Tuesday, December 23, 2008

क्या है जिंदगी?

एक शराबी की, मदिरा है जिंदगी,
एक तबायफ की, मुन्जरा है जिंदगी,

एक दीवाना बोला, दिलरुबा है जिंदगी
एक बूढा बोला, इन्तहा है जिंदगी,

किसान बोला, खेतों में जिंदगी,
एक जवान बोला, हाथों पे जिंदगी,

एक लेखक बोला, साहिल है जिंदगी,
एक होनहार बोला, जाहिल है जिंदगी,

मैं इसे अब तक समझ न पाया,
तो क्या विचार दूँ?
अपनी जिंदगी क्या 'जिंदगी' के पीछे
गुजार दूँ!!

छोटी सी कमलिनी के लिए
सविता है जिंदगी,
मैं तो कवि हूँ,
मेरे लिए कविता है जिंदगी।।

4 comments:

ज्योत्स्ना पाण्डेय said...

pankaj!!!!!
zindagi k sabke apne maayne hain
tumhari kavita ye sach bakhoobi bayan karti hai
bahut achchhe , meri shubh kamnayein tumhare saath hain
keep it up !

vijay kumar sappatti said...

bahut hi acchi kavita .

मैं तो कवि हूँ,
मेरे लिए कविता है जिंदगी।।

mujhe ye pankhtiyan bahut pasand aayi hai ..

aur hum sab kaviyon ke liye ye sach bhi hai .

bahut badhai

kabhi mere blog par aayiyenga pls

vijay
poemsofvijay.blogspot.com

Anuj said...

मैं इसे अब तक समझ न पाया,
तो क्या विचार दूँ?
अपनी जिंदगी क्या 'जिंदगी' के पीछे
गुजार दूँ!!

छोटी सी कमलिनी के लिए
सविता है जिंदगी,
मैं तो कवि हूँ,
मेरे लिए कविता है जिंदगी।।


ek baar fir se zabardast endling....good work

अनूप शुक्ल said...

अहा जिंदगी! वाह जिन्दगी!

गजनट!