Showing posts with label कहानी सा. Show all posts
Showing posts with label कहानी सा. Show all posts

Monday, September 5, 2011

रिसेशन– नॉट अ मनोहर कहानी

2681452360

 

कई दिनो से वह बहुत खुश थी। आँखो की चमक काफ़ी बढ गयी थी, मुस्कराहटें मीलों जितनी चौडी हो गयीं थीं। एक हफ़्ते बाद उसके बच्चे इंडिया से उससे मिलने आ रहे थे। ऎसा उसने ही मुझे बताया था। वो अमेरिका में उनकी छुट्टियों भरे दिनों को प्लान कर रही थी। डिज़्नी लैंड के टिकेट्स भी ले डाले थे। मुझसे ये सब बताते हुये वो खो जाती थी शायद वहाँ चली जाती थी जहाँ अभी उसके बच्चे थे और उनके भी बच्चे, जो कहीं जाकर वहीं रह गये थे और वो यहीं रह गयी थी। वो मुझे अपने कंप्यूटर पर उनकी तस्वीरें दिखाती और कहती कि जब वो आयेंगे तो मुझे उनसे मिलवायेगी। मैं कहता कि मुझे अच्छा लगेगा जैसा मुझे उसके साथ अच्छा लगता है।

 

वो मीरा की पहली इंटरनेशनल फ़्लाईट थी। नये देश जाने का भी एक एक्साइटमेंट था और ऊपर से अमेरिका। लेकिन वो अमेरिका गये लोगों की तस्वीरें फ़ेसबुक पर देख देखकर ऊब गयी थी। उसने सोच लिया था कि वो स्टेचु ऑफ़ लिबर्टी के पास वाली फ़ोटो चाहे फ़ेसबुक पर डाल दे लेकिन हॉलीवुड वाले पहाड के सामने तो फ़ोटो बिल्कुल भी नहीं खिंचवायेगी। जिसे देखो वही तो वहाँ की फ़ोटो डाले हुए है। नहीं… फ़ोटो ले तो लेगी ही बस उसे फ़ेसबुक पर नहीं डालेगी ये सब सोचते हुये उसने समीर की तरफ़ देखा। वो उसकी बगल की सीट पर बैठा हुआ मैगजीन पढने में लगा हुआ था। पेरिल्स ऑफ़ ऎन अरैंज्ड मैरिज  – वो फ़िर सोच में डूब जाती है और खिडकी से बाहर बादलों को देखने लगती है।

 

वो सोमवार का दिन था। उस दिन मैं थोडा लेट था। वीकेंड की फ़्रेश डार्क बीयर और आईरिश कॉफ़ी का कांबिनेशन अभी तक दिलोदिमाग पर छाया हुआ था। अपना कार्ड स्वाईप करके मैंने अपने फ़्लोर पर एंट्री मारी। कहीं एक बे(Bay) में काफ़ी सारे लोग जमा थे, शायद किसी का जन्मदिन था। मैंने दूर से ही उन्हे हाथ हिलाया और सोचा चलो कुछेक घंटे बिना काम के कटेंगे। दो कदम बढा ही था कि देखा सामने से वो चली आ रही थी। उससे थोडी दूरी बनाकर एक सिक्योरिटी वाला भी चल रहा था जिसे देखकर कोई भी यही समझता कि वो उस की हरकतों पर निगाह रख रहा था। मैंने हाथ के इशारे से उसे हेलो कहा। उसका चेहरा बाढ आने के ठीक पहले वाली अवस्था में था जब आँखों से बहने वाली नदी खतरे के निशान को बस पार करने ही वाली होती है।  वो मेरे पास आयी और मुझे अपने गले से लगा लिया। सिक्योरिटी गार्ड अभी भी उसे देख रहा था।

 

दोनों को फ़्लाईट से बाहर आये हुये तो आधे घंटे हो गये थे लेकिन उनका सामान अभी तक नहीं आया था। अपने सामान का इंतजार करते हुये समीर सोच रहा था - पेरिल्स ऑफ़ अ मैरिज। मीरा जे एफ़ कैनेडी एयरपोर्ट पर दौडते भागते विदेशियों को वैसे ही देख रही थी जैसे हम किसी नये शहर की एक एक चीज़ को देखते हैं… समझते हैं। विदेशी भी उसे वैसे ही देख रहे थे या शायद नहीं देख रहे थे, उसे सिर्फ़ लग रहा था कि वे उसे देख रहे हैं। समीर ने सामान उतारा, गिना और फ़िर उन्हे कायदे से मीरा के पास रखकर वो उसे ’दो मिनट’ कहकर वाशरूम की तरफ़ गया। जाते हुये उसने मोबाईल निकाला और वो मैसेज फ़िर से पढा जो अभी अभी आया था और जिसे पढकर उसने सबसे पहले मीरा को देखा था। और तब मीरा एयरपोर्ट की चकाचौंध में खोयी हुयी थी…

वो सिर्फ़ इतना बोल पायी कि दे हैव फ़ायर्ड मी। उसके बाद के उसके शब्द हैप्पी बर्थडे की तालियों और उस खुशी भरे गाने के बोझ तले रह गये जैसे किसी कहानी के दर्दनाक मोड पर गलती से खुशियों भरा बैकग्राउंड संगीत बज उठे।  बे से तालियां बजाते कुछेक लोग मुझे चिल्लाकर बुला रहे थे। मैं उनकी तरफ़ से नज़रें हटाकर उसकी तरफ़ देखता रहा। कितना अज़ीब होता है न कभी कभी एक ही कदम के फ़ासले पर सुख और दु:ख दोनो का होना? एक कदम आगे बढ जाओ तो सुख के साथ थोडा हंस बोल लो, एक कदम पीछे आओ तो दु:ख से गले मिल लो। मुझे पीछे आने की भी जरूरत नहीं थी। वो मेरे सामने थी और सिक्योरिटी वाला उसके क्यूबिकल से उसका सामान निकालकर पैक कर रहा था। मैंने उसके सर पर हाथ रखा। वो बोली कि सब खत्म हो गया। बच्चे आ रहे हैं आज। खुशी मनाऊं की दुख, मुझे समझ नहीं आ रहा? मैं उसके साथ साथ बाहर आ गया। उसे हिदायत दी गयी थी कि किसी को पता न चले वरना एक डर फ़ैल जायेगा और वो चाहते थे कि सारे प्रोग्राम्ड लोग अपनी प्रोग्राम्ड ज़िंदगियों को वैसे ही जीते रहें बिना इस डर का आभास किये हुये।

लेकिन उसकी ईमेल आईडी जब कल से काम नहीं करेगी, तो डर नहीं होगा? कल से जब वो अपने क्यूबिकल, अपने बे में नहीं दिखेगी तो डर नहीं होगा? डर को हम कैसे बाँध सकते हैं? रोक सकते हैं?

हम दोनो गेट पर खडे थे। सिक्योरिटी वाला उसका सामान पैक करके ला चुका था। मैंने उससे सामान लिया और उसकी कार तक आया। उसने मुझे फ़िर गले से लगाया और इस बार फ़फ़क फ़फ़ककर रो पडी। मेरे मुँह से बस एक लाईन बार बार निकल रही थी – आई विल मिस यू मिसेज खान।……

 

वाशरूम में समीर ने पानी का टैप खोला, मुँह पर थोडा पानी डाला, थोडे से बाल गीले किये और फ़िर वो अपने आप को शीशे में देखने लगा, सोचने लगा…

बास्टर्ड्स, हाउ कैन दे फ़ायर मी विदआउट एनी नोटिस! अब मैं क्या करूं? मीरा से क्या कहूँ? उफ़्फ़!!

क्या करूं मैं? ऑफ़िस वालों ने जो घर दिया था वो भी अब मेरा नहीं रहा। अपनी बीवी को जिसको मैं इंडिया से ब्याहकर लाया है, उसे अमेरिका में कहाँ ले जाऊं? मैंने अभी शादी ही क्यों की? उस बेचारी का इसमें क्या दोष है? क्या क्या तो सपने सजाये होंगे उसने? आई एम अ मोरान।

मीरा सामान के पास खडी सोच रही थी कि इस घर में क्या क्या करेगी जिससे इंडिया वाली फ़ीलिंग रहे। पता नहीं यहाँ कोई हिंदी न्यूजपेपर आता भी होगा या नहीं वरना वही लगवा देती। सुबह सुबह चाय के साथ हिंदी अखबार हो तो लगता है जैसे घर में ही हैं। तुलसी का एक पौधा मिल जाय तो उसे भी एक गमले में लगा देगी। थोडी केयर करनी पडेगी लेकिन देखेगी, समीर से पूछेगी। एक तो ये बोलते भी कम हैं।

मैं मिसेज खान को विदा करके वापस ऑफ़िस में एंट्री कर ही रहा था कि देखा समीर का फ़ोन है। मैं उसकी शादी में भी जा नहीं पाया था, लगा कि गालियां देगा और फ़िर मिसेज खान के साथ जो कुछ भी हुआ मैं खास किसी से बात करने के मूड में नहीं था। पर जाने कैसे मोबाईल पर उंगलियां दबीं और फ़िर दूसरी तरफ़ उसकी कांपती आवाज़ थी और फ़िर आँखो के सामने एक के बाद एक बनते सीन। मेरा फ़्लोरिडा वाला घर अभी खाली पडा हुआ था। कुछेक महीने मुझे यहीं न्यूयार्क में क्लाईंट लोकेशन पर ही रहना था। मैंने उससे कहा कि रुक मैं एयरपोर्ट आ रहा हूं फ़िर तुम लोग फ़्लोरिडा चले जाना और वहीं मेरे घर पर ही रह लेना। मीरा को मत बताना कि वो घर तुम्हारा नहीं है और फ़िर अगले १-२ महीने में दूसरी नौकरी ढूंढते हैं।

 

समीर वाशरूम से आया। मीरा ने पूछा कि बडी देर हो गयी तो उसने मीरा को गले लगा लिया। मीरा कुछ भी नहीं समझ पायी और इससे पहले वो कुछ पूछ पाती, समीर ने कहा कि हमें फ़्लोरिडा जाना होगा। लेकिन आप तो एनवाईसी में रहते थे न? समीर मुस्कराया और उसे फ़िर गले से लगा लिया। मीरा का मुँह खुला लेकिन वो शब्द बाहर नहीं आये – पेरिल्स ऑफ़ एन अरैंज्ड मैरिज

______________________________________________________

ब्लॉगर की कलम से: समीर से मिलने जब मेरा कॉलीग (जिसने जाने किस मूड में आकर मुझे ये रिसेशन कहानियां सुनायीं थीं और जो मैंने बिना उसे रॉयेलिटी दिये यहाँ छाप डालीं), एयरपोर्ट पहुँचा तो समीर ने उसे भी कुछ मीरा की तरह ही गले लगाया था। ना जी ना आप तो काफ़ी डीप जाने लगे।

मिसेज खान को ऑफ़िस से छुट्टी मिल गयी थी इसलिये उन्होने अपने बच्चों और उनके भी बच्चों के साथ फ़ुलटू मस्ती काटी और ढेर सारी तस्वीरें भी फ़ेसबुक पर डालीं। फ़ोटो एल्बम का शीर्षक था – आई एम फ़्री। बच्चों के जाने के बाद उन्होने फ़िर कुछेक कंपनीज में कोशिश की और कोशिश करने वाले की हार नहीं होती है कि तर्ज़ पर वो एक कंपनी से जुड गयीं, थोडे और ज्यादा वेतन पर।

