चाहता हू एक दिन
अपने साथ बैठू,
एक कॉफ़ी हो और
हम दोनो ढेर सारी बाते करे,
हँसे, खिलखिलाये ….
एक दूसरे को और जाने…
मै उससे पूछूँ कि वो
इतना गम्भीर क्यूँ है?
और बताऊँ कि क्या
मजबूरियां है मेरी,
जो मै उससे मिल नही पाता…
उससे पूछू कि क्यूँ
उसने मुझे तन्हा छोड दिया है,
झगडूं उससे…….
और कह दूं कि मुझे उसकी कोई जरूरत नही है……
मै जी सकता हू अपनी आत्मा के बिना…
लेकिन…
वो तो कही खो गया है, या
मुझ जैसा ही हो गया है……॥