Tuesday, July 20, 2010

मेरी नज़र से एक शख्सियत – अभय तिवारी

Picture0102उस गली में ’साईं’ नाम की कई बिल्डिंग्स हैं। एक बिल्डिंग के सामने से अभय भाई को फ़ोन लगाता हूँ “फ्लैट नंबर…? भूल गया?” वो बताते हैं और मैं उनके फ़्लैट के सामने खड़ा हूँ।

दाढ़ी-मूछों  वाले ये भाईसाहब, दरवाजा खोलते हैं… मैं ’नमस्कार’ करता हूँ, वो बड़े प्यार से हाथ मिलाते हैं। मैं सोफ़े पर बैठ जाता हूँ… आस पास नज़र दौड़ाता हूँ तो बस किताबें ही किताबें हैं। मेरा मन होता है उठकर सबकुछ अपने हाथों से छूकर देखूँ फ़िर चुप ही बैठा रहता हूँ।

बातें शुरु होती हैं और फ़िर चल पड़ती हैं… किसी बात पर वो कहते हैं कि “हाँ, लोग ’उदय प्रकाश’ को भी तो नहीं छोड़ते”। मैं  साहित्यिक विकलांग, पूछ्ता हूँ  कि “कौन उदय प्रकाश?” “अरे! उदय प्रकाश की कहानियां नहीं पढीं?” और वो सोफ़े से उठ जाते हैं। अपनी उस संजोयी हुई धरोहर से एक किताब निकालकर मुझे देते हैं “इसे पढ़ना।” मैं उस किताब को बड़ी नरमी से छूता हूँ… देखकर लगता है कि बहुत पुरानी किताब है। नाम देखता हूँ – “…और अंत में प्रार्थना”

 

करीब एक हफ़्ते बाद मैं फ़िर उसी बिल्डिंग के सामने हूँ। फ़ोन लगाता हूँ “फ्लैट नंबर…? फ़िर भूल गया?”

उन्होने सर पर एक गमछा बाँधा हुआ है। मैं कहता हूँ “स्मार्ट लग रहे हैं?” मुस्कराते हुये जवाब आता है “पढ़ते वक्त मैं गमछा बांध लेता हूँ  ताकि सारे विचार मस्तिष्क के साथ जुड़े रहें, इधर उधर छिटके नहीं”। “अच्छी तकनीक है, मैं भी ट्राई करूंगा” मैं कहता हूँ। उनके साथ बैठा हूँ… वो रामचरितमानस पढ़ रहे हैं… पूछते हैं “रामचरितमानस पढ़ी है?” “अपने पास-पड़ोस, रिश्तेदारों में रामायण बैठने पर मुझे ही बुलाया जाता था” मै लम्बी वाली फेंकता हूँ। वो दो चौपाईयाँ पढ़ते हैं और अपने साथ साथ मुझे भी उसमें स्वीमिंग करवा देते हैं। उनके साथ बातें करने में आनन्द आता है। कुछ जाना – अनजाना सीखता रहता हूँ… कुछ ’नहीं’ पूछने वाले सवाल भी पूछता हूँ,  जिनका अहसास मुझे घर आकर ही होता है… इस बार उनकी किताब ’कलामे रूमी’ ही ले आया हूँ। ’सरपत’ भी किसी दिन मांगकर देख ही डालूँगा।

 

अभय तिवारी किसी परिचय के मोहताज नहीं हैं।  थैंक्स टु पीडी, Picture0135c मैंने उनकी एक खूबसूरत सी पोस्ट  पढ़ी थी जो मैं गाहे बगाहे लोगों के सामने ऐज अ डायलाग मार देता हूँ… ’कबूतर जैसा मशहूर नहीं ’। उनको जितना पढ़ा, हमेशा एक नया प्वाइंट, एक नयी ऎनालिसिस समझने को मिली और जिसे मेरे जैसे लोग भी अच्छी तरीके से समझ पाये… अब चाहे वो फ़ुटबाल से भारत के प्राचीन रिश्ते की बात हो , या सर के पिछले हिस्से के महत्व की बात, या टाई लगाकर हिन्दी कहने की बात, या जुझारु जेसिका और एडवर्ड सईद के किस्से,  या ……आप खुद ही पढ़ लीजिये

