Showing posts with label डायरी सा कुछ. Show all posts
Showing posts with label डायरी सा कुछ. Show all posts

Wednesday, March 13, 2013

नोट्स…

पीडी


पीडी एयरपोर्ट के बाहर खडा है…

वो हवा में हाथ हिलाता है मैं भी हाथ दिखाकर जवाब देता हूँ… और याद करने की कोशिश करता हूँ कि पीडी से कैसे परिचय हुआ? ब्लॉग से तो हुआ लेकिन कब, ये याद नहीं आता…

पहली मुलाकात याद आती है जब पीडी को गुडगांव आना था। उस सुबह मैं बहुत गहरी नींद में था और सुबह सुबह उसे लेने सेक्टर ४० मार्केट गया। फ़िर हम काफ़ी देर साथ बैठे.. कुछेक कप चाय पी और फ़िर दुनियादारी की कुछ बातें। दूसरी, जब मैं और सागर रिक्शे पर आगे बैठे थे और पीडी को उल्टा पीछे बिठा दिया था। रास्ते भर सागर उसे छेडता रहा.. रात में फ़िर गिटार को छेडा और उसके बाद दोनो भले मानसों ने मिलकर संगीत के रागों को भी जमकर तोडा छेडा..

बहुत पहले जब मैं बॉम्बे में था तब बातों बातों में हमने एक बाईक ट्रिप प्लॉन की थी। कह सकते हैं  मोटरसाईकिल डायरीज की तर्ज पर लेकिन उसका कुछ हो नहीं पाया। इस बार मुझे वीजा इंटरव्यू के लिये चेन्नई जाना था। मैंने दो दिन अपने पास और रख लिये और पीडी से फ़िर बात की। बात सिर्फ़ दो मिनट हुयी। सवाल था दो दिन.. एक बाईक ट्रिप… पांडिचेरी…? जवाब में पीडी हाथ हिला रहा है… मैं फ़िर हाथ उठाकर जवाब देता हूँ…

पांडिचेरी

सुबह से बारिश हो रही थी। चाय पीने के बाद हमने सोच लियाBike था कि भीगते हुये भी जाना हुआ तो जायेंगे। फ़िर बारिश हल्की हुयी… पीडी ने बाईक निकाली और हम निकल पडे सडक पर।

सडक, जिसके साथ साथ समंदर चलता था। समंदर, जिसके साथ साथ आसमान। आसमान, जिसके सहारे बारिश भरे बादल धीमे धीमे लेकिन बढते जाते थे। …और बाईक पर पीछे बैठा मैं, उन बादलो के पीछे बैठे ईश्वर को धन्यवाद देता हूँ कि दुनिया सच में कितनी खूबसूरत है…

 

 

लॉस्ट इन ट्रांसलेशन @चेन्नई

१) उत्तर भारतीयों से इस शहर के काफ़ी किस्से सुने थे। शहर में जाता हूँ तो थोडी देर तो लगता है कि मैं भी Bill Murray साहेब की तरह लॉस्ट इन ट्रांसलेशन हो गया हूँ। भाषा जरूरी चीज़ प्यार में नहीं होती होगी, एक शहर में तो होती है खासकर तब जब आपको एक ऑटो वाले को फ़ोन करके ये कहना होता है कि जहाँ तुमने मुझे छोडा है वहाँ से सीधे सी.सी.डी. के सामने आ जाओ। ५ मिनट मेहनत करता हूँ… हारने पर एक सवाल उस बी़च (Beach) के कुछेक खोमचे वालों की झोली में फ़ेंकता हूँ.. हिंदी? एक भुट्टे वाला मुझे देखता है.. टूटी-फ़ूटी हिंदी में बात करता है मुझसे फ़ोन लेकर उस ऑटो वाले को जो मेरा इंतजार कर रहा है, उसे तमिल में कुछ समझाता है। मुस्कराता है और मुझे फ़ोन दे देता है। ऑटो वाला जबतक उस जगह पहुँचे, वो मेरे लिये भुट्टा भी तैयार कर चुका है… हिंदी में पैसे भी ले चुका है।

 