सुनने में आया कि बाद में किसी बेनामी(हाँ यहाँ भी बेनामी)  ने शिकायत कर दी कि बर्थडे सेलीब्रेशन से उसे और बाकी लोगों को काम करने में दिक्कत होती है (पक्का उसे केक नहीं मिला होगा) और उसके बाद से सारे सेलीब्रेशन कैंटीन/कफ़ेटेरिया में होने लगे और लोगों की आध्यात्मिक शांति के लिये बे को किसी भी प्रकार के सेलीब्रेशन से मुक्त कर दिया गया। काश ये थोडा पहले हो जाता।

समीर की जब नौकरी लगी और उसने जब मीरा से वापस न्यूयॉर्क चलने के लिये कहा तो मीरा ने वापस वही सोचा जो आपको तो पता ही है। लेकिन जब समीर ने उसे सारी कहानी सुनायी तो इस बार उसने उसे गले से लगा लिया। (फ़िर आप गलत दिशा में जाने लगे।) मीरा अभी समीर से पूछना चाह रही है कि तुलसी के पौधे को फ़्लाईट से ले जा सकते हैं क्या? लेखक (हाँ हाँ टेंशन क्यों ले रहे हैं? मुझे क्या पता था कि आप इतनी कायदे से पढेंगे। चलिये लेखक नहीं ब्लॉगर, खुश? हुँह!) ब्लॉगर को ,जो खुद कभी अमेरिका नहीं गया है, ये अभी तक पता नहीं है कि हिंदी अखबार अमरीका में आते हैं कि नहीं और जब मुझे ही नहीं पता है तो मीरा को कैसे पता होगा। आपको पता हो तो जरूर बतायें। हिंदी के प्रचार-प्रसार में आपका योगदान सराहनीय रहेगा।

जाते जाते: रिसेशन के नाम पर नौकरी से निकाले गये सारे लोगों की कहानी ऎसी हैप्पी इंडिग वाली नहीं होतीं। बैठे बिठाये जाने क्या क्या छिन जाता है- नाम, रुतबा, सपने, ज़िंदगी। कुछ चीजें नहीं छिनती और वो शाश्वत रहती हैं जैसे लिये गये लोन्स, क्रेडिट कार्ड की ई.एम.आई. और विदेश जाने और वहाँ बसे रहने की चाहत। कहानियों में भले कोई बौराया, बोर टाईप का ब्लॉगर (अपनी ही बात कर रहा हूँ साहेब, आप फ़िर दिल से ले बैठे) उन्हे किसी सरफ़िरे हंसीन मोड पर छोड आये लेकिन असलियत में ये कहानियां दु:खों, तकलीफ़ों की ऎसी ऎसी अँधेरी गुफ़ाओं से गुज़रती हैं  जहाँ रोशनी तो दूर, साँस लेने के लिये ऑक्सीजन भी नहीं मिलती।

Saturday, April 16, 2011

वे दिन

फ़ोन पर एक लंबे सन्नाटे के बाद मैंने कहा, रिजर्वेशन करवा देता हूँ। ’रहने दो, इंटरसिटी से ही आ जाऊंगा।’ मैंने कहा ’दिक्कत होगी।’ ’नहीं होगी! रहने दो।’

दो दिन के बाद वो यहाँ थे। वे इंटरसिटी से भी नहीं आये थे बल्कि किसी ट्रेन में रिजर्वेशन करवाकर ही आये थे। माँ के जाने के बाद हम अक्सर ऎसा करते थे। बिना एक दूसरे को बताये एक दूसरे की बात मान लेते थे। नयी दिल्ली रेलवे स्टेशन के बाहर वो खड़े थे। हाथ में एक बैग था जिसमें मेरी मंगवाई हुयी एक किताब थी और उसके अलावा मेरे और उनके कुछ कपड़े। कुछ समय पहले भी मुझे लखनऊ की एक बस में बिठाते वक्त वो ऎसे ही खड़े थे। उस समय हम दोनों को डर था कि हम दोनो कहीं टूट ना जायें। उनका डर मेरा वहम भी हो सकता है लेकिन मैं सच में नहीं जानता हूँ कि अगर वो मुझे विदा करते हुये टूट गये होते, तो मैं क्या करता? उस वक्त आखिरी क्षण तक मैं यही सोचता रहा कि इस बार उनके गले लगूंगा और डरता रहा कि अगर वो टूटे तो क्या मैं उन्हें संभाल पाऊँगा? इसी उधेड़बुन में बस ड्राईवर ने चलने का संकेत दिया और मैं उनके पैर छूकर बस में बैठ गया। बस चली और उसके साथ साथ वो भी चल दिये। मैं देर तक देखता रहा कि वो शायद मुड़ें और मुड़कर मुझे देखें। वो नहीं मुड़ें बल्कि आगे वाले मोड़ से बस मुड़ गयी। और पूरी यात्रा में मैं यही सोचता रहा कि अगर वो पलटकर पीछे देख लेते तो मैं क्या करता?

वे सामने ही खडे थे। वे मुस्करा रहे थे। मैंने उनके पैर छुये, उनके गले लगा और दोस्तों के जैसे उनके गले में हाथ डाल दिया। न जाने मुझे क्यों लग रहा था कि ये दुनिया इनके लिये एकदम नयी है और इस वक्त मैं इनका दोस्त, बडा भाई या पिता हूँ जिसने ये दुनिया ज्यादा देखी है। उनका कहना था कि ये दुनिया तो नहीं लेकिन इस दुनिया के कुछ तत्व उनके लिये तो अवश्य ही नये हैं। जैसे एस्केलेटर्स पर चलते हुये जब उनसे आँखे मिलती हैं, बडी मासूमियत से खुद ही कहते हैं - लिफ़्ट में पहले भी चढ चुका हूँ, एस्केलेटर्स पर पहली बार है और उसके बाद वो व्यस्त हो जाते हैं सीढियों को ऊपर जाते देखते हुये जिससे सही समय पर चलती हुयी सीढी से पैर बाहर रख सकें। बरिस्ता में कोल्ड कॉफ़ी पीते हुये कॉफ़ी की चॉकलेट और आईसक्रीम से बनी आकर्षक काया की जगह मेनू पर लिखे टेढ़े-मेढ़े रेट्स को निहारते रहते हैं।

उन दिनों हम एक शहर के बाद दूसरा शहर घूमते हैं। मेट्रो में साथ साथ अगले स्टेशन का इंतजार करते रहते हैं। मेट्रो के रूट के नक्शे को समझते रहते हैं। मेट्रो से कुतुबमीनार और छतरपुर के मंदिर देखते रहते हैं। इंडिया गेट के पास बैठकर लावे खाते हैं। जब तक थक न जायें, सीपी के चक्कर लगाते हैं। अक्षरधाम में कैन वाली कोक पीते हैं। गुडगाँव की व्यस्त सड़कों को एक दूसरे का हाथ पकड़कर पार करते हैं। सदर घूमते हैं और गुडगाँव के एक दो मॉल भी। घर में साथ बैठकर आईपीएल देखते हैं, रामनवमी को साथ व्रत रखते हैं और पास में बने एक मंदिर में भी जाते हैं।

फ़िर एक दिन शाम को उन्हें जाना है। वो सुबह जल्दी ही उठ जाते हैं। गैस की कुछ दिक्कत भी है। एक दो घंटे बाद मेरी भी आँख खुलती है। देखता हूँ कि वो मुझे सोते हुये देख रहे हैं। मैं अपने बिस्तर से सरकते हुये उनके पास पहुँच जाता हूँ और उनकी गोद में सर रख देता हूँ। वो मेरे सर पर हाथ फ़ेरते हैं, मैं फ़िर से सो जाता हूँ।

उस शाम वो वापस घर चले जाते हैं। उनके पीछे छूट जाते हैं तो ये कुछ दिन,  जिन्हें मैं किसी फ़्रिज में हमेशा के लिये नहीं रख सकता इसलिये सहेजकर कभी किसी कहानी में रखना चाहता हूँ। शायद इसी कहानी में…

Friday, December 24, 2010

देजा वू

“जिया! मुझे लगता है पहले भी मेरे साथ ये सब घट चुका है। ये सब कुछ… मेरा इस वक्त जागना… बेमौसम नवंबर में बारिश होना… ”

“देजा वू?”

“शायद!… कितना खूबसूरत शब्द है न? देजा वू… कितनी ही भावनाओं को कितनी आसानी से कह देता है। कुछ और जोडना-घटाना ही नहीं पडता। बस सिर्फ़ एक शब्द। काश मैं भी कभी ऎसा कुछ लिख पाता!”

जिया उसकी किताबों वाली अलमारी से हटकर अब खिडकी पर आ गयी थी। खिडकी के काँच के उस पार नवंबर की बेमौसम बारिश थी और इस पार मनु।

“मनु! बेमौसम बारिश अक्सर उदास क्यों कर जाती है?”

“बेमौसम बारिश की बूंदों की बेचैनी और छटपटाहट उदास कर जाती है… जैसे अपनी ही आवाज की प्रतिध्वनि उदास कर जाती है। ऎसा लगता है कि उन्हें जिनतक पहुँचना था उन्होने अपने कान बंद किये हुये थे। जैसे वो उदास बैरंग चिट्ठियाँ थीं…”

“…जिन्हें उनके पते नहीं मिले?”

“और उन्हें वापस हमारे पास ही आना पडा। पता है, ये बडा भयानक है कि आप जिन्हें कुछ कहना चाहें, वो उसे ना सुन सकें। मैं अभी भी किसी फ़िल्म के ऎसे दृश्य को सोचते हुये भी डर जाता हूँ जहाँ कोई व्यक्ति कुछ कहना चाहता है और बगल से कोई ट्रेन तेजी से निकल जाती है। कहने वाला कह देता है और जिसे सुनना चाहिये, वो उन्हें सुन नहीं पाता। उन बच्चों के जैसे जो इस संसार में आ तो जाते हैं, लेकिन उन्हें कोई नहीं अपनाता…। उन कहानियों के जैसे जिन्हें कोई नहीं पढता।”

मनु अक्सर ऎसी बातें करते हुये अपनी कुर्सी से खडा हो जाता और कमरे में टहलने लगता। उसकी आवाज अब हर एक कोने से आती हुयी लगती। जिया की एक निगाह बाहर छिलती, रिसती बूंदो पर थी और एक निगाह मनु के चारों तरफ़ से छीलने को आते हुये शब्दों पर।

“लिखकर मैं कभी कभी अपने आप को पा लेता हूँ। लेकिन न जाने कितनी ही बार अपने आप को कहीं खो भी देता हूँ।”

“ये डरावना है!”

