गुलज़ार को चाहने वाले कहते हैं कि गुलज़ारियत एक धर्म है। गुलज़ारियत को फ़ालो करने वाले बडी आसानी से एक दूसरे को समझ लेते है जैसे दोनो ने ही आईने पहन रखे हो। गुलज़ारियन्स के पास बातों की कमी नहीं होती। बातों में गुलज़ार होते हैं और गुलज़ार का सिर्फ होना ही न जाने कितनी बातें और पैदा कर देता है।
कुछ दिन पहले GulzarFans क्लब में मेरी मुलाक़ात एक और गुलज़ारियन से हुई| किसी टॉपिक पर अपनी चंद बातों के साथ मैंने अपनी एक कविता का लिंक भी दिया। उसके बाद मुझे संकल्प का ईमेल आया और उसने अपना कुछ लिखा भी शेयर किया। जबरदस्त लेखन, एकदम गुलज़ारिश टच लिये हुए| बस मैंने उनसे कहा कि दोस्त ब्लॉगिंग की दुनिया में उतरो, हमे भी रेगुलर किक्स मिलती रहेगी।
अच्छा लेखन कन्टेजियस होता है और उसके इन्फ़ेक्शन से बचना नामुमकिन… लेकिन ये इन्फ़ेक्शन एक कैटेलिस्ट के जैसे आपको अच्छा लिखने को प्रेरित करता है… मेरे जैसे लोगो के लिये ऎसी डोज़ेज़ बहुत जरूरी है।
संकल्प शर्मा, जो कि जयपुर के मूल निवासी हैं और पेशे से PricewaterhouseCoopers, गुडगाँव में CA , अपनी एक त्रिवेणी में कहते हैं…
जयपुर
कितना फैला हुआ लगता है ‘पहाड़ी’ से शहर ,
कहीं कहीं रस्सियों सी गहरी काली सड़कें|
एक सिरा पकड़ो तो ज़रा ! ‘‘इसकी गिरहें कस दें ’’
संकल्प से मेरी बात गुलज़ार से शुरु हुई और निदा फ़ाज़ली, बशीर बद्र से होते हुये अहमद फ़राज़ तक पहुँच गयी। मैंने जब इस त्रिवेणी के बारे में उनसे पुछा तो संकल्प ने कहा कि "जब जयपुर में बम ब्लास्ट हुए थे, ये उस वक़्त लिखी थी| उस वक़्त अजाओं में एक डर सा फैला हुआ था बस मन किया कि काश इनकी गिरहें कस सकता… “
उनकी ये त्रिवेणी भी मुझे बेहद पसंद आयी, गौर फ़रमाये :-
अश्क़
यूँ हरारत से बर्फ की तरह पिघली है तेरी याद ,
बूँद बूँद आँखों से टपकी है रात भर ,
दफ्तर से आज फिरसे शायद छुट्टी लेनी पड़े|
मैंने संकल्प से एक फोटो भी मांगी कि मैं उसे यहाँ आप लोगों के साथ शेयर कर सकूँ तो बड़ी ही मोडेस्टी के साथ इन्होने अपनी एक चकमक फोटो भी भेज दी और साथ मे ये नज़्म:-
'आभा'
ज़िन्दगी ,
इस कदर उलझी हुयी शय है ,
के जितना चाहता हूँ ,
समझ लूँ इसको ,
उतने ही उलझ जाते हैं ,
मानी इसके .
ज़िन्दगी ,
इस कदर उलझी हुयी शय है .
मगर तुम बात करती हो ,
तो लफ्ज़न*,
इसके मानी खुलने लगते हैं .
कभी यूँ लगता है जैसे ,
तुम कोई ,
उधेडी हुयी ऊन के गोले को लेकर ,
एक नया स्वेटर बनाती हो .
सुनो ..!!!
कुछ कहना है मुझको !
मुझे भी ,
ज़िन्दगी के कुछ नए पहलू पढ़ा दो ना ,
पढ़ाती हो जैसे ,
रोज़ अपनी क्लास के बच्चों को,
शेक्सपीयर या साइकोलोजी ....
(*शब्दों के द्वारा)
ये नज़्म इन्होने अपने किसी ख़ास मेंटर को डेडीकेट की है, जिसने ज़िन्दगी की बारीकियों को समझने में इनकी बड़ी मदद की है। इस नज़्म के अलावा मुझे इनकी ये कविता भी बहुत खूबसूरत लगी…
एक उदास गुलमोहर
कल शाम हम मिले थे जहां ,
गुलमोहर के पास .
वही गुलमोहर जिसके तले ,
अक्सर मिला करते थे हम .
मैं अब फिर से खड़ा हूँ ,
उसी दरख़्त के करीब ही ,
जहाँ तुने उठा के
अपनी पलकें ,
इस तरह छुड़ाया
कल हाथ अपना ,
जैसे ‘पेन ’ झटक देते हैं
चलते चलते रुक जाए अगर
ना जाने क्यूँ
मुझे उस पल लगा
के वो गुलमोहर
उदास है शायद ….
और अब देखता हूँ तो
वोही गुलमोहर …
एक ही रात में
कितना सुर्ख हो गया है …
लगता है सारी रात
सुलगता ही रहा है
तेरे ख्यालों की बरसात में
जलता ही रहा है ..
मुझे डर है ये कहीं
ख़ुदकुशी ना कर डाले …..
कहिये, है न सारी की सारी जबरदस्त??? :)
मेरा कहना मानते हुए इन्होने अपनी एक साईट भी बना ली है… मैं इनकी सारी नज़्म तो यहाँ शेयर नहीं कर सकता पर आप इन्हें इनकी साईट पर पढ़ सकते हैं नहीं तो कविता कोश से… मुझे उम्मीद है कि आपको इनके ये बेशकीमती मोती पसंद आयेंगे और पसंद आयें तो उन्हें बताना न भूलें… मेरे साथ साथ संकल्प को भी बेहद ख़ुशी होगी|
पूजा के एक ब्लॉग से मैंने इस हिंदी ब्लॉगजगत को जाना था और इसके लिये मैं हमेशा उसका आभारी रहूँगा| 'मेरी नज़र से एक शख्सियत' के जरिये मैं किसी परिचित या अपरिचित शख्सियत को आपसे मिलवाता रहूँगा| ये मेरी तरफ से मेरे पसन्दीदा लोगो को आपसे जोड़ने की एक कोशिश होगी|
जाते जाते -
"कौन कहता है कि हिंदी ब्लॉगिंग में कचरा भरा है,
बस एक दो 'संकल्प' ढूंढ निकालो यारों…"