२) दोपहर में वीज़ा इंटरव्यू है। मेरे टाईम के अल्गोरिदम हमेशा गडबड रहते हैं। पीडी उन्हे सही बिठाने की कोशिश करता है लेकिन रास्ते में ट्रैफ़िक ज्यादा है। फ़िर कन्सलॆट को छावनी बना रखा है। यूट्यूब पर कोई वीडियो आया था, कुछेक आहत लोगों ने यहाँ तोडफ़ोड तो क्या, फ़ोटो खिंचवाने की कोशिश की होगी!… मेन रास्ता बंद है.. काफ़ी घूमकर जाना है। मैं पीडी से जाने को कहता हूँ। ट्रैफ़िक बहुत ज्यादा है… फ़्लाईओवर का एक सिरा वहीं खत्म  होता है। सडक के दूसरी तरफ़ यूएस कन्सोलेट है… मैं वैसे ही लेट हूँ… मुझे एक ही रास्ता दिखता है सडक कैसे भी पार करनी है। जैसे-तैसे आधी दूर पहुँचता हूँ… तब लगता है आगे जाना बहुत मुश्किल है। तभी पीछे से एक आवाज आती है। एक आईसक्रीम वाला काफ़ी कुछ तमिल में और बाकी इशारे से चिल्लाते हुये मुझसे कुछ कह रहा है। मुझे समझ आता है कि सडक क्रॉस करने का कोई रास्ता थोडा और आगे से है… उसे जल्दी जल्दी थैंक्यू बोलता हूँ वो पूरे हक से नाराज होता है… मैं सॉरी बोलकर आगे भागता हूँ… सामने एक सब-वे है… सडक के इस पार से उस पार तक जाने का एक अंडरग्राउंड रास्ता… भागते हुये मन ही मन उस भलमानस को धन्यवाद देते हुये मैं सोचता हूँ कि भाषा सच में इतनी जरूरी है?

Sunday, August 21, 2011

इति श्री रामलीला मैदान कथा…

दिन :- शनिवार, २० अगस्त, २०११

समय: शाम ७ बजे से ११ बजे तक

सीन १ -

वॉलंटीयर्स पूरियां, पानी बांटते हुए। जनता पूरी-पानी खा लेने के बाद पॉलीथीन्स को वहीं फ़ेंकती हुयी। वॉलंटीयर्स और कुछ भले लोग उन्हे वापस कूडेदानों में डालते हुये। मैं सोचता हूँ कि हमें इसी जनता के हाथ में जन-लोकपाल बिल देना है।

सीन २ -

स्टेज पर कोई कुछ भी बोलता हुआ, कोई आरक्षण पर तो कोई सेकुलरिज़्म पर। मुद्दे हाईजैक हो चुके हैं। अन्ना बेचारे चुपचाप लेटे हुए हैं। जनता हर थोडी-थोडी देर में ’वंदे मातरम’ के नारे लगाती हुयी। थोडी-थोडी देर पर देशभक्ति के गाने। आह, मुझे ’भीड’ से डर क्यूं लगता है मैं  उनपर विश्वास क्यों नहीं कर पाता।

सीन ३ -

एक बूढा आंदोलनकारी अपने तरीके से अलग-थलग कुछ मोमबत्तियां जलाये हुए अपनी दुनिया में खोया हुआ है। उसके ऊपर एक खायी पीयी घर की अमीर महिला झुककर ’से चीज़’ का पोज़ देती हुयी। बाकी दो हम - उम्र महिलायें तस्वीरें लेती हुयीं। पहली नज़र में मुझे लगा वो बूढे सज्जन इनके साथ हैं फ़िर अहसास हुआ कि ये तो 'OMG revolutionary. mumma look' वाली आंटिया हैं। कुछेक सभ्य और सेंसिटिव महिलायें लोगों के बैठने के लिये दरों को साफ़ करती हुयी, जोर शोर से देशभक्ति के गाने भी गाती हुयी।

सीन ४ -

’मैं अन्ना हूँ’ टोपी लगाये और बीईंग ह्यूमन लिखी टी-शर्ट पहने एक लडका मुझे अपनी तस्वीर खींचने के लिये कैमरा देता है। मैं एक तस्वीर लेता हूँ। वो कहता है थोडी पास से लीजिये और खुद ही पास वाली रेंज में आ जाता है। मैं एक तस्वीर लेता हूँ। जाने क्यों वो मुझे उस टोपी में एकदम नेहरु जैसा लगता है। मैं उससे मज़ाक करता हूँ कि अन्ना की टोपी में एकदम नेहरू लग रहे हो, वो थैंक्स बोलकर चला जाता है। अभी उसे और एंगल्स से तस्वीरें खिंचवानी हैं। उसे अन्ना की टोपी में नेहरू लगना भाता है। वहीं एक वॉलंटीयर जनलोकपाल और लोकपाल बिल के अन्तर बताने वाला पर्चा बांट रहा है। मैं सिर्फ़ उससे पूछता हूँ कि ये क्या है दोस्त? वो मुझे २ मिनट बहुत जोश से भरी कुछ बातें बताता है। मेरे हाथ आगे बढाने पर वो हाथ मिलाता है और तभी रुकता है। मैं उसे अप्रीशियेट करता हूँ वो मुस्कराता है। उसे खुशी है कि किसी ने उसे अप्रीशियेट किया। मुझे खुशी है कि वो खुश है।