“और वो देखना, जो आपके साथ कभी हुआ ही न हो? कहीं से भी किसी भी व्यक्ति के भीतर चले जाना। उसके भीतर उसके जैसे ही होकर रहना और उसकी ही ज़िंदगी जीना जैसे वो जीता है। वैसे ही आसपास को स्पर्श करना, महसूस करना जैसे वो करता है। उसके ही जैसे सोचने को अपनी सोच से अलग रखते हुये सोचना।”…… “यूं ही कभी कभी उन घटनाओं का हिस्सा बन जाना जो आपकी अपनी कभी थीं ही नहीं इन फ़ैक्ट अपने जीते जी आप ने ऎसी किसी भी घटना के घटने के बारे में भी नहीं सुना… “

“बेहद अजीब है…”

“लिखना कुछ वैसा ही है। बेहद अजीब।”

मनु अपनी एक किताब उठाकर उसे सहलाने लगा। उसे सहलाते हुये वो घर की दीवारों के पार किसी दुनिया में चला गया।

“लिखना किसी खाली पडे घर में घुस जाने जैसा है जहाँ रहने वाले लोग अब वहाँ नहीं रहते। लिखना उन घरों में रहने जैसा है।”

उस कमरे में जैसे सब कुछ चुप हो गया। कई शब्द चुपचाप उसकी किताब से निकलकर उस कमरे में चारों तरफ़ फ़ैल गये। बस धीरे धीरे हल्की होती हुयी एक ध्वनि रही जिससे ये आभास होता रहा कि अभी अभी यहाँ देर तक रहने वाला कुछ कहा गया है।

“उन घरों में रहने जैसा जहाँ आपकी कही हुयी बातें दीवारों से टकराती हैं और फ़िर वापस आपके ही पास आ जाती हैं। हमें एक क्षण को लगता है कि ये तो वहाँ के रहने वालों की आवाज है लेकिन असलियत में वहाँ कोई नहीं होता।”

“तो लिखना अपनी ही आवाज को किरदारों की आवाज में सुनना है?”

मनु ने खिडकी खोल दी। जिया अभी भी खिडकी की एक तरफ खडी थी। खिडकी खुलने से बारिश थोडी तेज सी लगने लगी।

“लिखना अपनी आवाज को खो देना है…” मनु धीरे से बुदबुदाया।

उसका बुदबुदाना वैसे ही रह गया। खिडकी के पल्लों की चरमराहट और बारिश की तेज आवाज किसी ट्रेन के जैसे उसके कहे के ऊपर धडधडाती गुज़र गयीं।

जिया कभी कभार उस कमरे में अभी भी चली जाती है। उसे अब देजा वु शब्द मनु जितना ही खूबसूरत लगता है। उस कुर्सी पर अब कोई नहीं बैठता लेकिन मनु की वो बातें जैसे हमेशा से वहीं हैं। वहीं कहीं कूडे के डिब्बे में मुडे तुडे आधे अधूरे कागजों के संग या उसकी किताबों वाली अलमारी में रखी किसी किताब में छुपी हुयी या उसकी मेज पर फ़ैली मैगजीनों में दबी हुयी……।

वो घर अभी खाली है। जुलाई की धूप में भी कभी कभी उसे उसी खिडकी के बाहर नवंबर की बारिश सा आभास होता है। वो एक पल तो उसमें डूब जाती है फ़िर अगले ही पल मुस्कराते हुये सोचती है… देजा वु।

Sunday, November 14, 2010

कॉफ़ी हाउस की घडी…

वो हर रोज की तरह एक उदास दोपहर थी… सडकों पर इक्के दुक्के लोग चलते दिख जाते थे तो जैसे लगता था कि सब कुछ जीवित है नहीं तो सभी कुछ बडी उदासियत के साथ खामोश था जैसे कोई गमी थी… जैसे कोई उनका बहुत करीबी गुजर गया था और वे उसका गम मना रहे थे।

उस सडक से लगी कुछ दुकानें थी जो शाम को स्कूल, कॉलेज के जोडों के साथ हंसती, खिलखिलातीं थीं। लेकिन उस दोपहर वो सब भी उदास थीं। रेस्तरां शांत थे… आईसक्रीम पार्लर सुस्ता रहा था… कॉफी हाउस खामोश था… कभी कभी कोई धडधडाता हुआ ऑटो उस सडक से निकल जाता तो जैसे एक पल के लिये ये सब उठकर बैठ जाते… उस ऑटो को दूरतलक जाते देखते…। धीरे-धीरे वो आँखों से ओझल हो जाता और दूर कहीं से उसकी आवाज ’और दूर’ जाती हुयी प्रतीत होती… वो आवाज फिर कहीं चली जाती… खो जाती… कहीं दूर अंतरिक्ष में जाकर मिल जाती।

वो सडक फिर सूनी हो जाती… और दुकानें फ़िर उदास।

 

उसी उदास दोपहर में उस उदास कॉफी हाउस में अविनाश रोज की तरह उसके आने का इंतजार कर रहा था… । उसकी उम्र तकरीबन २५ से ३० के बीच थी, रंग गेहुँआ था और बाल इतने छोटे कि उन्हें संवारने की भी जरूरत नहीं थी। वो बार बार अपने मोबाईल को लॉक – अनलॉक करने में व्यस्त था… जैसे ऎसा करने से वो समय को आगे बढा सकता था और समय कम्बख्त जैसे उसके इस खेल में खुद ही उलझा हुआ था… एक पशोपेश में कि कितना आगे बढे और कितना पीछे…

 

उन दोनो की उम्र में तकरीबन १०-१५ साल का अंतर था। लेकिन वो उसे उसका हमउम्र ही लगता था। वो उससे हर वो बात नि:संकोच कह जाती थी जो उसी की उम्र के कई लडकों को ’तुम नहीं समझोगे’ कहकर टाल देती। दिया को ये बात बडी अजीब लगती कि अविनाश उम्र में उससे छोटा होकर भी उससे बडा क्यूं लगता था। वो बहुत कम बोलता था पर उन कम शब्दों को कहने के लिये भी जब वो अपने होठों को गोल करता तो वो अपने आप को ढेर सारे गोल गोल छ्ल्लों के मध्य पाती जो उसके चारों ओर इस तरीके से घूमते रहते जैसे वो कोई जिमनास्ट हो और इन छल्लों के साथ कोई करतब दिखा रही हो…। धीरे धीरे वो उसके कहे शब्दों से मिलने जुलने लगती… बात करने लगती… उन्हें सहलाने लगती…। धीरे धीरे वो छल्ले उसमें समाते जाते। … और फिर वो एकदम से चुप हो जाता, सोचने लगता। उसके चुप होने से जैसे वो फिर छोटा दिखने लगता और वो उससे बडी। वो फिर देरतक उससे बोलती रहती… बातों को किसी गहरी खान से खोदकर निकाल लाती और उसपर उडेलती रहती। तबतक जबतक उसके होंठ फिर से गोल नहीं हो जाते… और ये सिलसिला चलता रहता।

 

अविनाश को हमेशा आश्चर्य होता कि दिया उसे एक बच्ची जैसी क्यूं लगती है। उसकी वो ढेर सारी बिन सिर पैर की बातें जिनमें कभी कोई तत्व नहीं होता, किस खदान से आती हैं? वो इतनी बातें लाती कहाँ से है? और ये सोंचते हुये कब उसके  होंठ गोल हो जाते वो जान नहीं पाता… वो एकदम से उससे बडा हो जाता और तबतक बडा रहता जबतक उसे इस बात का अहसास नहीं होता कि वो उससे बडी है …और तब वो झेंपकर चुप हो जाता…

उम्र के इस खेल को खेलते खेलते, एक-दूसरे से छोटे और बडे होते हुये कब वो सच में हमउम्र हो जाते, उन्हें भी पता नहीं चलता…

 

उस कॉफ़ी हाऊस की घडी अभी आगे चल रही थी… उसके आने का समय पीछे चलता हुआ नजदीक आ रहा था और थोडी देर में दोनो समय उसी जगह मिलने वाले थे। मोबाइल के लॉक से खेलते हुये उसके जेहन में कुछ रैंडम तस्वीरें बन रहीं थीं:-  दिया के बच्चे कॉलेज जा चुके थे… वो घर की सफ़ाई करवा रही थी… खाना–पीना हो चुका था… वो उस कॉफी हाउस के लिये निकलने की तैयारी कर रही थी…

 

हर दोपहर अविनाश के साथ साथ वो उदास कॉफी हाउस, वो सडक, वो सन्नाटे, वो उदासियत; सब उसका इंतजार करते। सबकी नज़र सिर्फ़ कॉफी हाउस की उस घडी की तरफ़ होती जिसकी हर एक टिक-टिक के साथ उसके ऑटो के आने की आवाज आ रही होती।

टिक-टिक  टिक-टिक  टिक-टिक  टिक-टिक …………………

Saturday, July 17, 2010

मुम्बई की एक रात…

बगल में रखा मोबाईल वाईब्रेट कर रहा है…… ATT00006

स्क्रीन पर आदित्य का नाम फ़्लैश कर रहा है और कमरे के उस घुप्प अँधेरे में मोबाईल के स्क्रीन की बार बार जलती-बुझती उस रोशनी से रिया की आँखें चुभ रही हैं । पिछले एक हफ़्ते से यह सिलसिला बदस्तूर जारी है। हर रात रिया घंटों उस नम्बर को फ़्लैश होते देखती रहती है और आदित्य उन कॉल्स को तड़प तड़पकर मरते…

 

उस दिन आदि की आवाज़ में कितनी बैचेनी थी… एक हताशा थी… एक हार थी। मुम्बई की रोज की दौड़ में उस दिन वो शायद पिछड़ गया था… या शायद दौड़ा ही नहीं था। दौड़ा नहीं तो थका भी नहीं … इसलिये उसे नींद नहीं आयी होगी। सोने की भरपूर कोशिश करने के बाद भी जब बिस्तर की सिलवटों को किसी और की कमी खली होगी, तब उसने मुझे रात के उस तीसरे पहर कॉल  किया होगा…। ह्म्म… अपने खालीपन को पूरा करने के लिये… उसी के लिये ही…

ये सब सोचते हुये रिया अपने अँधेरे कमरे की खिड़की खोल देती है और उस खिड़की से दूर दिखती लैम्पपोस्ट को एकटक देखती रहती है।

’अँधेरे को उजाला आसानी से चीरता है या उजाले को अँधेरा” ये सोचते सोचते, वो भी कहीं बहुत भीतर से, उसी लैम्पपोस्ट की रोशनी से,  धीरे धीरे चिरती जाती है। धीरे धीरे, लैम्पपोस्ट की वो रोशनी  भी जलने-बुझने लगती है। आदित्य का नाम वहाँ भी फ़्लैश होने लगता है।

……आदित्य कॉलिंग

दीवाल घड़ी रात के दो बजा रही है। मुम्बई की जादुई बारिश भी शुरु हो गयी है…

उस रात भी तो बारिश ही थी न जब आदि मुझे भिगोता चला गया था। आदि की कल्पनाओं में कितनी वास्तविकता थी, कितनी विविधता थी और उसका कहने का अंदाज़… उस रात वो जो भी आब्जेक्ट्स दिखा रहा था, वो मुझे दिखते थे। मै उसकी कल्पनाओं में बहती जाती थी… मैं उसका सुनाया अपनी बंद आँखों के आसमान में  देख रही थी… उसकी बातों से ज़ेहन में  नये नये स्केचेज़ बनते जाते थे। ज़ेहन के किसी एक कोने मे ’सही/गलत’ की बातें भी सर उठाती दिखती थीं… उसे भी दिखती होगीं लेकिन जिसे दिखती थीं वो दूसरे को उसका दिखना कहाँ बताता था… वो बस बातें  करता जाता था… कुछ कुछ छिपाता… कुछ कुछ बताता। ’सही/गलत’ मुझे सिर्फ़ ताकते रह जाते थे… मैंने  भी उनसे आँखें न मिलाकर नीची ही कर रखी थीं…

