Tuesday, May 25, 2010

मेरी नज़र से एक शख्सियत - संकल्प शर्मा

IMG_0024 गुलज़ार  को  चाहने  वाले  कहते  हैं  कि  गुलज़ारियत  एक  धर्म  है। गुलज़ारियत को फ़ालो करने वाले  बडी आसानी से एक दूसरे को समझ लेते है जैसे दोनो ने ही आईने पहन रखे हो। गुलज़ारियन्स के  पास  बातों  की  कमी  नहीं  होती। बातों  में  गुलज़ार  होते  हैं  और  गुलज़ार  का  सिर्फ  होना  ही न  जाने  कितनी  बातें  और  पैदा कर देता  है।


कुछ  दिन  पहले  GulzarFans क्लब  में  मेरी  मुलाक़ात  एक  और  गुलज़ारियन से  हुई| किसी  टॉपिक पर  अपनी  चंद  बातों  के  साथ  मैंने  अपनी  एक  कविता  का  लिंक  भी  दिया। उसके बाद  मुझे  संकल्प  का  ईमेल  आया  और  उसने  अपना  कुछ  लिखा  भी  शेयर  किया। जबरदस्त  लेखन,  एकदम  गुलज़ारिश  टच लिये  हुए| बस  मैंने  उनसे  कहा  कि  दोस्त  ब्लॉगिंग  की  दुनिया  में  उतरो, हमे भी रेगुलर किक्स मिलती रहेगी।

अच्छा लेखन कन्टेजियस होता है और उसके इन्फ़ेक्शन से बचना नामुमकिन… लेकिन ये इन्फ़ेक्शन एक कैटेलिस्ट के जैसे आपको अच्छा लिखने को प्रेरित करता है… मेरे जैसे लोगो के लिये ऎसी डोज़ेज़  बहुत जरूरी है।

संकल्प  शर्मा, जो  कि जयपुर  के  मूल  निवासी  हैं  और  पेशे  से  PricewaterhouseCoopers, गुडगाँव  में  CA , अपनी  एक  त्रिवेणी  में  कहते  हैं…

जयपुर

कितना फैला हुआ लगता है ‘पहाड़ी’ से शहर ,
कहीं कहीं रस्सियों सी गहरी काली सड़कें|


एक सिरा पकड़ो तो ज़रा ! ‘‘इसकी गिरहें कस दें ’’

 

संकल्प  से मेरी बात गुलज़ार से शुरु हुई और निदा फ़ाज़ली, बशीर बद्र से होते हुये अहमद फ़राज़ तक पहुँच गयी। मैंने जब इस  त्रिवेणी  के  बारे  में उनसे पुछा तो संकल्प  ने  कहा  कि  "जब  जयपुर  में  बम  ब्लास्ट  हुए  थे, ये  उस  वक़्त  लिखी  थी| उस  वक़्त  अजाओं  में  एक  डर  सा  फैला  हुआ  था  बस  मन किया  कि  काश  इनकी  गिरहें  कस  सकता…


उनकी  ये  त्रिवेणी  भी  मुझे  बेहद  पसंद  आयी, गौर फ़रमाये :-

अश्क़

यूँ हरारत से बर्फ की तरह पिघली है तेरी याद ,
बूँद बूँद आँखों से टपकी है रात भर ,


दफ्तर से आज फिरसे शायद छुट्टी लेनी पड़े|

मैंने  संकल्प  से  एक  फोटो  भी  मांगी  कि  मैं  उसे  यहाँ  आप  लोगों  के  साथ  शेयर  कर  सकूँ  तो  बड़ी  ही  मोडेस्टी के  साथ  इन्होने अपनी एक  चकमक  फोटो  भी  भेज  दी और साथ मे ये नज़्म:-


'आभा'


ज़िन्दगी , 
इस कदर उलझी हुयी शय है , 
के जितना चाहता हूँ , 
समझ लूँ इसको , 
उतने ही उलझ जाते हैं , 
मानी इसके . 
ज़िन्दगी , 
इस कदर उलझी हुयी शय है . 
मगर तुम बात करती हो , 
तो लफ्ज़न*, 
इसके मानी खुलने लगते हैं . 
कभी यूँ लगता है जैसे , 
तुम कोई , 
उधेडी हुयी ऊन के गोले को लेकर , 
एक नया स्वेटर बनाती हो . 
सुनो ..!!! 
कुछ कहना है मुझको ! 
मुझे भी , 
ज़िन्दगी के कुछ नए पहलू पढ़ा दो ना , 
पढ़ाती हो जैसे , 
रोज़ अपनी क्लास के बच्चों को, 
शेक्सपीयर या साइकोलोजी ....


