हे आधुनिक कवि!
जिस पल तुम परेशान होकर
’क्या कविता लिखूँ’ कि उधेड़बुन में
अपनी शर्ट की सिवन के साथ खेलते रहते हो…
उस एक पल ही, न जाने कितनी कविताओं
के पोशाकों की सिवन उधेड़ी जा रही होती है…
उस एक पल ही, किसी दुनिया में कविताओं
पर थोपी जा रही होती है वस्त्रहरण की परम्परायें
और कहीं बिना परम्पराओं के ही
किये जा रहे होते हैं वस्त्रहरण…
हे आधुनिक कवि!
जिस पल अपने लैपटाप पर कविता को टाईप करना
शुरु कर चुके होते हो तुम,
उसी पल न जाने कितनी कवितायेँ शोषित हो रही होती हैं,
उनके ही घर में… उनके ही लैपटाप पर शायद…
उनके निर्माण से ही शुरु हो जाता है उनका धीरे धीरे जलना,
फ़िर जैसे एक तीली से पूरी माचिस ही जला दी जाती है
अरे नहीं!! जलाना आधुनिक कहाँ रहा…
कवितायेँ तो आज मार दी जाती हैं खुलेआम
तुम्हारे समाज की हथेलियों में फंसाकर…
और मच्छ्ररों के लिये बाजार से स्प्रे ले आते हैं…
हे आधुनिक कवि!
जैसे ही तुम्हें लगता है कि तुमने
एक नयी कविता का सृजन कर डाला है,
कई नयी कवितायेँ भ्रूण में ही मार दी जाती हैं।
और जब तुम अपने नग्न विचारो में तलाशते हो
अपनी कविता के आधुनिक नाम…
नग्न नामों से बुलाया जा रहा होता है उन्हे
तुम्हारे कमरे की खिड़की से दिखते हुये ’किसी भी घर’ में…
हे आधुनिक कवि!
तुम जैसे ही अपनी कविता को पोस्ट करके
छटपटाते हो चन्द टिप्पणियो के लिये,
न जाने कितनी कविताओं का
झूठा पोस्टमार्टम हो रहा होता है,
… और उन्हे छटपटाने भी नहीं देता तुम्हारा ये समाज॥
हे आधुनिक कवि!
तुम कविता लिखना बंद क्यूँ नहीं कर देते??