Thursday, June 10, 2010

वो लोग जो पहाड़ हैं…

वो हमारी कम्पनी का फ़ेस है… कम्पनी का मेन गेट खोलिये और दीवार पर लगे कम्पनी के एक बड़े लोगो(Logo) के साथ साथ, कानों में हेडसेट लगाये हुये उसकी मुस्कुराहट आपका स्वागत करती है। हमारी कम्पनी की सारी इनकमिंग और आउटगोइंग कॉल्स भी बिना उसकी इजाजत के कहीं कनेक्ट नहीं होतीं…

अभी एक हफ़्ते पहले ही एक ईमेल ब्राडकास्ट आया कि उसके शौहर इस दुनिया में नही रहे… पढते ही जैसे सब कुछ एक पल के लिये  रुका था और फ़िर से उसी स्पीड से चलने लगा था। जो भी हुआ था उसकी गवाही देने के लिये फ़्रीज हुआ सिर्फ़ वो एक पल था जो इन दो-तीन दिन में आये असंख्य पलों में खो गया था। बस इतना ही हुआ था…

परसों से वो फ़िर से हमारा फ़ेस बन गयी है। मुस्कराहट शायद थोड़ी  फ़ीकी है पर सारी कॉल्स वैसे ही कनेक्ट होती हैं।

दो दिन से मैं न उससे कुछ कह पाया था और न कुछ पूछ पाया था। सिर्फ़ ’सो सैड’ कहना मुझे आया नहीं और उन दो दिनों में जब भी अपनी निगाहें मिलीं मेरा सर एक आटोमैटिक मशीन की मानिंद नीचे झुक गया… बोलने को कुछ ढूंढा तो साले शब्द भी सर झुकाये कहीं कोने में घुसे मिले…

आज सुबह जल्दी ही ऑफिस चला गया था। अपनी फिंगर,  ’स्वाईप मशीन’ में स्वाईप करने के बाद जैसे ही दरवाजा खोला वो सामने थी… निगाहें मिलीं…  उसने ’हैलो’ बोला… मैने उसका हाल चाल पूछा…

उससे पता चला कि उसके पति को काफ़ी पहले से कैंसर था और उसके सास-ससुर मेडिकल ट्रीटमेन्ट को छोड़कर ब्लैक मैजिक में ज्यादा विश्वास रखते थे।  इसके जबरदस्ती करने पर ऑपरेशन  तो करवाया गया लेकिन बाद में कीमोथेरेपी में लापरवाही दिखायी जाने लगी और ओझाओं -तांत्रिकों पर ज्यादा विश्वास किया जाने लगा। उसकी हालत दिन पर दिन बिगड़ने लगी थी और वो ये सब देख पाने में असमर्थ थी। अपनी आँखों के सामने अपने ही शौहर को तिल तिल मरते देखना बहुत ही मुश्किल था। इनफ़ेक्शन दिमाग तक फ़ैल रहा था। वो सबसे लड़ -झगड़ कर फ़िर से उसे लेकर किसी बड़े  न्यूरोसर्जन के पास गयी। न्यूरोसर्जन ने देखते ही हालात का अंदाज़ा कर लिया था:

- …… Go back to your Cancer Doctor

- OK…… any idea how much time he has now?

- To be honest, 4-5 months.

ये कहते कहते उसकी पलकें गीली हो चुकी थीं और आँखें एकदम लाल।

- पता है पंकज, मैं उसे घुट घुट कर मरता नहीं देख सकती थी। वो घर मुझे काटने लगा था इसलिये मैं अपने मम्मी-पापा के पास चली आयी और बेबी को भी ले आयी। हर वीकेंड उससे मिलने जाती थी  तो सास-ससुर मुझे खूब सुनाते थे लेकिन तब भी जाती थी… बेबी को भी ले जाती थी…कि तीनो इन लास्ट मूमेन्ट्स में  थोड़ा साथ रह लेंगे … शायद उसे अच्छा लगेगा… पर  एक दिन मेरी सास ने बोला कि ’तू निकाहनामे के लिये आती है न? जा नहीं देंगे  तेरा निकाहनामा… हराम की औलाद कहलायेगा न? हराम की औलाद है तो कहलाना ही चाहिये!!…’

उसकी गीली और लाल आँखों पर लगा स्पेक्स भी लाल होता जा रहा था… वो अपने दुपट्टे के किनारे से आंसू पोंछती  जा रही थी और उसी बीच कॉल्स भी आ रहे थे और इंटरव्यू  देने के लिये लोग भी… कम्बख्त कुछ भी नही थमता था…

- पता है वो हमेशा अज़ान के वक्त प्रेयर करना चाहता था लेकिन हम कभी इतनी सवेरे उठ नही पाते थे। मैने २-३ वीक्स से उसके घर जाना छोड़ दिया था। क्या कर सकती थी? उसे ऎसे मरते हुये नहीं देखा जाता था… पता है मैं उसे मिस नहीं करती इवेन मुझे खुशी होती है कि वो चला गया। वो बहुत तकलीफ़ में था… और मैं चाहती थी कि उसे कोई तकलीफ़ न हो…

- पता है सुबह की अज़ान के वक्त ही……  शायद, वो जाते जाते प्रेयर कर पाया……

 

कॉल्स अभी भी आ रहे थे और इंटरव्यू के लिये लोगों की भीड़ भी बढती जा रही थी… मै उससे ’बाय’ करके अपने क्यूबिकल की ओर बढ रहा था और पीछे इंटरव्यू के लिये आये लोगों  को नियंत्रित  करती, उसकी आवाज़ आ रही थी:

- Kindly take your seats. HR people will be coming in a while…

 

सच में वो लड़की नहीं पहाड़ है…  

 