(*शब्दों के द्वारा)

 

ये नज़्म इन्होने  अपने  किसी  ख़ास  मेंटर  को  डेडीकेट की  है,  जिसने  ज़िन्दगी  की  बारीकियों  को समझने  में  इनकी  बड़ी  मदद  की  है। इस  नज़्म  के  अलावा  मुझे  इनकी  ये  कविता  भी  बहुत  खूबसूरत  लगी…

 

 एक  उदास  गुलमोहर 

कल  शाम  हम  मिले  थे  जहां ,
गुलमोहर  के  पास .
वही  गुलमोहर  जिसके  तले ,
अक्सर  मिला  करते  थे  हम .
मैं  अब  फिर  से  खड़ा  हूँ ,
उसी  दरख़्त  के  करीब  ही ,
जहाँ  तुने  उठा  के
अपनी  पलकें ,
इस  तरह  छुड़ाया
कल  हाथ  अपना ,
जैसे  ‘पेन ’ झटक  देते  हैं
चलते  चलते  रुक  जाए  अगर
ना  जाने  क्यूँ
मुझे  उस  पल  लगा
के  वो  गुलमोहर
उदास  है  शायद ….
और  अब  देखता  हूँ  तो
वोही  गुलमोहर …
एक  ही  रात  में
कितना  सुर्ख  हो  गया  है …
लगता  है  सारी  रात
सुलगता  ही  रहा  है
तेरे  ख्यालों  की  बरसात  में
जलता  ही  रहा  है ..
मुझे  डर  है  ये  कहीं
ख़ुदकुशी  ना  कर  डाले …..

 

कहिये,  है  न  सारी  की सारी   जबरदस्त??? :)

मेरा  कहना  मानते  हुए  इन्होने  अपनी  एक  साईट  भी  बना  ली  है… मैं  इनकी  सारी  नज़्म  तो  यहाँ  शेयर  नहीं  कर  सकता  पर आप  इन्हें  इनकी  साईट  पर  पढ़  सकते  हैं  नहीं  तो  कविता  कोश  से… मुझे  उम्मीद  है  कि  आपको  इनके  ये  बेशकीमती  मोती  पसंद  आयेंगे  और  पसंद  आयें  तो  उन्हें  बताना  न  भूलें… मेरे  साथ  साथ  संकल्प  को भी बेहद ख़ुशी  होगी|

 


पूजा के एक ब्लॉग से मैंने इस हिंदी ब्लॉगजगत को जाना था और इसके लिये मैं हमेशा उसका आभारी रहूँगा| 'मेरी नज़र से एक शख्सियत' के जरिये मैं किसी परिचित या अपरिचित शख्सियत को आपसे मिलवाता रहूँगा| ये मेरी तरफ से मेरे पसन्दीदा लोगो को आपसे जोड़ने की एक कोशिश होगी|

जाते  जाते -

"कौन  कहता  है  कि  हिंदी  ब्लॉगिंग  में  कचरा  भरा  है,
बस  एक  दो  'संकल्प' ढूंढ निकालो  यारों…
"


31 comments:

Priya said...

Sadke jawan ji ....Hamko laga Gulzeria ke shikaar khali ham hi hain .....Gulzerians ki to baadh aayi hain.....Triveni damdaar hai aur kavita bhi umda!

राम त्यागी said...

nice to meet both of you :)

दीपक 'मशाल' said...

बहुत बढ़िया जी.. लाइए जल्दी से इन्हें भी ब्लॉग पर लाइयेगा पंकज भाई.. खूब जमेगा रंग, जब मिल बैठेंगे.. गुलज़ार दीवाने..
apna no. dena to zara.. mashal.com@gmail.com par jaroori baat karnee hai.