सीन ५ -

भीड में मैं खडा हूँ, कुछ लोग स्टेज़ पर जाने के लिये रास्ता ढूंढ रहे हैं, उनके साथ एक अंग्रेज़ भी है। मैं जिधर खडा हूँ, उसकी दूसरी तरफ़ से स्टेज़ पर जाने का रास्ता है। मैं वहीं देशभक्ति के गानों में इन्वॉल्व हूँ। तभी अरविंद गौड अनाउंस करते हैं कि हमारी क्रांति विदेशों में भी फ़ैल चुकी है और यूके से हमारे साथ एक भाई जुडे हैं जो कुछ कहना चाहते हैं। ३-४ लोग स्टेज पर आते हैं, वो अंग्रेज भी उनके साथ है। अरविंद जी माईक पर धीरे से कहते चले जाते हैं कि हिंदी में बोलियेगा। यूके वाले एन आर आई भाईसाहेब जिनके साथ सबसे बडी बात यही है कि वो एन आर आई हैं। आकर कुछ कहने की कोशिश करते हैं, नहीं कह पाते तो अंग्रेजी में कहते हैं और फ़िर माईक उस अंग्रेज को दे देते हैं। वो कहता है आई लाईक इंडिया, आई लाईक इंडियन पीपल और बाकी सारे खुश होकर वंदे मातरम के नारे लगाते हैं। न्यूज वाले इसी घटना को ऎसे दिखा रहे होंगे कि एक अंग्रेज ने भी इस मुहिम को समर्थन दिया।

सीन ६ -

रामलीला मैदान से वापसी करते हुए नयी दिल्ली मेट्रो स्टेशन पर कुछ लडकों का जत्था ’हम होंगे कामयाब’ गा रहा है। रवि उस तरफ़ खिंचता है। मैं मना करता हूं थोडी खाली जगह भी है उससे कहता हूं वहीं खडे होते हैं। वो उधर ही जाना चाहता है| मैं भी उसका साथ देता हूँ। वो गा रहे हैं, वो नारे लगा रहे हैं। कुछेक लोग उनके पास खडे मुस्करा रहे हैं। मेट्रो आती है। वो पूरा जत्था उसमें घुसने लगता है। अंदर से एक बूढा उतरना चाह रहा है। मैं चिल्लाता हूँ अरे पहले उतरने तो दो। भीड मेरी नहीं सुनती। सब भीतर चले जाते हैं। मैं और रवि बाहर हैं। अंदर जाने को ही होते हैं कि रवि कहता है मेरा मोबाईल तुम्हारे पास है। मैं जेबें टटोलता हूं और ना में सर हिलाता हूँ। वो कहता है कि किसी ने मार लिया यार। बूढा तभी नीचे उतरता है। मैं सॉरी वाली नज़र से उससे आँखे मिलाता हूं। उसकी शर्ट के कुछ बटन्स खुल गये हैं और वो बुदबुदा रहा है जो मुझे एकदम समझ में आता है। मन में मैं भी शायद उन सो-कॉल्ड जोशीले युवाओं को वही सुना रहा हूँ। हम रवि का नोकिया एन ८ ढूंढ रहे हैं। फ़ोन गायब होने के बाद स्विच ऑफ़ हो चुका है। ’अन्ना तुम संघर्ष करो’ की सारी तस्वीरें और वीडियोज उसके साथ ही चले गये। आखिर क्रांति कुर्बानी माँगती है। रवि उदास है। कहता है कल भी आने का मन था अब शायद ना आ पाऊं। मन ही मन वो भी शायद वही बुदबुदा रहा हो।

सीन ७:

मेट्रो में भी हम ’मैं अन्ना हूँ’ वाली टोपी पहने हुये हैं। इसीलिये शायद एक सरदार लडका हमारे पास आता है और पूछता है कि रामलीला मैदान में क्या माहौल है? कुछ देर बात होती है। पता चलता है कि वो हमारे पास के सेक्टर में ही रहता है। बात धीरे धीरे खत्म हो जाती है और हम अलग अलग सीटों पर बैठ जाते हैं। उसे एम.जी. रोड उतरना है। वो उतरने से पहले हमारे पास आता है हाथ मिलाता है फ़िर पूछता है कि आईये, मैंने अपनी कार यहीं पार्क की हुयी है। आपको भी आपके घर ड्रॉप कर दूंगा। हम एक दूसरे को देखते हैं फ़िर उसके साथ उतर जाते हैं। वो हमें घर छोडता है, हमारा नं० लेता है, किसी वीकेंड पर मिलने का वादा भी करता है। हमें समझ नहीं आता कि हम शक्ल से इतने अच्छे थे या ये अन्ना टोपी या ये लडका ही इतना अच्छा है। लडके को ही अच्छा मानते हुये हम दोनो अपने घर चले आते हैं…

Wednesday, July 13, 2011

जो भी हैं बस यही कुछ पल हैं…

छुट्टियों कि उम्र कितनी होती है? मेरी भी खत्म होनी थीं। बस अब जैसे इन तस्वीरों में उनके जीवाश्म बचे हैं ये बताने के लिये ये हुआ था… मेरे ही साथ… कभी। कि ज़िंदगी कुछ पल थमी थी, बारिशों की बूंदो के साथ साथ थोडे सुख बहकर आ गये थे। कि भुने भुट्टों के साथ घर पर बने नमक का स्वाद था। शाम की चाय थी, दहकती बहकती गर्मी थी और रात में बिजली चली जाने पर छत पर कभी कभार बहने वाली ठंडी हवा… एक सारा आकाश (राजेंद्र यादव वाला नहीं) था और उसके तले बस एक चारपाई… एक नया बना कमरा था (जिसे पापा ऑफ़िस के लिये और मैं लायब्रेरी के लिये इस्तेमाल करता हूँ), टेबल फ़ैन था और निर्मल वर्मा द्वारा अनुवादित कुछ चेक साहित्य। कि रात बहुत जल्दी होती थी और दिन भी बहुत जल्दी निकलता था… कि नींद थी और बहुत थी।

कि नैनीताल की एक शाम थी.. कुछ बौराये-पगलाये दोस्त थे… उनके साथ बिताया एक अतीत था जो काँच के गिलासों से छलक आता था। कि कुछ ताश के पत्ते थे… एक दूसरे की बहुत सारी टॉग-खिंचाई थी, कुछ इललॉजिकल बहसें थी और कुछ बेहूदा, बेहद बेहूदा बातें भी।

कभी-कभी, जब ज़िंदगी ऎसी लगती हो जैसे मुँह में एक चम्मच हो और उसपर काँच की एक गोली। सामने एक पूरा सफ़र हो और चलने के साथ साथ काँच की इस गोली को संभालने का एक उत्तरदायित्व। ऎसे किसी छुट्टियों भरे मोड़ पर दोस्त मिलते हैं और जाने क्या क्या गिरता-टूटता है, जाने कहाँ कहाँ का फ़ंसा कचरा बह जाता है। ऎसे वक्त साहिर के ये बोल बरबस याद आ ही जाते हैं कि जो भी हैं बस यही कुछ पल हैं (शब्दों से थोडी छेडछाड के लिये साहिर से माफ़ी आखिर छुट्टियां खत्म हुये अभी दिन ही कितने हुये हैं!)

 

मोबाईल जो मेरी तरह पुराना हो चला है, उसी से ली गयी कुछ तस्वीरें…

 

P090711_08.47P090711_13.19P090711_22.30P100711_14.49P100711_14.49_[01]P100711_18.03_[02]P100711_18.04P100711_12.02

 

और कुछ प्रबल के कैमरे से क्लिक की हुयी…

photo3

Tuesday, November 9, 2010

’ट्रस्ट’ इज ब्लाईंड…

Trust_is_blind कभी कभी मुझे लगता है कि लडकियों का यूं उम्र भर एक पहेली रहना भी ठीक है… उनकी पहेलियों को समझते बूझते ये ज़िंदगी कब गुज़र जाती है शायद पता नहीं चलता वरना ज़िंदगी को यूं कुछ सुलझे हुये सवालों और बहुत ढेर सारी समझदारी के साथ, धीरे धीरे गुज़रते देखना भी बहुत तकलीफ़ देता है… जैसे आपको अपने मरने का दिन और वक्त पता है और आप हर लम्हे एक एक तत्व को अपने आपसे अलग जाते हुये देखते हैं…  जैसे आप किसी पटाखे को जलते हुये देखते हैं… धीरे धीरे पलीते में लगी आग बारूद तक पहुँचती है और उतनी ही धीरे धीरे आपकी आँखें आपके पूरे शरीर के साथ साथ उसके फ़टने का इंतजार करती हैं… फ़टने का इंतजार?…  खुद के फटने का इंतज़ार! अभी… बस अभी।