…और,

और, अगली सुबह ज़िंदगी उस कमरे में बिखरी पड़ी थी। रात की खरोचें दर्द तो दे रही थीं लेकिन दिखती नहीं थीं। उनींदे ही, सबसे पहले उसने खुद को एक आईने मे देखा था। आँखें, चिटके हुये कई ख्वाबों से भरी हुयी थीं और चेहरा रात हुये किसी कत्ल का गवाह सा दिखता था। उस कमरे मे कोई लाश नहीं थी… खून के निशान भी नहीं थे… उसके शरीर पर खरोचें भी नहीं थीं… बस मन में  ’सही/गलत’ को सोचता हुआ एक गिल्ट था। एक बोझ था जिसकी वजह से वो अपने आप से दबी जा रही थी… उसे एक एकांत चाहिये था… मौत सरीखा काफ़्का का एकांत…

 

बाहर बारिश अभी भी जारी है। रिया और लैम्पपोस्ट की रोशनी के बीच बारिश की कुछ बूँदें  आ जाती हैं। रिया उन्हे पकड़ने के लिये हथेली खोलती है… हथेली पर रोशनी की एक चादर सी है और उस चादर में बारिश की बूँदें इकट्ठी होने लगती हैं… वो धीरे धीरे मुट्ठी बंद कर लेती है…

वो उस बारिश मे जमकर भीगना चाहती है… वो कमरे से बाहर आकर आसमान की तरफ़ देखते हुये अपने हाथों को पंख जैसे फ़ैला लेती है… सारी बारिश को खुद में समा लेना चाहती है… वो खुद एक ’मुट्ठी’ बन जाना चाहती है…  

उस बारिश में  रिया, ’मुट्ठी’ के जैसे खुलती, बंद होती है… उस बारिश मे रिया उड़ती है… भीगती है… बहती है… रोती है… खूब रोती है…

…और उस रात मुम्बई पानी से डूब जाती है॥

इधर अँधेरे कमरे में अभी भी मोबाईल की रोशनी जल-बुझ रही होती है

……आदित्य कॉलिंग

 

Tuesday, July 6, 2010

दो मिनट…

clockट्रेन के आने में अभी भी समय है…

आज ’नेह’ को २ बजे वाली ट्रेन से वापस जाना है। बान्द्रा से दिल्ली जाने वाली वो ट्रेन, सिर्फ़ दो मिनट के लिये बोरीवली रुकती है। संडे होने के कारण आज प्लेटफ़ार्म पर रोज़ के मुकाबले भीड़ कुछ कम है। यहाँ छोटे शहरो की तरह लोग कभी कभार ट्रेन्स पर नहीं चढ़ते। बॉम्बे में ज़िंदगी हर पांच  मिनट पर उन पटरियों पर दौड़ती है। हर पांच मिनट मे न जाने कितने ही लोग उन ट्रेन्स से उतर जाते है और कितने ही नये लोग उसमे चढ़ जाते है। न तो रुका हुआ प्लेटफ़ार्म इसकी परवाह करता है और न ही भागती हुयी लोकल्स। दौड़ती हुयी ज़िंदगी भी कहाँ किसकी परवाह करती है…

बोरीवली के प्लेटफ़ार्म नम्बर चार की भागती दौड़ती उस भीड़ में वही एक रुका हुआ सा लगता है। कुछ सोंचते हुये इधर उधर किसी भी रैंडम डायरेक्शन में टहलता हुआ दिखता है… कभी कभार मोबाईल पर समय भी देख लेता है। उस दो मिनट की मुलाकात के लिये वो आधे घंटे पहले ही प्लेटफ़ार्म पर पहुँच गया है। कुछ महीने पहले आये एक कॉल से ही तो  ज़िंदगी कुछ थमी थी  और दो लोगों  ने इन दो मिनटो को सहेजने की रूपरेखा तैयार कर ली थी…

 

- पहचाना?

- ह्म्म… हाँ, शायद।

- नहीं पहचाना, आई नो…

- नेह?

- तुम्हारी ज़िंदगी मे ऎसी रांग टाईम एन्ट्री और कौन मार सकता है?

- तुम बिल्कुल नही बदली हो।

- लेकिन ज़िंदगी काफ़ी बदल गयी है… बॉम्बे आ रही हूँ लेकिन शायद मिल न पाऊ…

- ह्म्म…

- वो तुम्हारी क्रश कैसी हैं? सॉरी, मैं उनका नाम भूल गयी वो राईटर जिनके बारे में तुम बताया करते थे?

- ’एहसास’… उम्र बढ़ने के साथ साथ उनकी खूबसूरती भी बढती जा रही है…। अच्छी हैं… सुन्दर हैं…

- मुझे मेरे सामने तुम्हारे मुंह से किसी और लड़की की तारीफ़ अच्छी नहीं लगती… तुम भूल गये शायद? ऎनीवेज़… जोकिंग बाई द वे…

- ह्म्म… कोई बात नहीं…

- मुझसे मिलने का मन नहीं है न? ऎनीवेज़… जाते वक्त ट्रेन से जा रही हूँ… ट्रेन बोरीवली रुकती है… तुम आ जाओगे तो बाद का सफ़र आसान हो जायेगा…

- मै जरूर कोशिश करूँगा…

- पहले कोशिश करते तो शायद ये सफ़र भी आसान हो जाता… ऎनीवेज़… और सुनाओ?

- बस… सब बढ़िया है… तुम कैसी हो? बॉम्बे कैसे आना हुआ?

- अच्छी हूँ… खुश हूँ… अभी कुछ महीने पहले ही इंडिया आना हुआ… इन्होने दिल्ली में अपनी एक कम्पनी स्टार्ट की है। कुछ समय से उसी सिलसिले मे ये बॉम्बे में ही हैं। तुम्हें तो याद नहीं होगा? २ जुलाई को मेरा जन्मदिन है… इन्होने कहा कि बॉम्बे ही आ जाओ… फ़िर से हनीमून मनाते है। समटाईम्स ही इज़ रोमान्टिक, यू नो।

- तुम्हारा जन्मदिन मुझे याद है…

- अच्छा!! इन पांच सालों में कभी विश तो नहीं किया? ऎनीवेज़… इन्होने तो कहा कि ट्रेन से क्यूं जा रही हो पर मैंने सोंचा कि बोरीवली स्टेशन को भी देख लूंगी… शायद तुम्हारे साथ… जैसे तुम सब कुछ अपनी आँखों से दिखाते थे… वो बोरीवली से दिल्ली तक की जर्नी याद है? पूरे सफ़र तुम मुझे कुछ न कुछ दिखाते रहे थे…

- अब मुझे कुछ नही दिखता…

-  क्यूं? चश्मे का नम्बर बढ़ गया है क्या? वैसे चश्मे में तुम एकदम राईटर लगते थे… लेकिन तुम न कभी भी एक्स्प्रेसिव नहीं थे… न जाने कैसे इतना कुछ लिख लेते थे… कुछ कहते हुये तो मैंने कभी नहीं  सुना… वो तो मैं थी जिसने तुम्हें इतना झेल लिया… और कोई होती तब पता चलता तुम्हें…

 

अनाउन्समेंट:  बान्द्रा स्टेशन से दिल्ली जाने वाली एक्सप्रेस ट्रेन ५ मिनट की देरी से…………

वो मोबाईल में  समय देखता है। अभी १० मिनट और हैं…

 

- ह्म्म… कबकी ट्रेन है?

- ५ जुलाई को २ बजे  बोरीवली मे ऎराईवल टाईम है… कितने अच्छे दिन थे न? तुम्हारी हर कहानी में कहीं न कहीं मैं होती थी… नहीं तो मुझसे की गयी वो ढ़ेर सारी बातें जो तुमने कभी मुझसे सामने से नहीं कही… तुम्हारी कहानियों में मैं जीती थी… याद है एक बार जब तुमने मेरे कैरेक्टर को एक कोई भद्दा सा नाम दिया था

- ह्म्म… और तुमने कहा था कि अबसे कैरेकटर्स के नाम तुम डिसाईड किया करोगी… खासकर जो तुमसे इन्सपायर्ड हो…

- हाँ और तुम्हें लगा था कि एक्नोलेजमेंट में इसका नाम भी लिखना पड़ेगा (खिलखिलाते हुये)

- ट्रेन बस दो मिनट रुकेगी?

- हाँ!! चाहो तो साथ चल सकते हो दिल्ली तक… यादों की पुरानी पेंटिंग्स पर साथ साथ नये ब्रश मारेंगे… ऎनीवेज मैं तो अभी पुरानी नहीं हुयी हूँ, यू नो…

- मैं तो नया नहीं रहा… ऎनीवेज तुम्हारे ’ऎनीवेज’ अभी भी उतने ही मीनिंगफुल हैं… ऎसे एकदम से दिल्ली तो नहीं जा पाऊंगा… प्लेटफ़ार्म पर आने की कोशिश करता हूँ…

- ओह ’एकदम से’? याद है जब तुम्हारे कहने पर ’एकदम से’ मैंने अपनी ट्रेन छोड़ दी थी… अगले एक हफ़्ते तक मुझे फ़िर कोई रिजर्वेशन नहीं मिला था। वापस घूमकर हॉस्टल भी नहीं जा सकती थी… लेकिन कितनी अच्छी शाम थी न? हम तुम हाथों में हाथ डाले जे जे फ़्लाईओवर पर घूम रहे थे… घनघोर ट्रेफ़िक में… जहाँ फ़ोर व्हीलर रेंग रहे थे… हम भाग रहे थे… बॉम्बे के सबसे बडे फ़्लाईओवर पर… पैदल… और उसके बाद ऎशियाटिक लाईब्रेरी की सीढ़ियों पर घंटो बैठे रहना… सामने वाले पार्क में हो रहे किसी नाटक को देखते रहना… उन भीनी भीनी पीली लाईट्स मे

- अब शायद सफ़ेद लाईट्स लग गयी है वहाँ… कोई बता रहा था काफ़ी समय से उधर नहीं गया…

- अच्छा!… दूधिया रोशनी भी अच्छी लगती होगी… ऎनीवेज़ और क्या क्या बदल गया है?

- बस और आटो के रेट्स बढ गये हैं…

- तुम भी तो बढ गये हो! तुम्हारी नयी कहानी पढी थी। उसके पुरुष पात्र का किसी उम्रदराज महिला के साथ एक फ़िजिकल सीन भी था… किसके बारे में सोंचकर लिखा?……  सिर्फ़ सोंचा ही न?

 

ट्रेन की आवाज धीरे धीरे तेज होती जा रही थी… वो दूर पटरियों  की तरफ़ देखने लगा। दूर से एक ट्रेन आ रही थी… पुरानी यादों के साथ… धीरे धीरे… धीरे धीरे…

Monday, June 28, 2010

एक रिकर्सिव कहानी…

raindance मुम्बई की बारिश कभी किसी को काम पर जाने से नहीं रोकती… ये या तो तब शुरु होती है जब आप सो रहे होते हो या तब जब आप ओफ़िस निकल चुके होते हो… इसलिये बारिश की छुट्टी लेने के ख्याल अकसर सूखे ही रह जाते है…

ओफ़िस से अभिषेक आज थोड़ी जल्दी निकल आया था। बाहर बारिश हो रही थी… अपने छाते से अपने को भीगने से बचाते बचाते वो उस रोड तक पहुँच चुका था जहाँ से उसे घर के लिये रिक लेना था… रिक दिखते ही वो उसे हाथ हिलाकर रोकने की कोशिश करता… पर काफ़ी टाईम से किसी रिक ने उसकी तरफ़ देखा तक नहीं था…   इसी दौरान कभी कभार अपने छाते को हटाकर आसमान की तरफ़ देख लेता… ये बूँदें आखिर आती कहाँ से हैं … एक पल उसके और बादलों के बीच दूर दूर तक कुछ नही होता… फ़िर बूँदें न जाने कहाँ से अवतरित होती और धीरे धीरे बड़ी होती जातीं… फ़िर उन बूंदों का उसके चेहरे से ऎसे स्पर्श होता जैसे कोई बड़े प्यार से उसके चेहरे को हर तरफ़ से चूम रहा हो।

- आपको बोरीवली जाना है?

