Sunday, December 21, 2008

दूर क्षितिज में

उनको याद करता हूँ
तो मन कहता है,
की जाकर मिल उनसे
कह दे, कि जो किया तुने
वो भावावेश में किया,
जो कहा तुने
वो भावावेश में कहा,

मान ले की हर गलती तेरी थी,
क्यूंकि...

अगर वो धरती बनी रही,
और तू अपने आप को
आसमा समझता रहा,
तो मिलोगे तो तुम दोनों
अवश्य ही,
पर कहीं....
दूर क्षितिज में........ ।

5 comments:

varun jaiswal said...

लगता है कि क्षितिज के पार ही तलाश पूरी होगी |
उत्तम |

Pankaj Upadhyay said...

हा हा, सही कहा आपने....
पढने के लिए धन्यवाद :)

poemsnpuja said...

लेकिन क्षितिज तो मात्र एक छलावा है...मिलना तो कुछ ऐसे होगा की या तो तुम बादल बन उठ जाओ...या आसमान से बारिश हो...और बूँदें धरती के अंतर्मन को भिगो दें. शब्द खूबसूरत हैं, भाव मोहक. ब्लॉग की तो कायापलट हो गई. बधाई हो.

Apanatva said...

Pankaj akada hua insaan jab jhukta hai to fir tootta hai dambh vyktitv me akdahat ke siva koi yogdan nahee karata . paristhitiyo ke sath adjust karna aur apane siddhant par atal rahnasath sath chalna chahiye .

अनूप शुक्ल said...

सुन्दर! डा.पूजा की सलाह काबिले गौर है भाई!