Monday, October 5, 2009

कॉफ़ी विद मी…

soul_searching

चाहता हू एक दिन
अपने साथ बैठू,

एक कॉफ़ी हो और
हम दोनो ढेर सारी बाते करे,
हँसे, खिलखिलाये ….
एक दूसरे को और जाने…

मै उससे पूछूँ कि वो
इतना गम्भीर क्यूँ है?
और बताऊँ कि क्या
मजबूरियां है मेरी,
जो मै उससे मिल नही पाता…

उससे पूछू कि क्यूँ
उसने मुझे तन्हा छोड दिया है,
झगडूं उससे…….
और कह दूं कि मुझे उसकी कोई जरूरत नही है……

मै जी सकता हू अपनी आत्मा के बिना…

लेकिन…
वो तो कही खो गया है, या
मुझ जैसा ही हो गया है……॥

7 comments:

अनिल कान्त : said...

dost bahut achchha likhte hain aap

रंजना [रंजू भाटिया] said...

खुद को खुद में खो कर ही खुद को पा सकते हैं ..मुझे तो खुद के साथ बाते करना बेहद पसंद है :) अभी तक एक खुद ही बचा है जो बात सुन लेता है मेरी :) बढ़िया लिखा है आपने

Invi said...

My mind runs about a million thoughts per second, and it gets difficult for me to write my thoughts.

Am so thrilled to read your words Panks. And see am Here just to comment. Lets see how far this journey takes me. YOU have so much potential and I will always be here waiting to read you more and more.

Keep writing friend! Cheers!

anuj said...

in all the poem one thing is commonn...superb climax...

वो तो कही खो गया है, या
मुझ जैसा ही हो गया है……॥

I think i can feel ur psycho at the time of writing these lines....

संजय भास्कर said...

ग़ज़ब की कविता ... कोई बार सोचता हूँ इतना अच्छा कैसे लिखा जाता है

अनूप शुक्ल said...

अच्छा आइडिया है!

richa said...

awesome... इस दौड़ती भागती ज़िन्दगी में जहाँ किसी के भी पास आपके लिये समय नहीं हैं कभी कभी बहुत ज़रूरी हो जाता है ख़ुद के साथ समय बिताना... अपने आप को समझना...
keep sharing such lovely writings !!!