Sunday, December 21, 2008

मेरे ख़त

आज जब मैंने उठाये अपने सारे ख़त
जलाने के लिए
तो वे बोले मुझसे
मत जलाओ हमें, मत सताओ हमें


सताओ उस बेवफा को जाकर
क्या मिलेगा तुम्हे हमको जलाकर।
मैंने कहा देखता हूँ तुम्हे
तो याद आती है वो जुदाई 
जब होगे ही नहीं तुम तो
कैसे याद आएगी उसकी बेवफाई

 

अचानक चिल्लाया उसका पहला ख़त
"गर जलाकर हमें तुम भूल जाओगे उसे तो
तो बेशक जला दो हमें
मगर एक वादा करो ,
हमें जलाने के बाद
हमारी राख में
तुम ढूंढोगे नहीं
उसके हाथों से लिखा वो
तुम्हारा नाम,
या उसका बेवफाई भरा वो
आखिरी पैगाम........" ।

2 comments:

रंजना [रंजू भाटिया] said...

ख़त की तासीर ही ऐसी होती है कि याद रहती है..अच्छा लिखा है आपने

अनूप शुक्ल said...

वाह खत की बात सु्नी गयी!