 

……लेकिन कभी कभी ये सब जानते हुये भी मैं इसे समझना चाहता हूँ। खासकर उस भाग को जहाँ ज़िंदगी ’होकर भी नहीं रहती’। जहाँ एक अधेड उम्र का गंवई इंसान कैंसर की लास्ट स्टेज में होते हुये रोज जीता रहता है और उसके और उसकी पत्नी के सिवा ये सबको पता होता है कि पटाखा फ़टने वाला है… सब पलीते को जलते देखते रहते हैं…  धीरे धीरे…

जहाँ उसकी गंवई पत्नी  आपकी समझदारी पर विश्वास करते हुये किसी डॉक्टर की गंदी हैंडराईटिंग में लिखा दवाईयों का एक पर्चा आपकी तरफ़ बढाती है और पूछती हैं कि इनसे ये ठीक हो जायेंगे न? और तब आप सच और झूठ की परिभाषायों को रिवाईज करना चाहते हैं… ’ठीक’ होने को समझना चाहते हैं… तब आप ज़िंदगी की ऎसी किस्सागोई को समझना चाहते हैं… या समझते हुये भी नहीं समझना चाहते हैं

उसी मरे हुये पर्चे (जिसकी अब कोई जरूरत नहीं) को देखते हुये मुझे याद आता है कि बचपन में मुझे मरना बेहद पसंद था… मुझे मरने में एक रोमांच दिखता था। अपने मुहल्ले के बच्चों के साथ खेले जाने वाले छोटे छोटे नाटकों में मैं मर जाता था और मरकर सबको मेरे लिये रोते देखता था… सबको मुझे ढूंढते देखता था। मुझे लगता था जैसे मेरे ’होने’ से जो नहीं हो सकता था वो मेरे ’न होने’ से हो रहा था और ये मेरे रोमांच को बढाता था।

मैंने ये भी देखा कि किसी ऊँचाई से नीचे देखते हुये मैं कभी ऊँचाई से नहीं डरता था जैसे लोग डरते हैं… मैं ’खुद’ से डरता था क्योंकि ऊँचाई से गिरने के सिर्फ़ एहसास में जो रोमांच था वो मुझे अपनी तरफ़ खींचता था और मैं डरकर पैर पीछे कर लेता था। मेरे आस पास के लोग इसे मेरा ऊँचाई से डरना ही समझते थे जैसे वो मेरे ट्रेन के डर को समझते थे क्योंकि प्लेटफ़ार्म पर जब ट्रेन आती थी, मैं सबसे पीछे खडा पाया जाता था। लोग कभी जान ही नहीं पाते थे कि मैं खुद से डर रहा हूँ… दौडती हुयी ट्रेन मुझे अपनी तरफ़ खींच रही है… और मुझे याद है कुछ सालों बाद जब मेरी समझ भी कुछ साल की हो गयी, तब मुझे यह सोचकर बडा आश्चर्य होता था कि मौत और ज़िंदगी में कौन मौत है और कौन ज़िंदगी… ये जो हम रोज जीते हैं वो ज़िंदगी है या ब्याज पर ली हुयी इन साँसों को यहाँ सौंपने के बाद जब हम कहीं दूर क्षितिज में चले जाते हैं वो ज़िंदगी है…

 

उस पर्चे को हाथ में लिये मैं उन दो क्षितिजों के बीच झूल रहा था… और वो दोनो क्षितिज धीरे धीरे एक दूसरे के पास आ रहे थे… और मैं उन दोनो के बीच फ़ंसता जा रहा था… दवाईयों के नामों से बनी एक अंधी सुरंग में…