PD said...

अब यहाँ कहाँ कुछ है.. हम तो वहाँ चले जहाँ सारा माल पड़ा हुआ है.. :)

pankaj mishra said...

जंगल जंगल बात चली है पता चला है, चड्डी पहन के फूल खिला है, उन्हीं ने लिखा है। मेरे मोबाइल की रिंगटोन यही है और में क्या बताऊं।
http://udbhavna.blogspot.com/

Pankaj Upadhyay (पंकज उपाध्याय) said...

@Priya:
तुम्हारी ’गूगल’ वाली नज़्म पढकर लग गया था कि तुम भी उसी बीमारी की शिकार हो :)

@राम त्यागी
same here :)

@दीपक:
बुलाया तो है, देखो सरकार कब चमकते है :).. I have mailed you my number..

@PD:
तुम ही असली पारखी हो :)

@Pankaj Mishra:
साहेब, वो गुलज़ार ने लिखा है.. संकल्प शर्मा ने नही.. :)

richa said...

"गुलज़ारियत" सच में officially एक धर्म होना चाहिये... गुलज़ार को पढ़ने और पसंद करने वाले वाकई एक दूसरे को अच्छे से समझ लेते हैं और वो गुल्ज़ारिश टच आ ही जाता है उनकी राइटिंग में भी...
अच्छा लेखन कन्टेजियस होता है - संकल्प जी को सही सलाह दी आपने और उन्होंने मान कर और भी अच्छा काम किया :)
बहुत उम्दा लेखन खासकर "एक उदास गुलमोहर"
सच में "कौन कहता है कि हिंदी ब्लॉगिंग में कचरा भरा है,
बस एक दो 'संकल्प' ढूंढ निकालो यारों…"
nice initiative pankaj... शुरुआत ही कचरे में से हीरा ढूंढ़ के करी... :)
keep up the gud work !!!

Udan Tashtari said...

अच्छा लगा संकल्प को जानना और पढ़ना.

प्रवीण त्रिवेदी ╬ PRAVEEN TRIVEDI said...

दम है दम !
ऐसे ही संकल्प से मोती ढूंढते रहिये !

abhi said...

मस्त :) वो वेबसाइट पे अभी जा रहे हैं :)

संजय भास्कर said...

बहुत सुंदर और उत्तम भाव लिए हुए.... खूबसूरत रचना......

Dimps said...

Hello :)

Oh my god!! what a concept!!
Maine abhi thoda sa padaa and socha pehle itne ka comment de du... wonderful yaar...

गुलज़ार को चाहने वाले कहते हैं कि गुलज़ारियत एक धर्म है।

U r really talented! Harr baar ek nayaa concept and so much different!!

I will leave my final comment once I will read it all :)

Tcare..
Regards,
Dimple

हिमान्शु मोहन said...

बहुत अच्छी पहल है पंकज। लगे रहो!

आजकल कुछ व्यस्तताओं के कारण नेट और ब्लॉग से दूर हूँ, बज़ से भी, मगर ये बज़ पर पढ़ कर रुक नहीं पाया।

'गुलज़ार'पने से जिस-जिस को लगाव है, मुझे उस-उस से लगाव है।

Manoj K said...

badhiya... lagta hai Pankaj jaipur walon se kuch jyada lagav hai, achha hai..

sankalp ka mail id dena.. jaipur ka banda hai.. milna padega

best
manojk

sangeeta swarup said...

संकल्प जी से मिलना और उनकी रचनाएँ पढ़ना अच्छा लगा

rashmi ravija said...

वाह वाह...ये पोस्ट, टिप्पणियों के साथ तो गुलज़ार दीवानों से गुलज़ार हो गयी है....इस गुलज़ार धर्म को फौलो किए बिना भी समझा जा सकता है??...शायद नहीं...एक से आईने नहीं पहने होंगे ,ना...jokes apart...बहुत ही सुन्दर नज्में और त्रिवेणी तो कमाल की है...संकल्प शर्मा की रचनाओं से मिलाने का शुक्रिया....उन्हें ब्लॉग बनाने को प्रेरित करें या फिर आप ही पढवाते रहें उनकी नज्में...

