Wednesday, February 11, 2009

हमारे पिताजी!!

haathबचपन में हमें जहाँ देखो, अपने दोस्तों के सामने खड़ा कर देते थे और बोलते थे  “सोनू को २० तक टेबल आती हैं”. और उनके मित्रगण, कोई तुंरत बोलता 'सोनू '२' का सुनाओ' और बस हम तान लगाकर शुरू हो जाते।  फिर तो बस रंगारंग पहाडों का फरमाईशी प्रोग्राम शुरू हो जाता।  २, ४ , ६ और हम सुनाते जा रहे हैं और कुछ तो जानबूझकर १३, १७ और १९ का सुनाने को बोलते।

याद है की दसवीं तक रोज़ लाइट जाने के बाद छत पर बैठकर अंधेरे में पहाड़े सुनाते था और मार तो हमेशा खाते था।  एक बार मकानमालकिन आंटी ने न जाने क्या घुट्टी पिला दी पिताजी को, “लड़का बड़ा हो गया, अभी तक मारते रहोगे।”  बस उसके बाद से पहाड़े सुनाना बंद हो गया इस वार्निंग के साथ की अब वो सिर्फ़ मार्कशीट देखा करेंगे।  तब से रात में लाइट का जाना अच्छा लगने लगा।

उनके साथ क्रिकेट मैच देखना हमेशा दिलचस्प होता था।  सारे प्लेयर डांट खाते थे, अजय जडेजा तो बेचारा सिर्फ़ चयूइंग गम खाने के लिए भी डांट खाता था और गालों पर व्हाइट क्रीम लगाने के लिए भी डांट।

एक दर्जी था जो उनकी बड़ी इज्ज़त करता था, कपड़े कभी अच्छे नहीं सिल पाता था पर जाने पर चाय पिलाता था।  पचास बार तो बाबु जी करता था।  बस हमें ले जाकर नपवा देते थे वहां और हमारी कातिल जवानी जैसे चिल्लाती थी की नहीं आज तो बख्श दो।

बाल कटवाने ले जाते थे तो बस जैसे उन्हें एक ही हेयर स्टाइल पता थी - ‘छोटे कर दो’ और नाई को तो जैसे वीटो पॉवर मिल जाती थी।  हमारे अमिताभ और मिथुन बनने के सपने तो उन नाइयों ने ही चूर कर डाले नहीं तो हम भी आज बॉम्बे मैं इंजिनियर की जगह बॉलीवुड में होते।

अभी ड्राइंग रूम बना नहीं है तो उसी में थोडी खेती कर लेते हैं।  माँ का कहना है की इन्हे किसान होना चहिये था, ग़लत प्रोफेशन में आ गए हैं। उस छोटे से ड्राइंग रूम भर की जमीन से क्या क्या उगा देते हैं की बस पूछिए मत और जब भी कोई नया फल लगता है या पकता है तो बुला - बुलाकर दिखाते हैं - देखो सोनू, पपीता पक गया है।  उन आखों से बहुत कुछ सीखा है मैंने।  मुझे अभी भी याद है जब एक गाय आकर पूरा खेत बरबाद कर गई थी।  मैंने उनको आँखों में उस दिन अलग रंग देखे थे – दर्द के। 

अभी कुछ दिनों पहले जब घर गया था तो अपने साथ घुमाने ले गए थे, माँ को हमेशा पता रहता है की मैं कभी मोजे और रुमाल नहीं खरीद सकता हूँ, सो वही दिलवाने ले गए थे।  वो दूकान वाले अंकल उनके साथ कभी पढ़े हुए  थे और उनको बोले देखो रोज़ इसके बारे में बोलता हूँ, आज इसे ले आया।  मुझे समझ में आ गया की ये मेरे मुँह से आधी अधूरी बातें सुनकर यहाँ सुनाते होंगे।  मैंने तुंरत ही पैर छूए।  काफ़ी देर बैठकर उन लोगों की बातें सुनी, बहुत अच्छा लगा।