’प्यार’ अंधा हो न हो, ’विश्वास’ अक्सर अंधा होता है… ट्रस्ट इज ब्लाईंड…

Sunday, September 12, 2010

एक कॉफ़ी और ढेरों कोरी पर्चियाँ

kuch_to_hai कुछ पात्र जाने कैसे, कब और क्यूं हमारी ज़िंदगी की फिल्म से जुडते चले जाते हैं… हमारी फिल्म? न… ये ’सिर्फ़’ हमारी फ़िल्म तो नहीं…

ये ज़िंदगी एक ऎसी फ़िल्म है जहाँ कोई मुख्य पात्र नहीं… किसी पात्र् की केन्द्रीय भूमिका नहीं। इस भदेस फ़िल्म में हर पात्र के हाथ में एक कैमरा है और हर दृश्य के ढेरों एंगल्स… कभी जाने – अनजाने मैं किसी और के कैमरे में चला जाता हूँ और कभी ना जाने कैसे, कब और क्यूं कुछ जाने-अनजाने पात्र मेरे कैमरे में आ जाते हैं… e.g ये कॉफ़ी…

(ये कॉफ़ी मेरे कैमरे में है या मैं इसके कैमरे में… फ़िलहाल तो ये सिर्फ़ एक सवाल है। )

मैं अक्सर यहाँ इसी तरह अकेले बैठकर कॉफ़ी पीता हूँ… घंटो इस समंदर से कॉफ़ी के मग में चम्मच चलाते हुये एक भंवर का निर्माण करता हूँ और फिर इस भंवर को एक छोटे से सिप के साथ अपने भीतर उतार लेता हूँ। फ़िर एक नयी भंवर और एक नया सिप…। ये सिलसिला तब तक चलता रहता है जब तक भीतर की सारी भंवरें दम नहीं तोड देतीं।

बचपन में नहाने से पहले भी मैं घंटो, पानी भरी बाल्टी में ऎसे ही भंवरें बनाया करता था। फिर उनके साथ क्या करता था वो याद नहीं… चुपचाप नहा ही लेता होऊंगा और बचपन में किया ही क्या जा सकता था। अभी भी क्या ही कर पाता हूँ!!…

 

’हर की पौडी’ की शांति और ओबेराय माल के इस पल की शांति में सिर्फ़ इतना फ़र्क होता है कि वहाँ सन्नाटे में भी जाने कैसी कैसी आवाजें होती हैं और यहाँ सिर्फ़ एक नग्न सन्नाटा… और इस नंगेपन से भीतर की आवाज भी इतना डरती है कि वो निकलती नहीं… भीतर ही कहीं छुपी बैठी रहती है।

मेरा इस वक्त यहाँ आना भी एक नयी आदत बनती जा रही है… फ़िल्म में यह सीन कुछ ज्यादा ही बार होने के कारण सीन और इस सीन के संवाद रट गये हैं। मसलन जब भी यहाँ आता हूं, समय यही होता है मतलब रात ’आधी’ बस होने ही वाली होती है… और हर बार पूछता भी यही हूँ कि शॉप कब तक ओपेन है? - ११:३०… फ़िर हमेशा की तरह एक ’कैफ़े मोका’ आर्डर करके सारी खाली जगहों में से किसी एक खाली जगह पर बैठ जाता हूँ जहाँ से खालीपन भरा भरा लगे… बहुत सारा उन खाली सोफ़ों का और थोडा बहुत मेरा भी। फ़िर एक पेन और पेपर माँगकर अक्सर ही उस अनप्रिंटेड बिल के पेपर पर कुछ लिखना… (जो शायद उस मशीन में छप जाते तो किसी और के नाम के बिल होते… अभी वो कोरे हैं और मेरे कैमरे के एंगल के अधीन। )

पहले टिशू पेपर पर भी लिख देता था… अब उसपर नहीं लिखता… उस उजले पेपर पर मेरे शब्द किसी दाग जैसे प्रतीत होते थे और उन्हे देख मैं अक्सर सोच में पड जाता था कि मेरे शरीर के दागों से भी शायद किसी के शब्द झलकते होंगे… फ़िर मस्तिष्क में एक तिलिस्मी भंवर बनती जाती थी कि ’किसके शब्द’…  ’किसकेएएएएएए शअअअअब्द’… और मैं तब देर तक कॉफ़ी को हिलाता रहता था।

 

 

लखनऊ में इन दौडते-भागते लोगों से सिर्फ़ चिढ थी… बॉम्बे में ये नफ़रत बनती जा रही है। मानव की कहानी का हंसा मुझे बडा हांट करता है।

