर एक टिक-टिक के साथ उसके ऑटो के आने की आवाज आ रही होती।

टिक-टिक  टिक-टिक  टिक-टिक  टिक-टिक …………………

21 comments:

Majaal said...

आप तो साहब हकीकत को भी खयाली अंदाज़ में बयां करतें है.. ये भी खूब है...

लिखते रहिये ....

anjule shyam said...

पता नहीं कितने लोग हैं जो उम्र के फसलों को झुठला देते हैं.........

डिम्पल मल्होत्रा said...

उदासी और ख़ामोशी से लिखा वक़्त का ये टुकड़ा देर तक ज़हन में रुका रहेगा.

वो बार बार अपने मोबाईल को लॉक – अनलॉक करने में व्यस्त था…
व्यस्त था तो ऐसे लिखा जैसे किसी देश का प्रधान मंत्री किसी दूसरे देश से समझोते में व्यस्त हो :-)

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

आपस की सहजता उम्र के फासले को खत्म कर देती है ...अच्छी पोस्ट

rashmi ravija said...

किसी उदास दोपहर से उपजा हुआ लगता है, यह 'आत्मालाप' I mean ...कहानी :)

बड़े, छोटे होने का खेल तो चलता ही रहता है....बस मात्राएँ कम- ज्यादा होती रहती हैं...
बढ़िया लिखा है

स्वप्निल कुमार 'आतिश' said...

:) tumhe jab bhi padhna shuru karta hun..blank hota jata hun...aur ant aksar kuch nahi hota kahne ko ....

dopahren aise theen ...bina mohron ke khali khaane rakhe ho ....


aur han gulzar chacha ki wo nazm..jisme "hothon ka challa gol ho kar ghum jata tha" bhi yad aaye

प्रवीण पाण्डेय said...

यह है हकीकत का पोस्टिया स्वरूप। किसी वैवाहिक उद्घोषणा के लिये प्रस्तावना तो नहीं लिख रहे हैं।

मुदिता said...

pankaj ji

"उम्र के इस खेल को खेलते खेलते, एक-दूसरे से छोटे और बडे होते हुये कब वो सच में हमउम्र हो जाते, उन्हें भी पता नहीं चलता"

bahut bhavpoorn prastuti......sahaj sambandh har sema se pare hote hain....…

डॉ॰ मोनिका शर्मा said...

बहुत प्रवाहमयी लिखा है .... Kai jagah kahani hakikat si lagati hai.... prabhavi shabd chayan...

shikha varshney said...

क्या बात है ..ये उदास दोपहर तो बहुत इंट्रेस्टिंग निकली.

richa said...

कल भी ये पोस्ट पढ़ी थी पर क्या कहूँ समझ नहीं आया था... आज फिर से पढ़ी और फिर समझ नहीं आ रहा की क्या कहूँ...
बड़े सारे रैंडम थॉट्स आ रहे हैं ज़हन में... इंतज़ार इतना उदास क्यूँ था ? उसे तो ख़ुश होना चाहिये था... किसी के जाने के बाद की उदासी तो समझ आती है पर किसी के इंतज़ार में उदासी... मोबाईल को लॉक – अनलॉक करके वक़्त को आगे क्यूँ नहीं बढ़ाया जा सकता... कोई ऐसी टेक्नीक ज़रूर होनी चाहिये... या फिर वक़्त पे एक रिवाइंड / फास्ट फॉरवर्ड का बटन... और ये घड़ी हमेशा टिक टिक टिक टिक करके ही क्यूँ चलती है... ज़ूम से क्यूँ नहीं चल सकती :)
जोक्स अपार्ट... अलग से मूड की एक अच्छी पोस्ट !!!!

abhi said...

क्या बात है जी "स्टार ब्लॉगर" ... :)

डॉ .अनुराग said...

ऐसा लगा जैसे फर्स्ट पार्ट है ....शायद सबके वास्ते नहीं है ....किसी एक पाठक के लिए है ....शायद मेरा भरम हो.....शायद....

Sonal Rastogi said...

is rachnaa mein uljhe hue to ham bhi hai...

monali said...

Wo song yaad aa gaya..na umra ki seema ho na janm ka ho bandhan:)
Lovely post

वाणी गीत said...

एक उदास -सी दुपहर साकार हो गयी !

दीपक डुडेजा DEEPAK DUDEJA said...

वक्त का इक कतरा गिरा कहीं....
वहाँ दास्ताँ थी . कतरा कहीं नहीं......

वो दास्ता आपने शब्दों में पिरो दी.

ज्ञानदत्त पाण्डेय Gyandutt Pandey said...

टिक-टिक टिक-टिक टिक-टिक टिक-टिक …………………

हमारे लिये तो निकल चुका वक्त। कॉफी हाउस में बेयरा कॉफी रख कर चला जाता है यन्त्रवत!
कोई दिया नहीं, कोई चिराग नहीं। शाम को पूछा जाता है - सभी दवाइयां खा ली न?

डॉ. नूतन - नीति said...

आपकी रचना बहुत अच्छी लगी .. आपकी रचना आज दिनाक ३ दिसंबर को चर्चामंच पर रखी गयी है ... http://charchamanch.blogspot.com

डॉ. नूतन - नीति said...

आप चर्चामंच पर भी अपने विचार रखियेगा |

अपूर्व said...

काफ़ी हाउस की घड़ी भी खरामा-खरामा हाथ मे बेंत साधे चलती दिखती है..किसी रिटायर्ड बूढ़े की पेंशन लेने बैंक तक की वाक जैसी..चलते चलते सुस्ताती..ठहर-ठहर के फिर चलती सी..पूरा दृश्य इंतजार के इन क्षणों मे जैसे स्टिल-लाइफ़ सा हो गया है..पॉज किये किसी मूवी-फ्रेम जैसा..बस मोबाइल के लॉक-अनलॉक करने की आवाज भर आती है छन कर बाहर...
पढ़ने से लगता है..कि निर्मल वर्मा साब का हैंगओवर खासा चल रहा है अभी...