किसी मीठी सी आवाज़ ने उसकी एकान्तता मे दखल दिया था..

- क्या?

- आर यू गोइंग टु बोरीवली?

- या…

’क्यूं’ पूछने से पहले ही वो अगली लाईन बोल चुकी थी।

- आज रिक की काफ़ी शोर्टेज रहेगी सो अगर रिक मिलता है तो हम दोनो साथ जा सकते हैं…

उसने वो बात कहकर मुंह घुमा लिया… और आते हुए रिक्स को हाथ दिखाने लगी…  अभिषेक फ़िर अपनी दुनिया में खो गया…कहीं मेरी शक्ल किसी और से नहीं  मिलती न…?? न!, ये मेरे साथ तो नहीं  हो सकता… ये मेरी किस्मत तो नहीं  हो सकती कि हल्की हल्की बारिश हो… एक अन्जान लड़की हो… और वो भी एक रिक में जाने के लिये तैयार… नहीं नहीं … शी इज़ मिस्टेकिंग मी विथ समबडी…

- मै टाटा पॉवर से दूसरा रिक ले लूंगी। आप इसे लेकर निकल जाना…

 

दिखने में तो बहुत सामान्य है… आँखों  पर स्पेक्स हैं और शरीर पर एक बहुत ही नोर्मल सा सलवार सूट… मुस्कराती है तो सारे दांत दिखते हैं… कम्बख्त दांत भी एकदम करीने से लगे हुये हैं… और मेरे…… जैसे जहाँ जिसको जगह मिली निकल लिया और जगह कब्जिया कर बैठ गया…

कहाँ पिछले आधे घंटे से उसे कोई रिक्शे वाले ने भाव नही दिया था और कहाँ उसे आये हुए अभी दो मिनट भी नही हुये थे कि अचानक ही एक टैक्सी अवतरित हुयी… पीछे वाली सीट पर एक आंटी अंकल पहले से बैठे हुये थे… ड्राईवर ने उसे आगे बैठने के लिये कहा। वो आगे बैठते हुये उससे बोली “कम ना? ही इज़ गोइंग तो टाटा पॉवर। वहाँ से रिक ले लेंगे…”

ये तो साफ़ साफ़ जाहिर था कि वो टैक्सी ’उसे’ लिफ़्ट देने के लिये नहीं रुकी थी… लेकिन वो तो बुला रही थी और वो भी इतने हक से… मना करना बनता भी नहीं था… वो मना करना चाहता भी नहीं था…

- कम ना? फ़ास्ट?

टैक्सी के आगे वाले पोर्शन मे आधी जगह ड्राईवर की थी और बाकी आधी जगह मे उसे, उस बन्दी के साथ एडजस्ट करना था… बीच बीच मे टैक्सी का रोटेटिंग गियर भी कभी कभी एक दो राउंड मार जाता था। वो खिड़की से चिपककर उसी मे सिमट गया था और उसकी एक बांह लड़की के पीछे से होते हुए ड्राईवर से कुछ पहले तक जाती थी… सबलोग टैक्सी मे बैठ चुके थे… टैक्सी के इंजिन की आवाज के साथ साथ उस टैक्सी मे मौन का एक निर्वात बन चुका था। सब उसी मे तैर रहे थे…चुपचाप… । अपनी खिड़की से चिपका हुआ अभिषेक बाहर एकटक देख रहा था और अपने ही मौन मे उस लड़की से पूछने के लिये सवालों की रूपरेखा तैयार कर रहा था… सवाल सोंच रहा था… उन्हें जरूरत के मुताबिक फ़िल्टर कर रहा था… वो उस एंजेल को जानना चाहता था जिसने  एक पल को ही सही  पर उस बरसती बारिश में उसकी धूल भरी किस्मत से धूल की एक पर्त झाड़ी थी…

अचानक ही उसे इस मौन से घुटन होने लगी…

- यू वर्क इन निर्लोन काम्प्लेक्स?

- यप, आई एम वर्किग विथ डायचे बैक

- ओह्ह… डायचे बैक… टेक्निकल ओर फंक्शनल साईड?

- फंक्शनल बेसिकली

- ह्म्म… ……अच्छा डोंट यू थिंक बॉम्बे की बारिश भागते हुये बॉम्बे को थोड़ा स्लो कर देती है…?

- तुम मुम्बई से नहीं हो??… ……फ़िर कहाँ  से हो?

- लखीमपुर…

- क्या?

- लखनऊ के पास है… तुम कहाँ से हो?

- बोर्न एंड ब्रोट अप इन बॉम्बे… वैसे हम लोग राजस्थान को बिलोंग करते हैं…

- ह्म्म… मतलब ये बारिश तुम्हारे लिये नयी नहीं है?

- (मुस्कुराते हुये) यहाँ फ़ेमिली के साथ रहते हो?

- नहीं…… रूममेट्स के साथ

ये सवाल थोड़ा डायरेक्ट नहीं था… बंदियां कितना कुछ तो डायरेक्ट पूछ लेती हैं… लगती तो बैचलर है लेकिन सेल बार बार देख रही है जैसे कोई इंतज़ार कर रहा हो… माईट भी मैरिड… माईट भी बोयफ़्रेन्ड… हू नोज़?… कहीं वो ये तो नहीं चाहती कि मैं उससे उसका नंबर मागूँ…

- अभिषेक हीयर

- तिथी…

- तिथी, तुम न होती तो शायद मैं अभी भी वहीं रिक का वेट कर रहा होता…

- अभी नहीं कर रहे हो न? (अपनी करीने से लगी बत्तीसी दिखाते हुये)

यूं तो अभिषेक खिड़की से बाहर देख रहा था लेकिन पलटकर उसको मनभर कर देखना चाहता था… उस कन्जस्टेड जगह मे कभी कभी अभिषेक तिथी  को छू जाता तो कभी कभी तिथी की गर्दन अभिषेक की बांह पर जैसे रह जाती … उस बरसती बारिश मे कितना कुछ तो उनके भीतर बरस जाता  फ़िर भी दोनो सहज बने रहते। वो टैक्सी की सामने वाली विंडो से एकटक सामने देखती रहती तो वो साईड वाली विंडो से… कभी कभी वो सामने वाली विंडो से बाहर देखने की कोशिश भी करता…

- तुम बोरीवली मे कहाँ  रहते हो?

- नेशनल पार्क

- नेशनल पार्क में ? (अपनी ट्रेडमार्क बत्तीसी दिखाते हुये)

- आई मीन नेशनल पार्क के पास… …और तुम?

- मुझे वेस्ट जाना है…

टाटा पॉवर आ चुका था। बारिश अभी भी हो रही थी। लोग वहाँ रिक्स के इंतज़ार में खड़े थे। वो दोनो टैक्सी से उतरे ही थे और उन सारे लोगों की किस्मत को दरकिनार करते हुये उसकी ख़िदमत में  एक रिक हाजिर हो चुका था…

- मैं घर तक ड्राप कर दूं… वहाँ से रिक लेकर मैं अपने घर निकल जाऊगा।… (ओफ़र थोड़ा अटपटा था)

- अरे! ……मैं इधर जा रही हूँ और तुम्हें उधर जाना है… यू नो एकदम अपोजिट…

- कम्बख्त टाटा पावर को भी इतनी जल्दी आना था…  अच्छा… ………तुम न मिलती तो शायद मैं  अभी भी वहीं रिक का वेट कर रहा होता…

उसकी ट्रेडमार्क बत्तीसी सामने आ चुकी थी… उसने एक पल अभिषेक को देखा फ़िर अगले पल उसके पीछे खड़े एक बन्दे को… उसकी भी शक्ल से ही लग रहा था कि कितनी देर से वो अपनी धूल भरी किस्मत के सहारे एक रिक के लिये खड़ा है…

- आपको वेस्ट जाना है? आर यू गोइंग टु बोरीवली वेस्ट?

- हाँ…

- मैं भी उधर ही जा रही हूँ… कम ना? वी कैन शेयर दिस रिक।

 

…… इधर अभिषेक फ़िर रिक के इंतज़ार में खड़ा था।

Monday, May 31, 2010

आधी अधूरी ज़िन्दगी…

- सर, मिनरल वाटर ओर प्लेन वन? painting

- ६० रूपीज फ़ोर अ वाटर बोट्ल? आप लोग एक्वागार्ड यूज करते है न अपने रेस्तरां में?

- यस सर…

- गुड, देन ब्रिंग प्लेन वाटर प्लीज़…

- तुम्हे प्लेन वाटर चलेगा न?

- या या… श्योर……

 

दोनो की वो पहली मुलाकात थी… दोनो को एक दूसरे के बायोडेटा में लिखा नाम बड़े सलीके से याद था…

प्रिया और गणेश…

कल रात ही प्रिया को उसकी माँ  ने गणेश के नये ईमेल के बारे में बताया था… कुछ रोज पहले ही गणेश ने शादी डोट कॉम पर प्रिया को रिक्वेस्ट भेजी थी… पूरे परिवार की सोंचा  विचारी के बाद इक मुलाकात फ़िक्स की गयी थी… पहली मुलाकात। गणेश एक आईआईएम पासआउट होने के  साथ साथ एक आन्त्रेप्रेन्योर भी था और इसी साल उसकी कम्पनी को टाप २५ स्टार्ट अप्स मे नोमिनेट किया गया था… कुल मिलाकर ’एक शादीलायक मटीरियल’ था… थोडा अच्छे शब्दो मे कहे तो ’एन एलिजिबल बैचलर’…

प्रिया ने उसकी एक छवि बनाकर रखी थी… एक स्नोबी पुरुष जो हर बात पर अपनी ही करेगा… कहेगा कि ये ऎसे किया करो ये वैसे… वो कह देगी कि उसे कोई ऎसा वैसा न समझे… वो एक सॉफ्टवेयर इन्जीनियर है  और अपने पैरो पर खड़ी है। तीन साल से नोयडा मे इन्डिपेन्डेन्टली  रह रही है।        …… उसने कुछ भी स्नोब्री दिखायी तो साफ़ साफ़ मना कर देगी।

लेकिन कभी कभी ज़िन्दगी का सबसे बड़ा  फ़ैसला लेने के लिये किसी की कही एक लाईन ही काफ़ी होती है और कभी कभी कहे गये लम्बे से लम्बे पैराग्राफ़्स भी टस से मस नही कर पाते…

गणेश ने उस वक्त ऎसी ही एक लाईन कह दी थी… उस अमेरिकन रेस्तरां में,  स्नोब्री और शो-ओफ़ मछली मार्केट की बू जैसा हवा मे फ़ैला हुआ था और गणेश ने उस हवा को दरकिनार करते हुये कितनी सादगी से प्लेन वाटर के लिये कहा था…। प्रिया ने अपने माता-पिता  को मन ही मन धन्यवाद कहा और अपनी उसी किस्मत पर बहुत नाज़ किया जिससे वो कुछ दिन पहले एक लव मैरिज चाहती थी… लव मैरिज… उससे… जो कभी उसके प्यार के लायक ही नही था…

वो अपने इन्ही विचारों में पर्त दर पर्त डूबती जा रही थी और उस टेबल पर वो दोनो पर्त दर पर्त खुलते जा रहे थे। उनकी बातों से बातें निकल रहीं  थीं और निकली हुयी बातों से फ़िर ढेर सारी बातें… एक ही बात को सोंचते हुये दोनो की आँखों  में अलग अलग आकृतियाँ बनती थीं  वैसे ही जैसे बादल, आकाश में मोर्ड्न आर्ट बनाते रहते हैं… और हर देखने वाले को उनमें कुछ अलग ही दिखता है। उस अमेरिकन रेस्तरां मे दो बादल साथ मिलकर ऎसी ही कुछ तस्वीरें बना रहे थे……

- आई एम डन। तुम्हे कुछ और चाहिये?