जब से वह पैदा हुआ है तब से वह व्यस्त है। उसने कभी किसी भी काम के लिए किसी को भी मना नहीं किया सो वह दूसरों के काम करने में हमेशा व्यस्त रहता था। जो लोग उसे जानते थे वह उससे अपना काम करने को नहीं कहते थे.. वह उसके बदले ’एक ज़रुरी काम की पर्ची..’ उसकी जेब में डाल देते थे, जिसे वह समय रहते पूरा करता चलता था। उसके पास एक जेब की कई सारी शर्टे थी... दो जेब वाली शर्ट पहनने से वह घबराता था। मैंने उससे एक बार कहा था कि तुम बिना जेब की शर्ट पहना करो... तो उसने कहा कि काम की पर्चे वह हाथ में नहीं रखना चाहता है... काम के पर्चे पैंट की जेब में मुड़ जाते हैं... फिर क्या काम करना है ठीक से समझ में नहीं आता है। वह अपने घर के कामों की भी पर्चियाँ बनाकर जेब में रख लेता। अपने काम भी वह बाक़ी ज़रुरी कामों की तरह करता... समय रहते। इन पर्चियों के बीच उसका एक खेल भी था... एक दिन उसने मुझसे कहा था कि वह कई बार कोरी पर्चियाँ अपनी जेब में, किसी महत्वपूर्ण काम की तरह रख लेता... जब वह कोई महत्वपूर्ण काम के लिए कोई कोरी पर्चि निकालता तो खुश हो जाता... वह उस महत्वपूर्ण काम के समय... कुछ भी नहीं करता... और उसे यह बहुत अच्छा लगता था। काम के वक्त काम नहीं करने की आज़ादी बहुत बड़ी आज़ादी थी।

इन दौडते भागते लोगों में मुझे एक व्यस्त हंसा दिखता है… जेब से एक के बाद एक पर्चियां निकालता हुआ और बस उन्हें एक के बाद एक  निपटाता हुआ…

…मन करता है इन सब दौडते-भागते लोगों की  जेबों में ढेरों ‘कोरी पर्चियां’ भर दूँ॥

Wednesday, September 8, 2010

जाने कैसी कैसी आवाजें!

’इनएक्सेसिबिल’

वो अपनी सीट पर बैठने से पहले सीधे मेरी आँखों में एकटक देखती है। उसके यूँ देखने से मुझे अहसास होता है कि मैं भी पिछले कुछ मिनट से शायद उसे ही देख रहा हूँ। अनायास ही मेरे भीतर से एक बहुत दबा हुआ सा ’हेलो’ निकलता है जो दबे दबे उस तक पहुँच जाता है। वो भी मुझे ’हेलो’ बोलती है और उसकी आँखे मेरे अगली बात सुनने के लिये तैयार दिखती हैं। पर उस वक्त मेरी बातूनी बातें मेरा साथ नहीं देतीं और मैं वापस अपनी बॉम्बे टु दिल्ली फ़्लाईट की गोल खिडकी वाली सीट से बाहर के गोल गोल दृश्यों को देखने में लग जाता हूँ।

मेरी एक दोस्त मुझसे हमेशा कहती है कि अगर मुझे किसी एक शब्द में डिफ़ाईन करना हो तो वो होगा ’इनएक्सेसिबिल’। मैं उस गोल खिडकी के बाहर देखता हुआ यही सोचता हूँ कि शायद ये भी वही सोच रही हो।

खैर… दिल्ली उतरने से पहले इस अधेड उम्र की महिला से कुछ बातें हो ही जाती हैं जिनमें से अधिकतर मेरे बैग और लैपटॉप के ब्रांड, मेरे विदेश जाने की संभावनायें, मेरा वेतनमान और छोटे शहरों से बॉम्बे आये लोगों के इर्द गिर्द ही घूमती हैं।

फ़्लाईट से उतरते ही हम दोनो भीड का एक हिस्सा बन जाते हैं।

निशांत मुझसे पहले एयरपोर्ट पहुँच चुका है करीबन २ साल बाद उसे देख रहा हूँ। हम दोनो पवन के फ़्लैट के लिये रवाना होते हैं…

और मेरे जेहन में अभी भी उस महिला की कही कुछ बातें हैं और एक दुविधा भी है कि उनमें शो-ऑफ़ ज्यादा था या स्नाबरी ……या मेरा ’इनएक्सेसिबिल’ रहना ही ज्यादा अच्छा है…


काम का जिक्र करो!

