'सच' क्या होता है? कैसा दीखता है 'सच'?
कश्मीर के बदलते हालातों पर सन्डे टाइम्स की स्पेशल रिपोर्ट है 'डेस्परेट हाउसवाइफ़्स'.. वो पढ़ता हूँ.. रोते बिलखते चेहरे हैं.. सलवार कमीज में पत्थर फेंकती औरते हैं... मेरा नजरिया बनने वाला ही होता है कि गौतम भाई की पोस्ट पढ़ता हूँ.. 'भारतीय कुत्तों वापस जाओ' के नारे हैं... पत्थर खाते पुलिसवाले हैं... फूटे सर पर हैंडीप्लास्ट लगाये भीड़ के सामने खड़ा एसपी है... सच बैलेंस्ड होता लगता है कि फिर शायदा जी की पोस्ट पढ़ता हूँ और कहीं गहरे, इक अनजान अँधेरे में डूबता जाता हूँ.... एक जबरदस्त तलब होती है छोडी हुयी सिगरेट को अंगीकार करने की..
इस दुनिया में सच की भी पोलिशिंग होती है..
क्या कोई दुनिया है इन सब सहमति- असहमति, वादों -विवादों के परे, जहाँ सच सिर्फ 'सच' होते हों?
P.S. कुछ दिनों में पहलगाम- पटनीटोप- कटरा जाना है... जम्मू – कश्मीर की वादियों के सच को अपनी आँखों से महसूस करना चाहता हूँ... लेकिन तब तक वादियों में सच बचेगा... ...वादियाँ खुद बचेंगी? मेरा जाना बचेगा?
कमबख्त ये सब लिखते लिखते सिगरेट की तलब भी भीतर से ऊपर और ऊपर चढती जाती है वैसे ही जैसे आज के दिन ये सारे सच मेरे ऊपर बहुत ऊपर चढकर बैठे हैं… ॥