उसने गर्दन हिलाकर ’ना’ कहा और वापस टेबल की ओर देखते हुये अपनी उन्ही आकृतियाँ  में खो गयी।

- प्रिया…………?

- ………हाँ?  (आँखें टेबल को छोड़ गणेश की आँखों को देखने लगीं)

- बिफ़ोर गोइंग अहेड, मैं तुम्हे एक बात बताना चाहता हूँ…

- हाँ … कहो……

- ……मुझे अर्थराईटिस है। …………मैं ज़िन्दगी के इस मोड़ पर जहाँ मुझे किसी के साथ जुड़ना है, इस सच्चाई से मुंह  नहीं घुमा सकता और मुझे लगता है कि मेरे जीवन में आने वाली को, ये सब पहले से पता होना चाहिये।

प्रिया के लिये आसपास का शोर म्यूट हो गया था… दिमाग और दिल आपस मे किसी मुद्दे पर बात करना चाहते थे…

- …………गणेश! ………………… ऎसी बातें  मेरे लिये मायने नहीं रखतीं …। अगर इन्सान तुम्हारे जैसा सुलझा हुआ और इतना समझदार है तो ये सब बातें  बेमानी है। (उसका दिमाग और दिल अभी भी बातें  करना चाह रहे थे)

- ह्म्म… तुम्हे ये बात अपने परिवार को भी बता देनी चाहिये जिससे कोई भी किसी कन्फ़्यूजन मे न रहे…

- ह्म्म…

- चलो तुम्हे घर ड्राप कर दूँ…

- ह्म्म…

 

पूरे सफ़र प्रिया ख्यालों  के एक जाले में उलझी हुयी थी।

ये उसकी ज़िन्दगी का सबसे बड़ा  निर्णय है आखिर शादी-विवाह रोज़ थोड़े  ही होते हैं… लेकिन गणेश कितना सुलझा हुआ है… ज़िन्दगी नर्क बन जायेगी… उसका साथ रहा तो नर्क को भी स्वर्ग बना लेंगे… काश वो लड़का  भागता नहीं … अच्छा हुआ जो सच्चाई बाहर आ गयी… लव मैरिज… गणेश… आप लोग एक्वागार्ड यूज करते है न अपने रेस्तरां में ?… प्लेन वाटर… अर्थराईटिस…

- तुम्हारा घर आ गया…

- ओह, हाँ … (कार से उतरते हुये)

- इट वाज़ अ नाईस इवनिग विद यू

- सेम हियर… …गुड नाईट…

- गुड नाईट…

वो मंजर अधूरा था, अधूरा ही रहा… गणेश की कार आगे बढ़ गयी… प्रिया ने उसे थोड़ी देर जाते हुये देखा फ़िर घर के अन्दर चली गयी। अधूरा मंजर एक अधूरी रात के साथ उस जगह कई सालों तक पड़ा रहा…

 


प्रिया आजकल यूएसए में  है… उसके पति के पास ग्रीन कार्ड है… कुछ दिन में उसे भी मिल जायेगा… उसकी झोली में ढेर सारी खुशियाँ  हैं लेकिन उसकी ज़िंदगी अभी भी कुछ अधूरी सी है… अभी भी वो फ़ेसबुक पर गणेश की पब्लिक अपडेट्स देखा करती है… फ़्रेन्ड रिक्वेस्ट आजतक नहीं  भेज पायी… फ़ेसबुक प्रोफ़ाईल पर गणेश का मेराईटल स्टेट्स (marital status) ’मैरिड’ है…

गणेश की शादी तो हो गयी है लेकिन क्या वो खुश है? क्या वो अभी भी प्रिया को याद करता है?… काश फ़ेसबुक ये भी बता सकता!

और अक्सर ही ये सब सोंचते हुये प्रिया अपने मेलबाक्स में ’गणेश’ नाम से सर्च मारती रहती है और एक लम्बी साँस लेते हुये यही सोचती है कि उस आखिरी ईमेल का जवाब आजतक नहीं  आया………

 

और वो अधूरा मंजर इतने सालों बाद भी उसी जगह अधूरा ही पड़ा है।

Wednesday, May 26, 2010

इक अकेली शाम…

gg वो  शाम  को  एक  दूध  की  बाल्टी  लेकर  दूध लेने निकल  जाता  है  और  उस  अकेली  शाम  उस  अकेले  घर  में  माँ,  अकेले अकेले, उनके दूध लाने का  इंतज़ार  करती  है…


उस मोहल्ले की एक  गली  की उस  अकेली  दूध  की  दूकान  के  पास  एक  कच्छे  बनियान  की  दूकान  है... उस  बाप  का  कोई  दोस्त  वहाँ  अकेला  बैठता  है.. कभी  दोनों  दोस्त  थे,  अभी  अकेले  है और बाप भी... उसका  इकलौता बेटा  बॉम्बे  की  किसी  MNC में  काम  करता  है  और  दोस्त  का इकलौता बेटा नोएडा  के  किसी  बेनामी  कॉलेज  में  कोई  बेनामी  प्रोफेशनल  कोर्स …


ताज़ा  दूध  आने  में  अभी  वक़्त  है.. रोज़  की  तरह  दोनों  साथ  साथ  अकेली अकेली  चाय  पीते  हैं…


अकेले  घर  में  माँ, उनका  इंतज़ार  करते  हुए अकेले चाय  पी  रही  है  और  निगाहें  बाहर  वाले  लोहे  के अकेले दरवाजे  पर  एक  नॉक  सुनना  चाहती  हैं… उसकी  निगाहें  सुनती  हैं  आजकल… आँखों  पर  पॉवर  वाला  चश्मा  है  जो  बेटे  ने  लगवाया  था… उसकी  उम्र  में  आँखें  कम  देख  पाती  हैं... सो अब वो  उनसे  सुनने  लगी  है…


बाप  का  वही  अकेला  दोस्त  है… दोनों  की  बातें  भी  अकेली  हैं... बाप  ने  अपने  वंश  में  सबसे  ज्यादा  पढाई  की  थी... वो  ला(law) ग्रेजुएट है   और  बेटा…  मास्टर्स… मास्टर्स  इन  कंप्यूटर  अप्लिकेशन्स... भूलती उम्र के साथ बाप  को  ला(law) भी अब  हलकी  हलकी  भूलने  लगी  है… दोस्त  से  वो  कंप्यूटर  कि  बातें  करता  है... MCA की  बातें  करता  है... सेमेस्टर  की  बातें  करता  है… बॉम्बे  की  बातें  करता  है… ये  बातें  उसके  बेटे  ने  उसे  फोन  से  बतायी  हैं… थोड़ी  बहुत… बाकी  तो  वो  उन  सुनते  हुये कानो  से  देख  लेता  है.... उसके  कान अब देखते  हैं... उसका  पॉवर  का  चश्मा  उसके  बेटे ने नहीं, उसने ही बनवाया है.....


अकेली  माँ , बाप  और  दूध  की  बाल्टी  के  इंतज़ार  में  सुबह का बासी अखबार पढ़ती  है... 'सहेली' वाला  पेज  भी  रोज़  नहीं  आता… वो  कुछ  पन्ने  पलटकर  उसे  पुराने  अखबारों  के  बीच  रख  देती  है... अकेला  अखबार  अब  अकेला  नहीं  रहता... माँ  फिर  अकेली  है... सोंचती   है  कि सारे  अखबार  एक  साथ  बहुत  ज्यादा  हो  रहे  हैं , किसी  रद्दी वाले  को  बेचने  पड़ेंगे... आते  ही  इनसे  कहेगी  कि  जो  अखबार  रखने  हो  उन्हें  अलग  कर  दें... (रद्दियाँ  हमेशा  साथ  जाती  हैं... अच्छे  अखबार  अलग  अलग , अकेले  घर में ही कहीं खो जाते हैं...)


इंतज़ार  पूरा  होता  है... दूध  के  आने  का...  बाप  की  अधूरी  सुनी  बातों  को  पूरा  कहने  का... दोस्त  की  दूकान  बंद  करने  का... अकेले  लोहे वाले दरवाजे पर एक नॉक का... माँ का... और रात  का... शाम  ढल  चुकी  है...

अब दोनो उस घर मे साथ साथ अकेले अकेले है…

“सुबह कैलेन्डर भी बदलना है…?” (माँ रद्दियो की बात रोज की तरह भूल जाती है)

“ह्म्म…”

Thursday, May 20, 2010

अधूरी बातें…

- पता है, छोले बना रही हूँ!starfish 2
- हम्म....एक दिन वो तुम्हे बनायेंगे
- तुम पागल हो चुके हो...
- दुनिया भी यही समझती है
- तो क्या मुझे इस दुनिया से परे मानते हो?
- कुछ मान ही तो नहीं पाता
- तुम्हारी आँखें कुछ ढूंढ रही है...?
- हडप्पा… मोहनजोदडो…
- वो क्या हैं?
- नष्ट हो चुकी सभ्यताएं
- मैंने नष्ट नहीं की
- लेकिन तुम सभ्य हो
- तुम्हे कैसे पता?
- क्यूंकि तुमने सभ्यताएं नहीं नष्ट की
- रहने दो...तुम नहीं समझोगे
- काश....तुम भी समझ पाती
- सब समझ रही हूँ
- कुछ नहीं समझ रही हो
- तुम्हे ऐसा लगता होगा…
- मुझे ऐसा नहीं लगता… इन्फैक्ट मुझे कैसा भी नहीं लगता…
- लेकिन मुझे तो सब कुछ लगता है… ऐसा कैसे? लेकिन……शायद तुम सही कह रहे हो…
- मैं गलत कह रहा हूँ…… तुम सही सुन रही हो
- नहीं नहीं… अब सही सुनूंगी
- मैं गलत कहूँगा ही नहीं
- मुझे पता है
- और क्या क्या पता है तुम्हे?
galaxy - क्यूँ मुझे छूना  चाहते हो?
- नहीं, कुछ भी नहीं चाहता मैं
- चीख रहे हो… या कह रहे हो?
- सिर्फ बुदबुदाया मैंने ...और तुमने सुन भी लिया?
- छुआ भी तो...तुम्हारे लफ़्ज़ों को...शब्दों को...बुदबुदाने को...  मेरे हाथों में खरोच भी है।  तुम छू लो तो ये घाव भर जाए…
- कैसा घाव?
- शक्कर का...एकदम मीठा सा
- शक्कर कम कर दो, अपने आप भर जायेगा
- तुम छू लो तो काफी कुछ कम हो जायेगा। शक्कर भी… मैं भी, तुम भी और ये दूरी भी
- कम होना कहाँ अच्छा है ?
- तुम्हारी आँखें बहुत अच्छी है ...
- डूब जाओ उसमे
- उफ़...सारे रास्ते बंद हैं....अब निकलूँ कहाँ से?
- आंसू के साथ बह जाना… वो तो हमेशा निकलते रहते हैं
- नहीं… फिर तुम्हे मेरे लिए रोना पड़ेगा…वो मैं नहीं चाहती! फिर कहाँ से निकलूँ?
- निकलना ज़रुरी है?
- नहीं...बिलकुल नहीं...कभी नहीं!

