Monday, October 5, 2009

कॉफ़ी विद मी…

soul_searching

चाहता हू एक दिन
अपने साथ बैठू,

एक कॉफ़ी हो और
हम दोनो ढेर सारी बाते करे,
हँसे, खिलखिलाये ….
एक दूसरे को और जाने…

मै उससे पूछूँ कि वो
इतना गम्भीर क्यूँ है?
और बताऊँ कि क्या
मजबूरियां है मेरी,
जो मै उससे मिल नही पाता…

उससे पूछू कि क्यूँ
उसने मुझे तन्हा छोड दिया है,
झगडूं उससे…….
और कह दूं कि मुझे उसकी कोई जरूरत नही है……

मै जी सकता हू अपनी आत्मा के बिना…

लेकिन…
वो तो कही खो गया है, या
मुझ जैसा ही हो गया है……॥

Sunday, October 4, 2009

सम रैन्ड्म थिन्ग!!

429074184_8c0b85837d

आफ़िस की मोनोटोनस और उबाऊ ज़िन्दगी से त्रस्त आकर एक लम्बी छुट्टी पर घर गया था..वो ज़िन्दगी देखने जिसने यहा तक पहुचाया है..

वो टेरेस जिसपर टहलते हुए मै अपने आप से बात करता था..वो सारी बाते… जो मै किसी से नही कर पाता था……मैने ईश्वर को हमेशा अपने पास मुझसे बात करते हुए पाया…… वो मुझमे ही कही था..उस टेरेस पर ही कही….

ज़िन्दगी बहुत धीरे चलती है वहा, इतनी धीरे की हर मन्जर डूबने का मौका देता है और यहा कोई लम्हा बीत जाने की खबर भी नही लगती..बस सिगरेट के धूए मे कभी कभी अपने आप से मुलाकात हो जाती है…और वही धूआ कुछ चेहरे दिखा देता है..

शादी के लिये बाते शुरु हो चुकी है और ज़िन्दगी की किताब पर फिर से किसी ने लिखना शुरु कर दिया है…कभी कभी मन करता है कि काश इस किताब का आखिरी पन्ना पढ सकता…

कभी कभी मन करता है कि काश कोई मुझे ज़िन्दगी के फ़ार्मूले समझा सकता क्युकि मेरे लिये ये हमेशा ही आर्ट थी……