कहने को तो वो हमेशा मुझसे पहले ही उठता है लेकिन हमेशा ही उस एक वाश बेसिन के लिए हम दोनों फाइट करते हैं... फिर एक ही मिरर में डिफ़रेंट डिफ़रेंट एक्सप्रेशंस लाते हुए ब्रश करते हैं... मैं अपने बढ़ते हुए बालों को देखकर खुश होता हूँ… पोनी टेल रखने की ख्वाहिश आलमोस्ट पूरी होती दिखती है.. और दिन, उसे इससे कोई मतलब नहीं.. वो तो हर पल बस गुज़रता जाता है...
घर से बाहर निकलता हूँ... मोबाइल पर टाइम देखता हूँ... रोज़ की तरह 'लेट' हूँ... सब कुछ इस कमीने दिन की वजह से... क्या बिगड़ जाता अगर वो मेरे उठने के बाद उठता... थोडा सा मुझसे पीछे चलता तो क्या वो छोटा हो जाता... भरपाई करने के लिए ऑटो में बैठता हूँ.. सदियों से बोरीवली से गोरेगांव की बस नहीं पकड़ी है... एक आत्म चिंतन जरूरी सा लगता है.. रोज़ रोज़ एक तरफ के ये 60-70 रुपये बहुत भारी हैं...
बाइक खरीद लेता हूँ... पर अच्छे से चलानी नहीं आती.. कार... नहीं , पहले से काफी चीज़ें प्रायरटाइज़ हैं...वो ज्यादा जरूरी हैं ... एक अच्छी साइकिल ले लेता हूँ... पर ये गर्मी... ऑफिस जाकर फिर से नहाना पड़ेगा ...
"साहेब ब्रिज के ऊपर से या नीचे से..."
हब माल आ गया है...
"नीचे से.. राईट साइड में रोक दीजिये..."
रिक्शा से उतरता हूँ... सोंचता हूँ कि कल घर से और जल्दी निकलूंगा... सारे घोड़ागाड़ी के ख्याल फुस्स हो चुके हैं...
ऑफिस आकर बैठता हूँ... सिस्टम अनलाक करता हूँ और अपने मूड को बूट मारता हूँ... मेरी मूड मशीन न जाने किस जमाने का प्रोसेसर यूज करती है… ये बूट होने में बड़ा टाइम लेती है और जब तक ये बूट नहीं होती मेरा किसी से बात करने का मन नहीं करता...
cubicle में एक ख़ामोशी है... शायद सब मेल चेक कर रहे हैं...
और मैं ये टाइप कर रहा हूँ... मूड अभी भी बूट हो रहा है...
टाइटिल डाक्टर अनुराग की एक नज्म से बिना पूछे उठाया हुआ :)