 

कलामे रूमी’ की एक प्रति, अब मेरी हो चुकी है और मेरी डेस्क पर चमक रही है। आदतन सबसे पीछे वाला पन्ना पढता हूँ तो उनके ब्लॉग का लिंक भी है… मैं मन ही मन मुस्कराता हूँ और एक्नोलेजमेन्ट का एक पैरा पढ़ता हूँ:

सबसे पहले तो मैं धन्यवाद देता हूँ अपने पिता स्व. नरेश चन्द्र तिवारी और माँ श्रीमती विमला तिवारी को, जो मेरे शरीर, चरित्र और व्यक्तित्व के निर्माता हैं। उसके बाद मैं  अपनी पत्नी तनु का आभारी हूँ जिसने मुझे हमेशा एक नैतिक बल दिया और मेरे ऊपर सांसारिकता की सीढियां चढ़ने का कोई दबाव नहीं बनाया। फ़िर धन्यवाद देता हूँ मेरे मित्र फ़रीद खान को जिन्होने उमर में छोटे होने के बावजूद उर्दू-फ़ारसी का अक्षर ज्ञान कराने में मेरी उंगली पकड़ी ; और मेरे मित्र बोधिसत्व जिन्होने मेरी जरूरत की किताबें मुझे मिलती रहे, इसके लिये नि:स्वार्थ चिन्ता की; और मित्र प्रमोद सिंह को जिन्होने मेरे काम के प्रति उत्साह और अपने प्रति निर्ममता को बनाए रखने में निरंतर सहयोग दिया। अंत में बिबोध पार्थसारथी और विश्वजीत दास समेत अपने तमाम साथियों और मित्रों के साथ, अपनी उन पेशेवर असफलताओं का भी आभारी हूँ  जिन्होने मुझे यह काम करने का आयाम उपलब्ध कराया।

 

तभी याद आता है कि किताब पर उनके ऑटोग्राफ़ लेना तो भूल गया हूँ… चलिये बिल्डिंग तक का रास्ता तो पता है ही और आगे बस एक फ़ोन करना है और पूछना है -  “फ्लैट नंबर…? फ़िर भूल गया?” 

 


P.S. कलामे रूमी फ़्लिपकार्ट पर उपलब्ध है। पहली वाली फ़ोटो का लिंक  भी उसी पेज पर रिडायरेक्ट करता है।


पुनश्च:

टिप्पणी में सतीश पंचम जी ने अभय भाई की एक पोस्ट का जिक्र किया जिसमें मुम्बई में हिंदी किताबें रखने वाली दुकानों का जिक्र था और ये हिंदी साहित्य पढ़ने वाले मुम्बई वासियों के लिये एक सहेजकर रखी जाने वाली पोस्ट ही है।

 

पिछले पन्नो से: मेरी नज़र से एक शख्सियत - संकल्प शर्मा

Saturday, July 17, 2010

मुम्बई की एक रात…

बगल में रखा मोबाईल वाईब्रेट कर रहा है…… ATT00006

स्क्रीन पर आदित्य का नाम फ़्लैश कर रहा है और कमरे के उस घुप्प अँधेरे में मोबाईल के स्क्रीन की बार बार जलती-बुझती उस रोशनी से रिया की आँखें चुभ रही हैं । पिछले एक हफ़्ते से यह सिलसिला बदस्तूर जारी है। हर रात रिया घंटों उस नम्बर को फ़्लैश होते देखती रहती है और आदित्य उन कॉल्स को तड़प तड़पकर मरते…

 

उस दिन आदि की आवाज़ में कितनी बैचेनी थी… एक हताशा थी… एक हार थी। मुम्बई की रोज की दौड़ में उस दिन वो शायद पिछड़ गया था… या शायद दौड़ा ही नहीं था। दौड़ा नहीं तो थका भी नहीं … इसलिये उसे नींद नहीं आयी होगी। सोने की भरपूर कोशिश करने के बाद भी जब बिस्तर की सिलवटों को किसी और की कमी खली होगी, तब उसने मुझे रात के उस तीसरे पहर कॉल  किया होगा…। ह्म्म… अपने खालीपन को पूरा करने के लिये… उसी के लिये ही…