उस दिन फिर से पापा की नज़रों से सब कुछ देखा जैसे वो बचपन में दिखाते थे।  वो अपने कोर्ट ले गए।  आजकल वकील लोग तख्त पे नहीं बैठते हैं, सिविल कोर्ट में भी अब केबिन बन गए हैं।  वो मुझे कोर्ट ऐसे दिखा रहे थे जैसा न जाने कौन सा हिस्टोरिक प्लेस हो और मैं भी वैसे ही देख रहा था।  सवाल भी पूछ रहा था “पापा! वो क्या है?” और जवाब  भी सुने।

किसी दिन उन्हें ये पोस्ट जरूर दिखाऊंगा, उसके लिए बस थोडी सी हिम्मत चहिये. देखिये कब तक हिम्मत जुगाड़ पता हूँ।

एक SMS पर अभी निगाह गई :

"Memories play a very confusing role...They make you laugh when you remember  the time you cried together!! But make you cry when you remember the time you laughed together.."

14 comments:

परमजीत बाली said...

बहुत सुन्दर पोस्ट लिखी है।अपने माता पिता के प्रति श्रदा का भाव होना बहुत उत्तम गुण है।हम तो ऐसा ही मानते हैं।बहुत अच्छा लिखा है।

रंजना [रंजू भाटिया] said...

बहुत सुंदर पोस्ट जो माता पिता के लिए समूर्ण प्रेम और श्रद्धा से भरी है ...आप जब भी यह लिखा हुआ उन्हें दिखायेंगे वह जरुर खुश होंगे ..

योगेन्द्र मौदगिल said...

मैं स्तब्ध हूं... बहुत ही बढ़िया संस्मरण है मेरे भाई... सही bolu तो संस्मरण नहीं पूंजी है पूंजी...

डॉ .अनुराग said...

इस दुनिया के सारे पिता अनमोल है दोस्त ओर सारे पिता एक से है .सबके पास एक सी यादे है .मिलती जुलती कहानिया ..ओर भावुक दिल...यहाँ नजर डालिए ..वो बरगद का पेड़ मुझे अब भी छाया देता है

आशीष तिवारी said...

pankaj...gr8...mujhe nahi lagta tha ki tu shabdo ka itna accha player hai...maza aa gaya

आशीष तिवारी said...

pankaj gr8...mujhe aaj pata chla ki tu itna accha shabdo ka player hai...

मनीषा पांडे said...

बहुत सुंदर। वैसे पापा ने दर्जी से कपड़े सिलवाकर और बाल कटवाकर अच्‍छा ही किया, वरना अभी भी तुम लखीमपुर में हीरो बने घूम रहे होते। बड़े होने के बाद वही सारी बातें, जिन पर बचपन में हमें बडा़ गुस्‍सा आता था, प्‍यारी लगने लगती हैं। तुम्‍हारे पापा भी बहुत प्‍यारे हैं। उन्‍हें ये पोस्‍ट पढ़वाना जरूर।

aradhana said...

बहुत प्यारी लगी ये पोस्ट. और sms भी. सच है यादें हँसाती भी हैं, रुलाती भी हैं. फ़र्क सिर्फ़ इतना होता है कि कुछ चीज़ें ऐसी होती हैं जो बस यादों में रह जाती हैं. आप अपनी ये पोस्ट अपने पापा को दिखा सकते हैं, मैं नहीं. क्योंकि मेरे पिताजी अब इस दुनिया में नहीं हैं. वो माँ के पास दूसरी दुनिया में चले गये हैं.

अनूप शुक्ल said...

सुबह से इसे पढ़ना बकाया था। अभी पढ़ी। बहुत अच्छा लगा इसे पढ़कर! सुन्दर पोस्ट!

Chandan said...

Hi,

Was reading your posts...
I must admit that you have writen very small parts which matters a lot in our life. "Humaare Pitaji..." was the one I liked most.

Thanks for posting these ;)
Good day
Fani Raj

ज्ञानदत्त पाण्डेय Gyandutt Pandey said...

मेरे पिताजी भी ऐसे ही हैं। दस साल पहले तक टोकते रहते थे कि बाल छोटे कराओ! :)

अनूप शुक्ल said...

अभी दुबारा देखी! दिखा पाये पिताजी को?

Priti said...

very nice and touching... loved it... I can relate it to my papa too :)

मनीष said...

Mazaa aaya.....

ab samajh me aa raha hai ki only one piece ke roop me mere hi papa nahin the...

papa log bilkul ek jaise hote hain.... aapke bhi mere jaise lage
:D :D