*नानावती हॉस्पिटल ओपीडी मे लिखी

Monday, June 7, 2010

राजनीति – मेरी नज़र से

poster-1 किसी फ्लॉप मूवी का एक डायलाग था कि यूपी-बिहार में हर घर में एक आईएएस, एक नेता और एक गुंडा होता है… मुझे ये कथन बड़ा जमीनी लगता है।

मेरे बाबा एक स्वतंत्रता सेनानी थे और एक कट्टर कांग्रेसी। मुझे याद है बचपन मे वो मुझे आजादी की लड़ाई के किस्से सुनाया करते थे और मैं उनकी बोर बातों से दूर भागता था। अभी अपनी सोंच बन भी न पायी थी कि पता चला था कि पापा और चाचा किसी चुनाव में बीजेपी को वोट देकर आये थे और हमें  ये बात बाबा को नहीं बतानी थी। राजनीति को बाबा, पापा और चाचा की नज़र से ही देखता था। जब तक बाबा जिंदा रहे कांग्रेस के नाम से घर में हल्ला मचा देते थे। उनके जाने के बाद घर में कई बार ऎसा भी हुआ कि पापा बीजेपी को वोट देते थे और चाचा सपा को और कई बार घर के आठ वोट एक जगह पर भी गिरते थे।

इस मुद्दे पर मेरी समझ अभी भी नहीं  बन पायी है। कुछ साल पहले जब लखनऊ में भविष्य की  दिशाओं की खोज कर रहा था, तब अटल जी से जरूर प्रभावित था। कुछ समय ’विद्यार्थी निवास’ में रहा भी, जहाँ रहकर अटल जी ने कभी अपने पिता जी के साथ एक ही कक्षा मे वकालत(Law) की पढाई की थी। उनको कुछेक पत्र भी लिखे और इन बातों पर कई बार मित्रों के बीच हंसी का पात्र भी बना। एक बार राउरकेला में एक पर्सनालिटी डेवलपमेन्ट क्लास के दौरान काउंसलर ने क्लास से पूछा कि आपमें से कितनों में  लीडरशिप क्वालिटीज़ है? कितने लोगो को लगता है कि वो लीड कर सकते हैं? मेरा हाथ तुरंत हवा में उठ गया। मै सबसे आगे वाली पंक्ति में था। आस-पास देखा… फ़िर पीछे घूमकर देखा तो सिर्फ़ मेरा हाथ ही हवा में था…

गुजरात में  दंगे  हुये… नये चुनाव हुये… अटल जी अपनी बातों पर अटल नहीं रह पाये… बीजेपी एक लीडरशिप क्राईसिस में दिखी… यूपी में पुराने नेता रद्दियो में बदलते गये और नया कुछ वो ढूढ नहीं  पाये… कुछ ने ’उत्तम प्रदेश’ के सपने भी दिखाये लेकिन साइकिलों के पहियों में ही खो गये… जनसँख्या पर ध्यान देने की बजाय मूर्तियो की संख्या पर नेताओं का ध्यान ज्यादा दिखा… और इन सबने मुझे दूर, बहुत दूर कर दिया। …… अब अगर वो काउंसलर वो सवाल फ़िर से पूछेगी, वो अकेला हाथ भी उसे खड़ा  नही दिखेगा।

 

अभी अभी ’राजनीति’ देखकर लौटा हूँ… कुर्ते-पायजामे से डेनिम-नोन डेनिम पहने हुये  पात्रों को ’सिर्फ़’ राजनीति करते हुये देखा। भीड़ों को भटकते हुये देखा और इन पात्रों को उन भीड़ों को बरगलाते हुये। सबको उस ’कुर्सी’ तक पहुचने के रास्ते तलाशते देखा और उस कुर्सी के बाद एक डेड एन्ड को भी…

इस फ़िल्म ने राजनीतिक गलियारो में घुसते हुये  जो कहानियां दिखायीं, उन्हें  देखकर युवाओं के गंदी राजनीति में जाने के सपने को चोट ही लगनी चाहिये। सच्चाई कड़वी होती है और मै अभी इस कड़वेपन को महसूस कर रहा हूँ…

फ़िल्मी लिहाज से मूवी ने अंत  के कुछ पहले तक बांधे  रखा और अंत में जैसे अपनी ग्रिप छोड़ती नज़र आयी। इंटरवल तक कहानी में एक कसावट थी जिसे मैंने अपने आस पास भी महसूस किया। इंटरवल के बाद की कहानी ओबवियस होती गयी और अंत बेहद फ़िल्मी… फ़र्स्ट हाफ़ तक कहानी महाभारत जैसी लगती रही… सेकन्ड हाफ़ मे जबरदस्ती इसे महाभारत बनाने की कोशिश सी दिखी… कहानी मे काफ़ी कुछ परोसकर रखने के बजाय, बिटवीन द लाईन्स भी छोड़ा जा सकता था… अंत में बचे हुये मोहरों  के बीच करवाया गया युद्ध, महाभारत युद्ध कम और गैंगस्टर वार ज्यादा लगा और उस वक्त समर के हाथ मे दी गयी पिस्टल, एक इंटेलीजेंट पात्र को बेहद फ़िल्मी बना गयी।

 

poster-3आखिर में मुझे बस एक चीज़ ने कचोटा कि क्या होता अगर एक जागरुक, दलित नेता ’सूरज’ जो इस राजनीति में सबसे गंदा होते हुये भी कईयों से साफ़ था, अंत में कुर्सी पर बैठता और न कि ‘इंदु’  जिसने जमीनी सच्चाई कभी देखी ही नहीं थी, जिसे इन सारे पात्रों में से राजनीति की सबसे कम समझ थी?