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Saturday, August 14, 2010

तुम अकेले ही नहीं, हे कवि!

रोज़ ऑफिस जायें, आयें
खाना पकायें, सो जायें
अगली सुबह फिर ऑफिस जायें..


लिखें प्रेम कवितायें,
और ऑफिस की सारी प्रेम गॉसिपों
में प्रेम का मखौल बनायें


जियें ज़िन्दगी, ये न जानते हुये
कि जीते क्यूँ हैं..
और मर जायें एक दिन
कई सारे सवाल लिये...

 

वीकेंड में पीयें दारू
धोयें कपडे,
देखें ’पीपली लाईव’
ठहाकें लगायें किसानों की मौतों पर
बाहर आयें और मालों से खरीदें महँगे कपडे
...और सब एक साथ रोयें बढने वाली महँगाई पर

 


साल में एक दिन झंडे खरीदें
एफ़-एम पर फ़रमाइश रखें देशभक्ति की..
फेसबुक पर बाँटे गाने
बाकी दिनों, लगाते रहें चूना
बोतें रहें बारूद..
मचायें शोर
फ़ैलायें अफवाहें
प्रजातंत्र के सारे पलीतों
में एक एक सिरे से लगायें आग
…और इन्तजार करें किसी फ़ायर-ब्रिगेड के आने का..

 

हम सबका विनाश हो... (तुम अकेले ही नहीं हे कवि)

 


*कई दिनों से एक अलग सा मूड है, कुछ नयी ही किस्म का…। आज सागर की झकझोर देने वाली कविता पढते हुये अपने आस-पास के समाज में झांकते हुये ये ’कविता सी’ बन गयी। इसका पूरा क्रेडिट सागर को…