पवन के ही फ़्लैट पर विराग से मिलता हूँ। उसमें अभी भी उन बातों के लिये एक जोश है जिन्हे मैं न जाने कबसे नकार चुका हूँ। वो कहता है कि उसकी पूरी टीम के पास एलसीडी मॉनीटर तक नहीं लेकिन उसकी डेस्क पर एलसीडी के साथ साथ एक लैपटॉप एक्स्ट्रा पडा हुआ है। वो अब काफी आर्गेनाईज्ड लगता है। जरूरत की सारी चीजें उसके पास हैं और उन चीजों की सारी जरूरतें भी। वो कहता है कि ’काम की फ़िक्र मत करो, काम का जिक्र करो’।

पहली बार में तो मैं बुद्धिजीवी बनने की कोशिश के तहत उसे सुनाता हूँ लेकिन बाद में उसकी कही यही बात मुझे बहुत जमीनी लगती है। मैने काम की बहुत फ़िक्र तो नहीं की लेकिन ’खुद’ को तलाशते तलाशते, उसका जिक्र करना कहीं छूट गया। जरूरतें भी छूटती गयीं और धीरे धीरे चीजें भी…

वैसे फ़िक्र का जिक्र करना भी कहाँ बुरा है या जिक्र की फ़िक्र करना… (कुछ नहीं दिमाग पर चढी कुछ जिक्रों-फ़िक्रों का असर है… आप इसे अन्यथा न लें।)


जाने कैसी कैसी आवाजें

अभी तक गंगा जी के लिये लोग गा रहे थे, अब उनकी आरती खत्म होने के बाद गंगा खुद गा रही हैं। पवन एकदम शांत सा मेरे साथ गंगा जी में पैर डाले बैठा है। हम दोनो के बीच कुछ आवाजें इधर उधर से अपनी जगह बनाकर आ जा रही हैं… गंगा के तेज बहने की आवाजें हैं… बगल में एक पिता अपने पुत्र को घाट से लगी जंजीर पकडकर डुबकी लगाने को कह रहा है… एक असफ़ल प्रयास के बाद लडका डुबकी लगा लेता है… उसकी एक असफ़ल और एक सफ़ल डुबकी की आवाज है… दोनो आवाजें लगभग एक जैसी ही हैं। कुछ महिलायें गिलसिया भर दूध गंगा में डालने को कह रही हैं… उनके कहने की आवाज भी है और दूध की धार के गंगा में गिरने की भी आवाज। कुछ लोग पानी मे सिक्के डाल रहे हैं तो कुछ मैले कुचेले कपडे पहने लडके पानी में डाले गये सिक्कों को खींचने के लिये चुंबक फ़ेंक रहे हैं। सिक्कों में भरी हुयी श्रद्धा की भी आवाज है और डोरो से बंधे उन चुंबको में मजबूरी की भी एक आवाज। एक बच्चा एक दिये को पानी में बहा रहा है। छोटा और नासमझ है इसीलिये दिये को गंगा जी की धार की विपरीत दिशा में बहाने की कोशिश कर रहा है… उम्मीदों का वह दिया परेशान सा है कि डोरी और चुंबक लिये वो मैले कुचेले कपडो वाला लडका उस दिये को हल्का हाथ लगाकर नदी के बहाव के साथ बहा देता है। नासमझ बच्चे की उम्मीदों को राह मिल गयी है और शायद ज़िंदगी के लिये एक सबक भी। उस नासमझ बच्चे की खुशी की भी आवाज है और उस समझदार लडके के समझदारी की भी…

हमारे पीछे ही दो-तीन लोगो ने भजन कीर्तन शुरु किया है… मैं उठकर उनके पास चला जाता हूँ… पवन अभी वहीं गंगा जी में पैर डाले बैठा है… कीर्तन में लोग बढने लगे हैं… उन सबके बढने की भी आवाजे हैं और उनके गाने की भी आवाजे हैं। मैं रिकार्ड करने की कोशिश करता हूँ लेकिन मोबाईल धोखा दे जाता है… मैं वापस पवन के पास आकर बैठ जाता हूँ। गंगा के बहने की एक आवाज है… और हमारे कुछ ना कहने की भी एक आवाज…

ट्रेन का टाईम हो गया है। दोनो वहाँ से ऎसे उठते हैं जैसे मन न भरा हो और रेलवे स्टेशन की तरफ़ चल पडते हैं। हमारे चलने की भी आवाज है और हमारे मन के वहीं रह जाने की भी एक आवाज…