Tuesday, May 18, 2010

क्या लिख दूँ कि तुम लौट आओ

किताबें ही किताबें हैं.. टेबल पर उनका एक ढेर बनता जा रहा है… एक मीनार सी बन गयी है… झुकी हुई… कुछ कुछ पीसा की मीनार के जैसी… बस एक दिन गिरेगी धड़धडाकर और उसमे दबे दबे मैं भी किताबों के कीड़ो की मौत मर जाऊँगा…

observation ये सोंचते हुए घंटो उन किताबो को देखता रहता हूँ और वो धूल भरी टेबल से, अपना मुंह बाये मुझे एकटक देखती रहती हैं… टेबल पर जैसे एक धूल भरा  रेगिस्तान उभर आया है और मैं उस रेगिस्तान में विचरते ऊँटो को देख सकता हूँ… अगले ही पल वो चींटियों में तब्दील हो जाते हैं… ढेर सारे ऊँट… ढेर सारी चींटियाँ… किताबो जैसी इमारतों पर चढ़ते हुये दिखाई देते हैं… जैसे किताबे, इमारतें न होकर, ढेर सारी बाबरी मस्जिदें हो और आज रात ही इनके गुम्बद गिराने की तैयारी हो…

शायद अभी भी उसके हाथों की मिठास है उन किताबो में… उन्हें उठाकर उसकी मिठास को अपनी साँसों के गुब्बारो में भर लेना चाहता हूँ  पर इन हाथों को जैसे लकवा मार गया है, कमबख्त सिर्फ सिगरेट जलाने के लिये उठते हैं… मैं थोड़ी देर के लिये किताबों से नज़रें हटा लेता हूँ…

 

इस कमरे में मैं अकेला नहीं हूँ, इन फैक्ट कभी अकेला नहीं था… स्ट्रीट लाइट की एक धुंधली सी रौशनी है जो खिड़की खुले रहने पर (मुझे याद नहीं की लास्ट टाइम कब बंद हुयी थी, इन फैक्ट मुझे कुछ भी याद नहीं…) मुझे एकटक देखती रहती हैं… शायद किताबो ने ही कुछ बताया होगा… मेरी सामने वाली दीवार पर एक परछाई सी है… दैत्याकार…… किसकी है पता नहीं… शायद किताबों और रोशनी की कुछ साजिश हो… नहीं तो उन किताबों के कीड़ों की…

वो परछाई खामोश है और मैं बोल रहा हूँ... मैं खामोश हूँ, परछाई बोल रही है... लेकिन कमरे में फिर भी एक खामोशी है... इंतज़ार है कि कब इन सबमें से कोई बोले तो शायद ये खामोशी भी बोले… लेकिन कई दिनों से सबकी मौनी अमाव्य्स्या चल रही है… तुम होती तो ये जरूर बोलते… इन्हें खिलखिलाते हुये सुना है मैंने… अब शायद ये भी मेरे साथ सुबह के इंतज़ार में हैं… इंतज़ार सुबह को भी है रात के आने का, और रात को फ़िर सुबह के आने का…

क्यूँ ये रात और सुबह एक साथ नहीं आ सकते?

कमरे के एक कोने में चुपचाप मुझे देखती एक टीवी भी है… मै तो आजकल उसे नही देख पाता…उसका रिमोट भी आजकल काम नहीं करता है… शायद सेल डिस्चार्ज हो गए हैं…तुम्हारी लिखी सामानों की पर्ची अभी भी मेरे सामने पड़ी हुई है… एक एक चीज़ अब  मुंहजबानी याद है मुझे…

सोचता हूँ कि क्यों तुमने जानबूझकर उसमें 'सेल' नहीं लिखे?? तुम तो कभी कुछ भी नहीं भूलती थी…

टीवी में कभी कभी किसी की धुंधली धुंधली शक्ल भी दिख जाती है… मेरी ही होगी… तुमने कभी मेरी आँखें चूमकर कहा था न कि ये दुनिया की सबसे प्यारी आँखें हैं… अभी भी आँखों में उसकी एक गिलावट/नमी सी रहती है…

सोचता हूँ कि काश सिर्फ इतना होता कि तुम कहीं नहीं जाती या सिर्फ इतना कि तुम इन बेजुबानो को बोलना सिखा देती जैसे ये तुमसे बोला करते थे या सिर्फ इतना कि ये खिड़की बंद कर जाती या सिर्फ इतना कि मैं चला जाता…… तुम यहीं रह जाती……

Sunday, May 9, 2010

ब्वायेज विल बी ब्वायेज..

- समुद्र कितना इन्ट्रोवर्ट होता है न?shades

- ह्म्म???

- भीतर कितना कुछ छुपाये रहता है और ऊपर से एकदम शांत… कमबख्त कभी किसी से मिलने कहीं जाता भी नहीं… जब देखो गधे लड़कों की तरह़ यहीं  पड़ा रहता है… मूडी भी है…

- ह्म्म???

- कभी एकदम शांत और गंभीर, तो कभी जैसे अपनी लहरें गुनगुनाता रहता है… म्यूट रातो मे जैसे किसी को पुकारता रहता है… और दिन निकलते ही  एक गहरी नीद मे सो जाता है… जैसे एक मजदूर दिन भर काम करने के बाद रात मे सोता है… जैसे २ बजे के बाद बोरीवली स्टेशन पर लोकल ट्रेन्स सो जाती हैं… जैसे सवेरे सवेरे सारी ट्रैफ़िक लाईट्स एक साथ सो जाती हैं…

- ह्म्म्म्म……

(वो समन्दर मे सैडनेस देखती थी और मै उस सैडनेस मे एक समन्दर को… उसकी टी पर लिखा था – नो वकिंग फ़रीज (No Wucking Furries) पर उसे सारे संसार की चिंता थी… मेरी तो हद से ज्यादा…)

- तुम्हारी मेरे बारे मे कोई फ़ैन्टेसी है?

- ह्म्म??? (ये लडकी पागल है)

- फ़ैन्टेसी लल्लू…???(जैसे मैं PSPO नहीं जानता था)  ब्वायेज विल भी ब्वायेज… कुछ तो सोचते होगे? पता है मैं क्या सोंचती हूँ?

- क्या? (फिंगर्स क्रास्ड)

- पहाड़ो के बीच एक डाकबंगला हो जहाँ खिडकी और दरवाजो से सिर्फ़ संगीत  भीतर आता हो… अपने  बेडरूम मे एक कोने मे एक फ़ायरप्लेस हो और उसमे कुछ लकड़ियाँ, कुछ कुछ हम दोनो जैसे ही सुलग रही हों… अपने बेड के पास एक खिड़की भी हो और उस खिड़की से बर्फ़ीले पहाड़ हमारे बेडरूम मे झाँकते हों जैसे वो सब कुछ देखना चाहते हों… यू नो वोयेरिज्म… और हम दोनो इन सबसे बेफ़िक्र सब कुछ करते रहें… सब कुछ… और फ़िर उस खिडकी पर साथ बैठकर उन बर्फ़ो का पिघलना देखें…

कहाँ खो गये?

- यहीं हूँ..

- मुझे तो बर्फ़ीले पहाड़ पिघलते दिख रहे हैं… ब्वायेज विल भी ब्वायेज…(खिलखिलाते हुये)

चलो अब तुम्हारी बारी?

- ह्म्म…। अहेम अहेम…(गले को तरल करने की कोशिश जिससे फंसे हुए शब्द आसानी से बह सकें )…

नवी मुम्बई के एक आलीशान अपार्ट्मेन्ट के ३०वें माले पर एक फ़्लैट… फ़्लैट से बाहर झाँकती बालकनी और उसके साथ दूर तक देखने की कोशिश करता हुआ एक हैंगिंग सोफ़ा… एक कोने में अपनी बारी का इन्तजार करता हुआ एक छोटा सा फ़्रिज… उसमें ठंडाते हुये आइस क्यूब्स और उनके ठंडे होने के इन्तजार में  बैठी स्काच… बैकग्राउन्ड मे मेरे कुछ फ़ेवरेट गाने… और उस फ़र्श पर हम तुम…

- सब कुछ करते हुये? (क्यूरियसली)

- ह्म्म……

- और? (वेरी क्यूरियसली)

- और उसके बाद हम दोनो एक चादर में लिपटे सारी रात उस हैंगिंग सोफ़े में झूलते रहें… तुम मुझे सुलगाती रहो और मैं अपनी गोल्ड फ़्लैक लाईट्स… सारी रात…

- ब्वायेज विल भी ब्वायेज (खिलखिलाकर  हँसते हुये)

…………………

…………………

…………………

- हैलो?

- हे… कैसी हो?

- बढिया… लॉन्ग टाइम न?

- ह्म्म…

- मरीन डाईव अभी भी जाते हो?

- ह्म्म… नही…

- गोल्ड फ़्लैक लाईट्स के क्या हाल हैं?

- काफ़ी टाईम हो गया.. छोड दी है…

- ओह… और कहाँ हो आजकल? बोरीवली?

- नहीं… पहाड़ो में एक घर ले लिया है… एक वुडहाऊस है… तुम?

- इन्होने नवी मुम्बई में एक फ़्लैट ले लिया है… बस वहीं ३०वें माले पर रहती हूँ…

- ह्म्म……

- ह्म्म……

 

 

 

* picture courtesy: Mr. Nag via ‘Varansi’ - a  Facebook group

Friday, March 26, 2010

वो कायर है......

theater-masks-1 उसकी  एक  पर्सनल   डायरी  के  इंट्रो  में  लिखा  है  - 'मैं  कायर  हूँ'.. उसने  ये  सच  गाँधी  जी  की  आटोबायोग्राफी  से  प्रभावित  होकर  लिखा  था.. उसे  लगता  था  की  उनकी  तरह  वो  भी  सच  स्वीकारने  की  क्षमता  रखता  है... (मोसो  कौन  कुटिल,  खल,  कामी)


आजकल  वो  उस  डायरी  को  नहीं  पढता.. उसमें  पेसिमिज्म  की  बू  आती  है... एक  सड़ी  हुई  गंध,  जिसे  वो  आजकल  बर्दाश्त  नहीं  कर  पता....


उन  दिनों  उसे  लिखने  का  नशा  था... दुनिया  बदलने  के  हंसी  ख्वाब  थे  जिन पर  वो  कब  खुद  पाँव  रखकर  आगे  बढ़  गया, नहीं  पता...


