किसी फ्लॉप मूवी का एक डायलाग था कि यूपी-बिहार में हर घर में एक आईएएस, एक नेता और एक गुंडा होता है… मुझे ये कथन बड़ा जमीनी लगता है।
मेरे बाबा एक स्वतंत्रता सेनानी थे और एक कट्टर कांग्रेसी। मुझे याद है बचपन मे वो मुझे आजादी की लड़ाई के किस्से सुनाया करते थे और मैं उनकी बोर बातों से दूर भागता था। अभी अपनी सोंच बन भी न पायी थी कि पता चला था कि पापा और चाचा किसी चुनाव में बीजेपी को वोट देकर आये थे और हमें ये बात बाबा को नहीं बतानी थी। राजनीति को बाबा, पापा और चाचा की नज़र से ही देखता था। जब तक बाबा जिंदा रहे कांग्रेस के नाम से घर में हल्ला मचा देते थे। उनके जाने के बाद घर में कई बार ऎसा भी हुआ कि पापा बीजेपी को वोट देते थे और चाचा सपा को और कई बार घर के आठ वोट एक जगह पर भी गिरते थे।
इस मुद्दे पर मेरी समझ अभी भी नहीं बन पायी है। कुछ साल पहले जब लखनऊ में भविष्य की दिशाओं की खोज कर रहा था, तब अटल जी से जरूर प्रभावित था। कुछ समय ’विद्यार्थी निवास’ में रहा भी, जहाँ रहकर अटल जी ने कभी अपने पिता जी के साथ एक ही कक्षा मे वकालत(Law) की पढाई की थी। उनको कुछेक पत्र भी लिखे और इन बातों पर कई बार मित्रों के बीच हंसी का पात्र भी बना। एक बार राउरकेला में एक पर्सनालिटी डेवलपमेन्ट क्लास के दौरान काउंसलर ने क्लास से पूछा कि आपमें से कितनों में लीडरशिप क्वालिटीज़ है? कितने लोगो को लगता है कि वो लीड कर सकते हैं? मेरा हाथ तुरंत हवा में उठ गया। मै सबसे आगे वाली पंक्ति में था। आस-पास देखा… फ़िर पीछे घूमकर देखा तो सिर्फ़ मेरा हाथ ही हवा में था…
गुजरात में दंगे हुये… नये चुनाव हुये… अटल जी अपनी बातों पर अटल नहीं रह पाये… बीजेपी एक लीडरशिप क्राईसिस में दिखी… यूपी में पुराने नेता रद्दियो में बदलते गये और नया कुछ वो ढूढ नहीं पाये… कुछ ने ’उत्तम प्रदेश’ के सपने भी दिखाये लेकिन साइकिलों के पहियों में ही खो गये… जनसँख्या पर ध्यान देने की बजाय मूर्तियो की संख्या पर नेताओं का ध्यान ज्यादा दिखा… और इन सबने मुझे दूर, बहुत दूर कर दिया। …… अब अगर वो काउंसलर वो सवाल फ़िर से पूछेगी, वो अकेला हाथ भी उसे खड़ा नही दिखेगा।
अभी अभी ’राजनीति’ देखकर लौटा हूँ… कुर्ते-पायजामे से डेनिम-नोन डेनिम पहने हुये पात्रों को ’सिर्फ़’ राजनीति करते हुये देखा। भीड़ों को भटकते हुये देखा और इन पात्रों को उन भीड़ों को बरगलाते हुये। सबको उस ’कुर्सी’ तक पहुचने के रास्ते तलाशते देखा और उस कुर्सी के बाद एक डेड एन्ड को भी…
इस फ़िल्म ने राजनीतिक गलियारो में घुसते हुये जो कहानियां दिखायीं, उन्हें देखकर युवाओं के गंदी राजनीति में जाने के सपने को चोट ही लगनी चाहिये। सच्चाई कड़वी होती है और मै अभी इस कड़वेपन को महसूस कर रहा हूँ…
फ़िल्मी लिहाज से मूवी ने अंत के कुछ पहले तक बांधे रखा और अंत में जैसे अपनी ग्रिप छोड़ती नज़र आयी। इंटरवल तक कहानी में एक कसावट थी जिसे मैंने अपने आस पास भी महसूस किया। इंटरवल के बाद की कहानी ओबवियस होती गयी और अंत बेहद फ़िल्मी… फ़र्स्ट हाफ़ तक कहानी महाभारत जैसी लगती रही… सेकन्ड हाफ़ मे जबरदस्ती इसे महाभारत बनाने की कोशिश सी दिखी… कहानी मे काफ़ी कुछ परोसकर रखने के बजाय, बिटवीन द लाईन्स भी छोड़ा जा सकता था… अंत में बचे हुये मोहरों के बीच करवाया गया युद्ध, महाभारत युद्ध कम और गैंगस्टर वार ज्यादा लगा और उस वक्त समर के हाथ मे दी गयी पिस्टल, एक इंटेलीजेंट पात्र को बेहद फ़िल्मी बना गयी।
आखिर में मुझे बस एक चीज़ ने कचोटा कि क्या होता अगर एक जागरुक, दलित नेता ’सूरज’ जो इस राजनीति में सबसे गंदा होते हुये भी कईयों से साफ़ था, अंत में कुर्सी पर बैठता और न कि ‘इंदु’ जिसने जमीनी सच्चाई कभी देखी ही नहीं थी, जिसे इन सारे पात्रों में से राजनीति की सबसे कम समझ थी?