Sanjeet Tripathi said...

wah! shukriya je haqdar to bante hain aap is bat ke liye ki ek gulzariyans se milwaya aur unka likha padhwaya.. tiveniyan to apne aap me hi bahut kuchh kah rahi hai unki. jate hain unki site par

abha said...

I am glad that you are my friend....!!!

god bless!

Sankalp... said...

आभा जी,
नज़्म का एक एक लफ्ज़ आपको समर्पित है. खुश और खुशकिस्मत तो मैं हूँ कि अपनी तमाम उधेड़बुन, सारी उलझनों और हर एक अंतर्द्वंद के सामने सीना सिर्फ इसलिए तान देता हूँ के आप हैं!. धन्यवाद.....

पंकज,
तुम्हारे लिए तो क्या कहूँ यार.... इस से बेहतर तोहफा शायद ही मुझे कभी मिला हो... और वो भी उस से जिसे जाने हुए मुझे अभी सौ घंटे भी नहीं हुए...
कोशिश जरुर करूँगा के अपनी ये 'कोशिशें' जारी रखूं.... और आप सभी को कुछ ऐसा दूँ जिसे पढ़ा और पढाया जका सके.... आमीन. एक त्रिवेणी फिलहाल के लिए.....

मेरी कॉलर पे कुछ रेशे लगे थे उसके स्वेटर से,
वो जिसके नर्म काँधे पर रखा सर रात भर मैंने.

सफर अच्छे हैं इनमें जात और मज़हब नहीं चलते.

------------------------------------

आपका...
संकल्प...
sahil.myselfazm@gmail.com

प्रवीण पाण्डेय said...

अब छोडियेगा नहीं ।

Pankaj Upadhyay (पंकज उपाध्याय) said...

आप सबका बहुत बहुत धन्यवाद जो आपने हमारे इस नये प्रयास को सराहा और ’संकल्प’ को इतना स्नेह दिया...

राम त्यागी जी, संगीता जी और आभा जी को थोडा सा ए़क्स्ट्रा शुक्रिया.. इनके कदम पहली बार मेरे ब्लाग पर पडे है..

डा० अमर कुमार said...


हम थोड़ा सा थोडा सा ए़क्स्ट्रा शुक्रिया.. नहीं लेंगे जी !
आपको पढ़ना ऊढ़ना तो लगा रहा है, बकिया हम भी पहली बार ब्लॉग पर टिप्पणी ठोंकि रहे हैं !
हम्मैं बहुत सा बोनस शुक्रिया मिलना चाहिये !

Pankaj Upadhyay (पंकज उपाध्याय) said...

@डा० अमर कुमार:
अक्सर ही आपको पढना होता रहा है और आपकी टिप्पणियो मे एक तरीके से आपका सिग्नेचर होता है.. एकदम बेबाक.. न इधर की, न उधर की..

शुक्रिया का सारा बोनस माल आपका :) :)

अमरेन्द्र नाथ त्रिपाठी said...

सब बोनस - फोनस तौ लुटा चुके अमर जी पर ! अब अमर-इन्द्र के लिए का बचा !/?
आज भी पढ़कर बढ़िया लगा ! आभार !

Bhawna 'SATHI' said...

sukriya dost,ek or khubsurat insan se milvane ke liye.

Razi Shahab said...

nice yar

अनूप शुक्ल said...

संकल्पजी को देखकर और पढ़कर अच्छा लगा। बधाई और शुक्रिया इस परिचय के लिये।

anjule shyam said...

"कौन कहता है कि हिंदी ब्लॉगिंग में कचरा भरा है,
बस एक दो 'संकल्प' ढूंढ निकालो यारों…"

anjule shyam said...

गुलज़ार की गुलाज्रियत में बह कर एक बात मेरी भी...
गुलज़ार की ये गुलाज्रियत एक ऐसा धर्म है ...
मान लो अब तुम ये हकीकत//
पैदा हउवे इससे कई गुलज़ार हैं...

अमरीश रांगा said...

बहुत अच्छा लगा,

wow gold said...

Keep this going please, great job!