तब  उसकी  दुनिया  बहुत  छोटी  थी.. बस  उसकी  कविताओं  को  अपना  नाम  देने  वाले  कुछ दोस्त और  उसको  पाज़िटिवली  क्रिटीसाईज़ करने  वाले मुट्ठी भर लोग... अभी भी दुनिया कुछ बडी नही हुयी है पर अब  वो  'दुनिया'  शब्द  सुनते  ही  कान  बंद  कर  लेता  है...


उसके  शब्दों  में कभी  भी  जादू  नहीं  था.. लफ्ज़  हमेशा  हल्के  थे... बस  भावनाओं  में  टूट  के  लिखता  था.. रस्किन  बोंड  की  तरह…


मुझे याद है एक  दिन कोलकाता  में  उसके  हाथ  पाउलो  कोहेलो की  ’ज़हीर’  लग  गयी  थी... उसने  चंद पन्ने  पढ़े  थे  और  उस  किताब  को  हमेशा  के  लिए बंद  कर  दिया  था  और  खुद  लिखने बैठ  गया  था.... वो  लगातार तीन  दिन ऑफिस  नहीं  गया.. ऐसे  लिख  रहा  था  जैसे  कोई  महाकाव्य  लिख  रहा  हो ... तीन  दिन  बाद  जब  वो  इस  नशे  से  उतरा  तो  उसने  उन  पन्नो  को  फाड़ के  फेंक  दिया था.... और खुशी खुशी ऑफिस जाता था।


आज  उसे  उस  बात  पर  कोई  अफ़सोस  नहीं  है... और  आज  भी  वो  क्रोस्वर्ड्स में  पाउलो  केहलो  की  बुक्स  को  बस  देख  के  रख  देता  है... 'Alcehmist' और  'Veronica decides to die' घर  में ही  कहीं  खो  गयीं  है.. लास्ट  टाइम  फ्लैट  बदलने के वक़्त दिखीं  थी...
…………………

…………………

वो  आज  लिखता  नहीं  है... सिर्फ  सोंचता  है... उसके  पास  कोई  सोचालय नहीं  है... वो  शौचालय  में  सोंचता  है... वो  बस  में  सोंचता  है.. ऑटो  में  सोंचता  है.. सोते  वक़्त  बुदबुदाता  भी  है  लेकिन  कोई  आवाज़  बाहर  नहीं  आती... उसके  मुर्दा  ख्याल  अपनी  अपनी  कब्रों  से  बाहर  आकर  एक  दूसरे  से  लड़ते  हैं  और  उसके  दिमाग  की  नसें  फूलने  लगती  हैं... खून  का  दबाव  बढ़ने  लगता  है.. वो  ये  सब  देख  सकता  है.. उसे  दिखता  है   की  शिराएँ  फूल  रही  हैं  और  वो  फट  जाएँगी.... वो  तपस्या करना  चाहता  है… घन्टो, महीनो, सालो बस उसी मे बैठे रहना चाहता है…

सोंचता  है  की  शायद   उससे  उसके  विचार  शांत  हो  जायेगे...लेकिन ...नहीं  नहीं..


वो  भागना  चाहता  है... दौड़ना  चाहता  है.. तब  तक,  जब  तक  वो  थक  के  गिर  न  जाए.. तब  तक,  जब  तक  वो  इन  विचारों  को  कहीं  पीछे  न  छोड़  दे... कहीं  बहुत  पीछे……

और  वो  भाग  रहा  है.. दौड़  रहा  है....

हफ़ हफ़ हफ़……हफ़………हफ़………हफ़………………………हफ़……………

 

हां  उसकी  पीठ  दिख  रही है…………

…………………

…………………

वो  आज  भी  कायर  ही है।

Tuesday, February 23, 2010

पिछ्ले पन्नो से कुछ - रेत पे नाम!!

2204538858_8564d1aabc

सुना है यादें संजोकर रखी जाती हैं इस गतिमान पर स्थिर ह्रदय में.....

मेरी भी कुछ यादें उससे जुड़ी हुई हैं। न जाने हम कब तक समंदर के किनारे बैठे रहते थे, हर एक लहर को अपने पास आते और थोड़ा सा भिगोकर जाते हम साथ बैठे देखा करते। वो रेत पे मेरा नाम लिखती और में उसका। और अगली सुबह हम दोनों का नाम समंदर में समां चुका होता था। यह विशाल समंदर हमें पूरे दिन निहारा करता था। हमारी प्यारी बातें शांत भाव से सुना करता , हमारे झगडे पे मुस्कराता, वो मुझे घूंसे मारती और में भागता तो जैसे ये भी उसके साथ मुझे पकड़ने के लिए दौड़ता।

वो मुझे कहती थी की

"पंकज! ये लहरें हमारी बातें सुनने के लिए आती हैं न?"

"नही! ये सारे जहाँ से खूबसूरत इन पैरों में लिपटने आती हैं और इस ज़न्नत में मिल जाती हैं।"

वो मुझे धक्का देकर गिरा देती और खिलखिलाते हुए कहती

"धत! बेवकूफ"

और हम दोनों हंसने लगते। पर न जाने क्यों वो बार -बार मुझे हमारी दोस्ती ही याद दिलाती। क्या ये सब प्यार नही था? दोस्ती भी तो प्यार का दूसरा नाम है। एक दिन हिम्मत करके मैंने उससे कहा की "मै तुमसे प्यार करता हूँ"। उसने बड़े रूखे मन से टाल दिया। मैंने फिर कहा उसने अनसुना कर दिया। फिर धीमे से बोली

"तुम मेरे सबसे अच्छे दोस्त हो और में तुम्हारी दोस्ती खोना नही चाहती हूँ "।

मैंने अपनी पलकें बंद कर ली आँसूओ को आंखों में ही रोकने के लिए, पर एक-दो आंसू बाहर छ्लक ही आए।

दरअसल.. वो किसी मुकाम पे पहुँचाना चाहती थी और वह समझती थी की मेरा प्यार उसके पैरों में बेडियाँ दाल देगा। वो भूल गई की उसके मरे हुए आत्मविश्वास को मैंने ही साँसें दी थीं। मैंने ही उसे वो सपना दिखाया था। मै वहाँ से उठकर चला आया। अगले दिन उसने समन्दर किनारे आना छोड़ दिया। कुछ दिन बाद शहर भी छोड़ दिया।

अब समन्दर की रेत पर उसी का नाम था क्यूंकि मै तो उसी का नाम लिख सकता था।

इन रेतों में मेरा नाम लिखने वाला कोई नहीं था, कोई नहीं... ।

_____________________________________________________________

ज़िन्दगी की किताब पर धूल जम गयी है……न जाने कबसे अपने बन्द कमरे की खिड्किया भी नही खोली…ताज़ी हवा से शायद अब दम घुट जाये… कम्फ़र्ट ज़ोन से बाहर आने का डर भी है……

मेरे काम की काफ़ी चीज़े मेरे तकिये के पास ही रहती है…बची कुछ चीज़े बेड से सटी हुई मेज पर… कुछ खास नही, बस ’अहा ज़िन्दगी!’ के कुछ पुराने एडीशन्स, ’क्रेस्ट’ की कुछ कापिया, चन्द किताबे जैसे अभी ’जापानीज वाईफ़’, ’कपोचीनो ड्स्क’,’स्लो मैन’ और ’फ़्रेन्च लवर’, मेरी कुछ बूढी डायरिया, पिता जी का एक पुराना पत्र, मेरे कमरे की चाभिया, वालेट और हमारा कम्पनी आई कार्ड…

खिडकी मेज के बगल मे है, खुलने से हवा चीज़ो को इधर-उधर कर सकती है…एक ऐसी ही हवा इस वीकेन्ड आयी थी……ज़िन्दगी की किताब के पन्ने इधर उधर कर गयी..ये भी भूल गया कि किस पेज पर था…कन्शन्ट्रेशन प्राब्लम मेरे साथ हमेशा से है…

२-३ दिन से पूरा साहित्यमय हो गया हू..और कुछ पुरानी पोस्ट्स खुल गयी है…… जिन्हे ऐसे ही हवाओ से छुपा कर रखा था….

______________________________________________________________

Sunday, September 6, 2009

लेट्स स्माइल……

DSC00046आफ़िस से बाहर आता हू…….सर उठाकर खुले आसमान को जी भरकर देखता हू……बारिश की कुछ बूदे गालो पर गिरती है, कुछ आँखों पर और पलकें बन्द हो जाती है…फ़ार्मल्स के गीले होने की कोई चिन्ता नही है…आज मै खुश हूँ… बहुत दिनो के बाद…

 

 

रिक्शा वाला देखता है, मै पैदल ही चलता हूँ…… भीगता हूँ और महसूस करता हूँ कि मेरी आत्मा भीग रही है…वो जो कभी बाहर नही आती, आज उसे साफ़ करना है………

गोआ का एक द्र्श्य सामने आता है…अन्धेरी रात है, मै अपने दो दोस्तो के साथ बीच पर लेटा हूँ… सब खामोश है…सिर्फ़ एक आवाज़ है – लहरे आकर रेत को चूम रही है। हम तीनो आसमान को देख रहे है…और कोई भी उस सन्नाटे को तोडना नही चाह रहा है…

ये वही आसमान है…काफ़ी दिनो बाद नोटिस कर रहा हूँ…… बस दिन बदल गये थे, मै चाहकर भी खुश नही हो पा रहा था…आज फिर से वो कालेज वाला जोश महसूस कर रहा हूँ……. कुछ करके दिखाने वाला जोश……

कुछ खास नही हुआ है, बस मोबाइल का वाल-टेक्स्ट बदल गया है……… पहले ’स्माइल’ हुआ करता था, अभी ’लेट्स स्माइल’ है॥

यही दोस्त आज रात इन्डिया पहुच रहा है…सुबह एअरपोर्ट जाना है…..शायद इसीलिये खुश हूँ :) ………………

………………

Sunday, February 8, 2009

एक फ़ोन कॉल और एक बेनामी रिश्ता

“पंकज! उनका कॉल आ रहा है, मैं तुम्हे १० मिनट के बाद फ़ोन करती हूँ…”
“हम्म....ठीक है।”

लेकिन अभी तक ह्रदय में ‘उनका’ शब्द गूंज रहा था. मैं ‘पंकज’ ही रह गया और उसे एक रिश्ते ने ‘उनका’ बना दिया. वही सोंचते सोंचते मैं फ़ोन रखना भूल गया और उसने शायद ‘उनका’ कॉल पिक कर लिया।

“हेलो !!”
मैं कुछ नहीं बोल सकता था क्यूंकि मुझे पता था की ‘वो’ कॉल पर है और मैं उसकी इस नई ज़िन्दगी में कोई परेशानी पैदा नहीं करना चाहता था।

“हेलो !! क्या हुआ? बोलते क्यूँ नहीं..”
इन पंक्तियों में इतना प्यार था, जिन्होंने मेरे एक ‘ब्लू लागून’ और एक बियर के नशे को एकदम गायब कर दिया। मेरा दिल जोर जोर से धड़कने लगा।

“ऐ क्या हुआ??”
मैंने फ़ोन रख दिया। उसको वापस कॉल किया और उसको बताया की लाइन पर ‘वो’ नहीं था ‘मैं’ था…

उसने पहले ‘उनसे’ बात की फिर मुझसे, और मैंने गुस्से में न जाने क्या क्या बोला उसे ?

४ साल पुराना रिश्ता अभी 'बेनाम’ हो चुका था और मेरे पास हमेशा की तरह कहने को कुछ भी नहीं था।