Friday, May 28, 2010

हे आधुनिक कवि!!

हे आधुनिक कवि!  confusion
जिस पल तुम परेशान होकर
’क्या कविता लिखूँ’ कि उधेड़बुन में
अपनी शर्ट की सिवन के साथ खेलते रहते हो…
उस एक पल ही, न जाने कितनी कविताओं
के पोशाकों की सिवन उधेड़ी जा रही होती है…
उस एक पल ही, किसी दुनिया में कविताओं
पर थोपी जा रही होती है वस्त्रहरण की परम्परायें
और कहीं बिना परम्पराओं के ही
किये जा रहे होते हैं वस्त्रहरण…

 

हे आधुनिक कवि!
जिस पल अपने लैपटाप पर कविता को टाईप करना
शुरु कर चुके होते हो तुम,
उसी पल न जाने कितनी कवितायेँ शोषित हो रही होती हैं,
उनके ही घर में… उनके ही लैपटाप पर शायद…
उनके निर्माण से ही शुरु हो जाता है उनका धीरे धीरे जलना,
फ़िर जैसे एक तीली से पूरी माचिस ही जला दी जाती है
अरे नहीं!! जलाना आधुनिक कहाँ रहा…
कवितायेँ तो आज मार दी जाती हैं खुलेआम
तुम्हारे समाज की हथेलियों में फंसाकर…
और मच्छ्ररों के लिये बाजार से स्प्रे ले आते हैं…

 

हे आधुनिक कवि!
जैसे ही तुम्हें लगता है कि तुमने
एक नयी कविता का सृजन कर डाला है,
कई नयी कवितायेँ भ्रूण में ही मार दी जाती हैं।
और जब तुम अपने नग्न विचारो में तलाशते हो
अपनी कविता के आधुनिक नाम…
नग्न नामों से बुलाया जा रहा होता है उन्हे
तुम्हारे कमरे की खिड़की से दिखते हुये ’किसी भी घर’ में…

 

हे आधुनिक कवि!
तुम जैसे ही अपनी कविता को पोस्ट करके
छटपटाते हो चन्द टिप्पणियो के लिये,
न जाने कितनी कविताओं का
झूठा पोस्टमार्टम हो रहा होता है,
… और उन्हे छटपटाने भी नहीं देता तुम्हारा ये समाज॥

 

हे आधुनिक कवि!
तुम कविता लिखना बंद क्यूँ नहीं कर देते??

 


    *अंजलि  और कई ऐसी बेनामियों को समर्पित…

Wednesday, May 26, 2010

इक अकेली शाम…

gg वो  शाम  को  एक  दूध  की  बाल्टी  लेकर  दूध लेने निकल  जाता  है  और  उस  अकेली  शाम  उस  अकेले  घर  में  माँ,  अकेले अकेले, उनके दूध लाने का  इंतज़ार  करती  है…


उस मोहल्ले की एक  गली  की उस  अकेली  दूध  की  दूकान  के  पास  एक  कच्छे  बनियान  की  दूकान  है... उस  बाप  का  कोई  दोस्त  वहाँ  अकेला  बैठता  है.. कभी  दोनों  दोस्त  थे,  अभी  अकेले  है और बाप भी... उसका  इकलौता बेटा  बॉम्बे  की  किसी  MNC में  काम  करता  है  और  दोस्त  का इकलौता बेटा नोएडा  के  किसी  बेनामी  कॉलेज  में  कोई  बेनामी  प्रोफेशनल  कोर्स …


ताज़ा  दूध  आने  में  अभी  वक़्त  है.. रोज़  की  तरह  दोनों  साथ  साथ  अकेली अकेली  चाय  पीते  हैं…


अकेले  घर  में  माँ, उनका  इंतज़ार  करते  हुए अकेले चाय  पी  रही  है  और  निगाहें  बाहर  वाले  लोहे  के अकेले दरवाजे  पर  एक  नॉक  सुनना  चाहती  हैं… उसकी  निगाहें  सुनती  हैं  आजकल… आँखों  पर  पॉवर  वाला  चश्मा  है  जो  बेटे  ने  लगवाया  था… उसकी  उम्र  में  आँखें  कम  देख  पाती  हैं... सो अब वो  उनसे  सुनने  लगी  है…


बाप  का  वही  अकेला  दोस्त  है… दोनों  की  बातें  भी  अकेली  हैं... बाप  ने  अपने  वंश  में  सबसे  ज्यादा  पढाई  की  थी... वो  ला(law) ग्रेजुएट है   और  बेटा…  मास्टर्स… मास्टर्स  इन  कंप्यूटर  अप्लिकेशन्स... भूलती उम्र के साथ बाप  को  ला(law) भी अब  हलकी  हलकी  भूलने  लगी  है… दोस्त  से  वो  कंप्यूटर  कि  बातें  करता  है... MCA की  बातें  करता  है... सेमेस्टर  की  बातें  करता  है… बॉम्बे  की  बातें  करता  है… ये  बातें  उसके  बेटे  ने  उसे  फोन  से  बतायी  हैं… थोड़ी  बहुत… बाकी  तो  वो  उन  सुनते  हुये कानो  से  देख  लेता  है.... उसके  कान अब देखते  हैं... उसका  पॉवर  का  चश्मा  उसके  बेटे ने नहीं, उसने ही बनवाया है.....


अकेली  माँ , बाप  और  दूध  की  बाल्टी  के  इंतज़ार  में  सुबह का बासी अखबार पढ़ती  है... 'सहेली' वाला  पेज  भी  रोज़  नहीं  आता… वो  कुछ  पन्ने  पलटकर  उसे  पुराने  अखबारों  के  बीच  रख  देती  है... अकेला  अखबार  अब  अकेला  नहीं  रहता... माँ  फिर  अकेली  है... सोंचती   है  कि सारे  अखबार  एक  साथ  बहुत  ज्यादा  हो  रहे  हैं , किसी  रद्दी वाले  को  बेचने  पड़ेंगे... आते  ही  इनसे  कहेगी  कि  जो  अखबार  रखने  हो  उन्हें  अलग  कर  दें... (रद्दियाँ  हमेशा  साथ  जाती  हैं... अच्छे  अखबार  अलग  अलग , अकेले  घर में ही कहीं खो जाते हैं...)


इंतज़ार  पूरा  होता  है... दूध  के  आने  का...  बाप  की  अधूरी  सुनी  बातों  को  पूरा  कहने  का... दोस्त  की  दूकान  बंद  करने  का... अकेले  लोहे वाले दरवाजे पर एक नॉक का... माँ का... और रात  का... शाम  ढल  चुकी  है...

अब दोनो उस घर मे साथ साथ अकेले अकेले है…

“सुबह कैलेन्डर भी बदलना है…?” (माँ रद्दियो की बात रोज की तरह भूल जाती है)

“ह्म्म…”