ये सब सोचते हुये रिया अपने अँधेरे कमरे की खिड़की खोल देती है और उस खिड़की से दूर दिखती लैम्पपोस्ट को एकटक देखती रहती है।

’अँधेरे को उजाला आसानी से चीरता है या उजाले को अँधेरा” ये सोचते सोचते, वो भी कहीं बहुत भीतर से, उसी लैम्पपोस्ट की रोशनी से,  धीरे धीरे चिरती जाती है। धीरे धीरे, लैम्पपोस्ट की वो रोशनी  भी जलने-बुझने लगती है। आदित्य का नाम वहाँ भी फ़्लैश होने लगता है।

……आदित्य कॉलिंग

दीवाल घड़ी रात के दो बजा रही है। मुम्बई की जादुई बारिश भी शुरु हो गयी है…

उस रात भी तो बारिश ही थी न जब आदि मुझे भिगोता चला गया था। आदि की कल्पनाओं में कितनी वास्तविकता थी, कितनी विविधता थी और उसका कहने का अंदाज़… उस रात वो जो भी आब्जेक्ट्स दिखा रहा था, वो मुझे दिखते थे। मै उसकी कल्पनाओं में बहती जाती थी… मैं उसका सुनाया अपनी बंद आँखों के आसमान में  देख रही थी… उसकी बातों से ज़ेहन में  नये नये स्केचेज़ बनते जाते थे। ज़ेहन के किसी एक कोने मे ’सही/गलत’ की बातें भी सर उठाती दिखती थीं… उसे भी दिखती होगीं लेकिन जिसे दिखती थीं वो दूसरे को उसका दिखना कहाँ बताता था… वो बस बातें  करता जाता था… कुछ कुछ छिपाता… कुछ कुछ बताता। ’सही/गलत’ मुझे सिर्फ़ ताकते रह जाते थे… मैंने  भी उनसे आँखें न मिलाकर नीची ही कर रखी थीं…

…और,

और, अगली सुबह ज़िंदगी उस कमरे में बिखरी पड़ी थी। रात की खरोचें दर्द तो दे रही थीं लेकिन दिखती नहीं थीं। उनींदे ही, सबसे पहले उसने खुद को एक आईने मे देखा था। आँखें, चिटके हुये कई ख्वाबों से भरी हुयी थीं और चेहरा रात हुये किसी कत्ल का गवाह सा दिखता था। उस कमरे मे कोई लाश नहीं थी… खून के निशान भी नहीं थे… उसके शरीर पर खरोचें भी नहीं थीं… बस मन में  ’सही/गलत’ को सोचता हुआ एक गिल्ट था। एक बोझ था जिसकी वजह से वो अपने आप से दबी जा रही थी… उसे एक एकांत चाहिये था… मौत सरीखा काफ़्का का एकांत…

 

बाहर बारिश अभी भी जारी है। रिया और लैम्पपोस्ट की रोशनी के बीच बारिश की कुछ बूँदें  आ जाती हैं। रिया उन्हे पकड़ने के लिये हथेली खोलती है… हथेली पर रोशनी की एक चादर सी है और उस चादर में बारिश की बूँदें इकट्ठी होने लगती हैं… वो धीरे धीरे मुट्ठी बंद कर लेती है…

वो उस बारिश मे जमकर भीगना चाहती है… वो कमरे से बाहर आकर आसमान की तरफ़ देखते हुये अपने हाथों को पंख जैसे फ़ैला लेती है… सारी बारिश को खुद में समा लेना चाहती है… वो खुद एक ’मुट्ठी’ बन जाना चाहती है…  

उस बारिश में  रिया, ’मुट्ठी’ के जैसे खुलती, बंद होती है… उस बारिश मे रिया उड़ती है… भीगती है… बहती है… रोती है… खूब रोती है…

…और उस रात मुम्बई पानी से डूब जाती है॥

इधर अँधेरे कमरे में अभी भी मोबाईल की रोशनी जल-बुझ रही होती है

……आदित्य कॉलिंग